फिलिस्तीन को राज्य का दर्जा देने का मामला और अंतरराष्ट्रीय राजनीति

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस साल जुलाई में घोषणा की कि फ्रांस सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) सत्र के दौरान फिलिस्तीन को एक राज्य के रूप में मान्यता देगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के माध्यम से इसकी घोषणा की, उन्होंने लिखा कि “आज गाजा में युद्ध समाप्त होने और नागरिकों को बचाने की तत्काल आवश्यकता है। शांति संभव है। हमें तत्काल युद्धविराम, सभी बंधकों की रिहाई और गाजा के लोगों को व्यापक मानवीय सहायता की आवश्यकता है।” उन्होंने ‘हमास के विसैन्यीकरण’ की भी बात की। इसके साथ ही, फ्रांस ऐसा करने वाला G7 का पहला देश बन गया। गौरतलब है कि G7 दुनिया की सात प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), कनाडा, यूनाइटेड किंगडम (UK), फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान शामिल हैं। वहीं 24 जुलाई को, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने भी स्वीकार किया कि “राज्य का दर्जा फिलिस्तीनी लोगों का अपरिहार्य अधिकार है”।

घरेलू स्तर पर, फ्रांसीसी सरकार के इस फैसले को सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त हुआ है। फ्रांस में यहूदी और मुस्लिम दोनों समुदायों की अच्छी-खासी आबादी है। इसलिए, इजराइल और फिलिस्तीनी दोनों ही पक्षों को समर्थन मिल रहा है। फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने कहा “यह कदम फिलिस्तीनी हितों की जीत है, यह अंतरराष्ट्रीय कानून और मान्यता प्राप्त वैधता के अनुसार, फिलिस्तीनी लोगों और उनकी भूमि व मातृभूमि पर उनके वैध अधिकारों का समर्थन करने के लिए फ्रांस की सच्ची प्रतिबद्धता को दर्शाता है।” वहीं फिलिस्तीनी विदेश मंत्री ने कहा कि “फ्रांस फिलिस्तीन राज्य के प्रति अपनी नैतिक, कानूनी और कूटनीतिक जिम्मेदारी निभा रहा है।”

उन्होंने आगे इस बात को स्वीकार किया कि फ्रांस द्वारा मान्यता देने का समय उस समय का महत्व है जब फिलिस्तीनी इजराइल राज्य से अस्तित्व के लिए खतरा झेल रहे हैं। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने फ्रांस, जो उनके महत्वपूर्ण पश्चिमी सहयोगियों में से एक है के इस फैसले की निंदा की और कहा कि यह कदम “आतंकवाद को बढ़ावा देता है और एक और ईरानी छद्म राष्ट्र के निर्माण का जोखिम उठाता है।” उनका मानना है कि इससे फिलिस्तीन, इजराइल को नष्ट करने के लिए उस पर हमलों का एक लॉन्च पैड बन जाएगा। इजराइली रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने इसे “एक अपमान और आतंकवाद के आगे आत्मसमर्पण” के रूप में देखा। इजराइल के सदाबहार मित्र अमेरिका ने भी फ्रांस के फैसले को खारिज कर दिया।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका “संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने की (मैक्रों की) योजना को दृढ़ता से अस्वीकार करता है।” उन्होंने आगे कहा कि “यह लापरवाही भरा निर्णय केवल हमास के दुष्प्रचार को बढ़ावा देता है और शांति को बाधित करता है।” दूसरी ओर, स्पेन ने फ़्रांस के इस निर्णय की प्रशंसा की। आयरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और स्पेन जैसे कई यूरोपीय संघ के देशों ने पहले ही फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दे दी थी। सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे अरब देश भी फिलिस्तीनी हितों के प्रति फ्रांस के इस नए कदम का स्वागत करते हैं। सऊदी अरब ने इसे “ऐतिहासिक निर्णय” बताया। कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और बहरीन जैसे अन्य खाड़ी सहयोग परिषद के देश इसे न्याय चाहने वाले फिलिस्तीनी लोगों के साथ-साथ पश्चिम एशियाई क्षेत्र में क्षेत्रीय शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानते हैं।

इजराइल-हमास युद्ध की शुरुआत के बाद से, गाजा के उत्तरी भाग से दक्षिणी भाग की ओर फिलिस्तीनियों का भारी विस्थापन हुआ है, और वह भी सीमित क्षेत्र में। चूंकि सभी पारगमन चौकियां इजराइली सेना के नियंत्रण में हैं, इसलिए गाजा में भोजन, पानी और चिकित्सा आपूर्ति की पहुंच सीमित हो गई है। गाजा की दो मिलियन आबादी भुखमरी के कगार पर है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, गाजा में 20% बच्चे कुपोषित हैं। गाजा के नागरिकों को उनकी बुनियादी जरूरतों जैसे स्वास्थ्य सेवा, बिजली, भोजन और पानी से वंचित कर दिया गया है। रिपोर्टों में कहा गया है कि 21 महीनों में हजारों लोग मारे गए हैं। फिलिस्तीनी राज्य के दर्जे को फ्रांस की मान्यता एक कूटनीतिक मील का पत्थर हो सकता है, लेकिन इसके तत्काल प्रभाव जमीनी हकीकत को नहीं बदल सकते। यह निर्णय प्रतीकात्मक है। यह राष्ट्रपति मैक्रोन के उन अत्याचारों के प्रति गुस्से को दर्शाता है जो इजरायल गाजा में लोगों के साथ कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्यों में से 142 फिलिस्तीन राज्य को मान्यता देते हैं, इसमें भारत, रूस और चीन शामिल हैं। 21वीं सदी की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की तीन प्रमुख शक्तियाँ। इजरायल के कई सहयोगियों ने अब गाजा में बिगड़ते मानवीय संकट के लिए बेंजामिन नेतन्याहू सरकार की निंदा शुरू कर दी प्रदर्शनकारियों का मानना था कि यह सरकार हमास के कब्जे में बंधकों को रिहा कराने में विफल रही।

वहीं भारत, इजराइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष की शुरुआत से ही द्वि-राज्य समाधान का समर्थक रहा है। हमने 1974 में फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) को मान्यता दी और 1988 में फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दी, जब यह अस्तित्व में आया। हम पश्चिमी तट और गाजा में मानवीय संकट को लेकर लगातार चिंतित हैं। नई दिल्ली ने इजराइल और फिलिस्तीन के साथ संतुलनकारी नीतियों का विकल्प चुना है। एक ओर, हमने फिलिस्तीनी लोगों के साथ ऐतिहासिक संबंध बनाए रखे हैं और दूसरी ओर, हमने तकनीक, कृषि और रक्षा के क्षेत्र में इजराइल के साथ मजबूत संबंध विकसित किए हैं।