हर किसान-नौजवान की आंखों में चमक, वरदान साबित होगा अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र

बुधवार को मोदी कैबिनेट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला लिया, जिसकी हलचल भले ही सोशल मीडिया पर कम दिखी हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के गांवों की चौपालों पर बस इसी की चर्चा है। फैसला है आगरा के सींगना में अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र (CIP) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (CSARC) की स्थापना का। यह खबर गुरुवार सुबह जैसे ही अखबारों में छपी, ब्रज क्षेत्र के कासगंज, एटा, हाथरस, अलीगढ़, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, फिरोजाबाद और मथुरा के गांव-गांव में उम्मीद की नई लहर दौड़ गई। चौपालों पर इसे ऐसे बांटा जा रहा था जैसे कोई सपना अब आकार ले रहा हो। मोदी सरकार के इस फैसले के बाद आलू के भविष्य की चमक इस इलाके के किसान-नौजवान की आंखों में साफ देखी जा सकती है।

मोदी सरकार ने आलू की खेती को नई दिशा देने का भरोसा जगाया

मोदी सरकार के इस कदम ने आलू की खेती को नई दिशा देने का भरोसा जगाया है। अब न सिर्फ आलू की गुणवत्ता बेहतर होगी, बल्कि इसका लाभ सीधे किसानों और युवाओं को मिलेगा। आगरा और आसपास के इलाकों में इसका असर दूरगामी होगा, जहां किसान बेहतर बीज, तकनीक और वैश्विक समर्थन से समृद्धि की ओर बढ़ेंगे। इस फैसले ने बता दिया है कि सरकार की नजर अब गांवों पर भी है।

अब सड़कों पर नहीं फेंकना होगा आलू

यमुना किनारे 108 शिवालयों की श्रृंखला के आसपास बसे आगरा की तहसील बाह स्थित पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के गांव बटेश्वर के निवासी राजकमल कहते हैं शहरी शोर में कई बार गांव की वो भावनाएं दबी रह जाती हैं, जो इस देश की आत्मा में बसती हैं। सींगना में अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र (सीआईपी) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (सीएसएआरसी) की स्थापना को मंजूरी देकर सरकार ने इस इलाके की ऐसी ही आत्मा की आवाज सुन ली है। उन्हें इस फैसले के बाद उम्मीद जागी है कि शायद अब आने वाले समय में यहां का आलू किसानों का ‘भाग्यविधाता’ होगा। राजकमल को उम्मीद है कि कई बार अधिक फसल होने, समय से पहले ही कोल्ड स्टोरेज फुल हो जाने और कीमतों में भारी गिरावट के चलते खून-पसीने से उगाई फसल किसान सड़कों पर फेंकने को मजबूर हो जाते थे, शायद अब ऐसा नहीं होगा। सीएसएआरसी की स्थापना से आलू को नई पहचान, बड़ा बाजार और उचित कीमत मिलेगी। 

अनिश्चितता के बादल छंटे

यमुना और चंबल के बीच में मध्य प्रदेश व राजस्थान की सीमा से सटे और कभी दस्यु प्रभावित रहे इसी इलाके के पिनाहट के किसान राम सुंदर बीते 30 वर्षों से लगभग 300 बीघे में आलू की खेती करते आ रहे हैं। उनके ट्यूबवेल पर बैठे तमाम काश्तकारों के चेहरे भी आलू की कीमतों की लगातार अनिश्चितता के भाव से मुक्ति पाते नजर आए। राम सुंदर व तमाम काश्तकारों का कहना था कि उनका पूरा क्षेत्र दशकों से आलू की खेती कर रहा है लेकिन हमेशा एक अनिश्चितता उनके दिल-दिमाग में बनी रहती थी कि जो काम वो कर रहे हैं उसका क्या भविष्य होगा? सरकार के इस फैसले ने उनको इस अनिश्चितता से मुक्ति दी है और एक सुरक्षा का आभास करा दिया है। इन किसानों में विश्वास जगा है कि अब आने वाले समय में आलू ही सबकी किस्मत बदलने वाला है।

कृषि तकनीक में मील का पत्थर

प्रमुख वैज्ञानिक एवं विभागाध्यक्ष, कृषि विज्ञान विभाग (एग्रोनॉमी) आईएआरआई-पूसा, नई दिल्ली व विश्व बैंक में भारत सरकार के राष्ट्रीय समन्वयक (कृषि), डॉ. संजय सिंह राठौर कहते हैं कि विदेशी किस्मों के आलू बीज अब कंद नहीं बल्कि ट्रांसप्लांटेशन तकनीक से तैयार होंगे और दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय आलू अनुसंधान केंद्र (CSARC) अब आगरा में स्थापित होगा, ये दोनों ऐतिहासिक निर्णय देश की कृषि तकनीक और खाद्य सुरक्षा के लिए मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। ये फैसले सिर्फ एक फसल की नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, निर्यात रणनीति और किसान सशक्तिकरण की पूरी श्रृंखला को प्रभावित करेंगे। साथ ही उनका कहना है कि इस अनुसंधान केंद्र से बीज क्रांति की भी नई शुरुआत होगी जो आलू किसानों के भविष्य को बदल कर रख देगी। कोल्ड स्टोरेज संचालक प्रशांत पाठक कहते हैं कि अब तक आगरा को ताजनगरी के नाम से जाना जाता था लेकिन अब ‘आलू टेक्नोलॉजी’ भी मान बढ़ाएगी। 

बीज उत्पादन में गुणवत्ता की नई क्रांति

अब बात आती है कि सीएसएआरसी की स्थापना के बाद तकनीकी तौर पर क्या बदल जाएगा। दरअसल परंपरागत रूप से भारत में ‘आलू बीज’ पुराने कंदों से ही तैयार होते हैं जो बार-बार इस्तेमाल से वायरस ग्रस्त होकर उत्पादन घटाते हैं। इसके बाद ट्रांसप्लांटेशन विधि यानी सूक्ष्म पौधों (micro plants) से बीज तैयार किए जाएंगे-जिससे उच्च गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधकता और एकरूपता सुनिश्चित होगी। यह प्रणाली वैश्विक स्तर पर True Potato Seed (TPS) के समान है जो न केवल भंडारण क्षमता में सुधार करती है, बल्कि 20–30% तक अधिक उपज भी देती है। इससे किसान की आमदनी बढ़ेगी और आलू उत्पादन में वायरस और फफूंदजनित नुकसान घटेगा। CSARC चीन, केन्या, और पेरू के बाद दुनिया का चौथा प्रमुख आलू अनुसंधान केंद्र होगा। इसकी लागत 111–171 करोड़ होगी और यह 10 हेक्टेयर में फैलेगा।

केंद्र के प्रमुख उद्देश्य?

⦁ जलवायु अनुकूल और पोषण संपन्न आलू/शकरकंद की नई किस्में विकसित करना।

⦁ बीज उत्पादन व संवर्धन तकनीकों पर काम।

⦁ कीट नियंत्रण, मूल्य संवर्धन, और किसान प्रशिक्षण।

⦁ निर्यात योग्य प्रोसेसिंग ग्रेड आलू विकसित करना।

क्यों चुना गया आगरा?

⦁ उत्पादन केंद्र: अकेले आगरा जिले में हर साल 50 लाख टन से अधिक आलू का उत्पादन होता है, जो यूपी के कुल उत्पादन का 27% है।

⦁ बीज की भारी मांग: सिर्फ आगरा में हर साल करीब 7 लाख टन बीज आलू की ज़रूरत होती है।

⦁ भौगोलिक श्रेष्ठता: यहां की जलवायु, मिट्टी और सिंचाई सुविधा अनुसंधान के लिए उपयुक्त है।

⦁ यूपी की स्थिति: यूपी देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है, जो देश के 35% उत्पादन के लिए जाना जाता है।

खाद्य सुरक्षा से लेकर निर्यात तक

⦁ खाद्य सुरक्षा: गेहूं और चावल के बाद आलू भारत की तीसरी सबसे अहम फसल है। 2020 में भारत का आलू उत्पादन 51.3 मिलियन टन था जो अब और तेज़ी से बढ़ रहा है।

⦁ किसानों की आमदनी: बेहतर बीज, नई किस्में और ट्रांसप्लांटेशन तकनीक से किसान की प्रति हेक्टेयर आमदनी में 25–40% तक वृद्धि संभव है।

⦁ निर्यात अवसर: 2050 तक भारत का आलू उत्पादन 100 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है जो भारत को चीन से आगे निकाल सकता है। प्रोसेस्ड फॉर्म (चिप्स, फ्राइज़, स्टार्च) में निर्यात संभावनाएं कई गुना अधिक होंगी।

⦁ रोज़गार सृजन: बीज उत्पादन, कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग, ट्रांसपोर्ट और मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में हज़ारों नए रोज़गार उत्पन्न होंगे।

चुनौतियां और समाधान

⦁ पर्यावरणीय सावधानी: यह केंद्र सूर सरोवर बर्ड सेंचुरी के पास होगा, इसलिए पर्यावरण स्वीकृति और निगरानी अनिवार्य है।

⦁ फील्ड तक पहुंच: अनुसंधान का लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य विश्वविद्यालयों के साथ मजबूत नेटवर्क बनाना होगा।

⦁ कोल्ड स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट: बेहतर भंडारण और लॉजिस्टिक्स से फसल की गुणवत्ता सुधरेगी तो मुनाफा भी बढ़ेगा।

आलू से आत्मनिर्भरता की ओर

जहां दुनिया कृषि नवाचारों में गेहूं-चावल को केंद्र में रखती है, वहीं भारत अब ‘आलू क्रांति’ की ओर भी बढ़ रहा है। आगरा का यह केंद्र न केवल उत्तर भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में उच्च उपज, जलवायु रेसिलियंट और निर्यात योग्य आलू उत्पादन का प्रमुख स्रोत बन सकता है। अगर इस केंद्र की योजनाएं सफल रहीं और तकनीक खेतों तक समय से पहुंची तो आने वाले दशक में भारत केवल सबसे बड़ा आलू उत्पादक ही नहीं बल्कि सबसे आधुनिक आलू तकनीक एक्सपोर्टर भी बन सकता है।

-(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है।)