राजस्थान के सुदूर गांव में जन्मा, रोज कई किलोमीटर तक पैदल चलकर स्कूल जाने वाला, मात्र 6 साल की उम्र में ही अपने बढ़े भाई, मां और भाभी के इलाज के लिए एक साथ संघर्ष करने वाला और आखिरकार इलाज के अभाव में अपने बड़े भाई और बाद में मां को खोने वाले एक मासूम को इस संघर्ष-सबक और जुनून ने आगे चलकर एक ‘हेल्थ वॉरियर’ बना दिया। वर्षों से पर्दे के पीछे से इस देश की बीमार स्वास्थ्य सेवा को दुरुस्त करने के लिए काम कर रहे एक चिकित्सक ने बचपन में जो कुछ देखा-झेला उन सारे सबक के बाद उनके जीवन का लक्ष्य ही इस देश के हेल्थ सेक्टर को रिफॉर्म करने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों में अपना योगदान देना बन गया।
बचपन में देखे उड़ान भरने के सपने को जब मोदी ने दिए पंख
जी हां, ये कहानी है डॉक्टर जेएल मीना की। जिन्होंने ख़ुद इस देश की बदहाल स्वास्थ्य सेवा का दंश झेला। समय पर इलाज न मिल पाने की वजह से उनके बड़े भाई का निधन हो गया तो समय पर बीमारी का पता नहीं चल पाने के चलते उनकी मां को भी नहीं बचाया जा सका। ये बदहाल स्वास्थ्य सेवा का ऐसा अभिषाप है जिसको आजादी के बाद कई वर्षों तक ग्रामीण इलाके के कई लोगों ने अपना नसीब मान लिया लेकिन डॉ मीना ने इसे अभिषाप नहीं अपनी ताकत बनाया। उनके इस जूनून को पंख तब लगे जब उन पर तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की नजर पड़ी।
मोदी की पारखी नजर ने पहचाना हुनर
कहते हैं न कि एक असली हीरे की परख जोहरी ही कर सकता है। डॉ जेएल मीना को भी तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ एक बेशकीमती हीरे की तरह तराशा बल्कि उनकी क़ाबिलियत को पहचानते हुए उनकी जीवन यात्रा को असाधारण बना दिया। नरेंद्र मोदी के संपर्क में आने के बाद शुरू हुई जेएल मीना की असली यात्रा, जिसने उन्हें पहुंचा दिया, ‘पीएचसी से एनएमसी तक’। देश की स्वास्थ्य सेवा को वेंटिलेटर से उतारने के विजन और काम करने वालों को चुनने व उन्हें ख़ुद को साबित करने का मौका देने की नरेंद्र मोदी की असाधारण निर्णय क्षमता को दर्शाती ये पूरी यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम रोचक नहीं है। अभावों से निकल कर अपने मां-बाप की दिखाई हुई राह पर चलते हुए डॉ मीना भी मोदी के विजन को पूरा करने के लिए अपनी भूमिका निभा रहे हैं व देश के हेल्थ सिस्टम को बदलने में आज भी एक स्ट्रांग लीडरशिप के डायरेक्शन में लगे हुए हैं। डॉ मीना जैसे तमाम हेल्थ वॉरियर्स के प्रयासों को गुजरात से लेकर दिल्ली तक पंख दे रहे हैं, प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी।
जब तत्कालीन CM मोदी ने कहा- उस अधिकारी को जरूर रखो
डॉ जेएल मीना के ऊपर लिखी गई किताब ‘पीएचसी से लेकर एनएमसी तक’ में नरेंद्र मोदी द्वारा इस देश में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को बदलने के लिए गुजरात का सीएम रहते हुए ही किस तरह एक बड़े विजन के साथ काम करना शुरू कर दिया गया था इस बात की तस्दीक करने वाले तमाम संस्मरण हैं। उन्हीं में से एक संस्मरण साल 2003 का है। उन दिनों आइपीडी प्रोजेक्ट बना था। उस प्रोजेक्ट के तहत पूरे इंडिया में चार डिस्ट्रिक्ट क्वालिटी हेल्थ एश्योरेंस ऑफिसर की बहाली होनी थी, जिसमें दो गुजरात के लिए और दो महाराष्ट्र के लिए पद सृजित किए गए। गुजरात में दाहोद एवं बनासकाठा के लिए और महाराष्ट्र में चंद्रपुर एवं गढ़चिरौली के लिए बहाली होनी थी। इन चारों में सबसे पहली बहाली डॉ. जे एल मीना की हुई। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी क़ाबिलियत को पहचानते हुए उन्हें पहला जिला क्वालिटी हेल्थ एश्योरेंस ऑफिसर बनाया। जिसका उद्देश्य था न सिर्फ ज़रूरतमंद को समय पर इलाज मिले बल्कि क्वालिटी ट्रीटमेंट मिले। मोदी ने अपने अधिकारियों से कहा कि सबसे पहले उस ऑफिसर को इस पद पर रखना, जो हमारे यहां की पीएचसी में महज ढाई साल में क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया है। दरअसल अपनी पहली तैनाती के दौरान ही डॉ मीना ने पीएचसी पर कुछ ऐसे कदम उठाए जो सीधे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के संज्ञान में आ गए थे। इस तरह से डॉ. मीना नरेंद्र मोदी की गुड बुक्स में आ गये। और देखते ही देखते पूरे गुजरात की जिम्मेदारी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हेल्थ एश्योरेंस ऑफिसर के तौर पर डॉ मीना के पास आ गई।
जब फिलिप्स के एशिया डायरेक्टर पर करा दी एफआईआर
‘पीएचसी से एनएमसी तक’ किताब में डॉ मीना एक घटनाक्रम याद करते हुए बताते हैं कि सिस्टम की बेहतरी के लिए उठाए गए किसी भी सार्थक कदम में नरेंद्र मोदी का हमेशा सहयोग रहता था। जब बायोमेडिकल संबंधित मामले में डॉ मीना ने 56 फैक्ट्री और हॉस्पिटल्स को सील करवाया या एईआरबी सर्टिफिकेशन के संबंध में फिलिप्स के एशिया डायरेक्टर पर एफआईआर करवाई। यह बात तत्कालीन सीएम मोदी तक पहुंची, लेकिन उन्होंने कहा कि अगर डॉ. मीना का प्वॉइंट सही है तो वे उस मामले में कुछ नहीं कहेंगे।
ऐसे सीधे जिलास्तर से बना दिए गए स्टेट लेवल का ऑफिसर
गुजरात में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वास्थ्य के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर वास्तविक बदलाव लाने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। इस बात को तत्कालीन गुजरात स्टेट कमिश्नर अमरजीत सिंह भी आगे बढ़ाना चाहते थे। अमरजीत सिंह ने ही भारत सरकार द्वारा हेल्थ एश्योरेंस ऑफिसर का पद समाप्त होने के बाद कहा कि भारत सरकार इस पद को चालू रखे या ना रखे, गुजरात सरकार इसको जारी रखेगा। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से अमरजीत सिंह ने क्वालिटी हेल्थ ऑफिसर संबंधित बात पर सहमति ले ली। इसके बाद तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि डॉ. मीना को जिले से सीधे स्टेट में लेकर आओ।
ये कदम ला सकते हैं और बदलाव-
1. प्रॉपर स्क्रीनिंग करेगा देश का डिजीज बर्डन कम
डॉ मीना का कहना है कि जो प्राइमरी हेल्थ सेंटर हैं, अगर उन पर विशेष ध्यान दिया जाए तो बहुत सारी बीमारियों को हम निचले स्तर यानी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व जिला अस्पताल स्तर पर रिजॉल्व कर सकते हैं। प्रिवेंटिव हेल्थ केयर की दृष्टि से प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की अहम भूमिका हो सकती है। ये केन्द्र डायरेक्ट कम्युनिटी के टच में रहते हैं, वे चाहें तो आसानी से कम्युनिटी का विहेवियर चेंज कराने में मदद कर सकते हैं।
2. इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी
डॉ मीना, इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी को प्रोत्साहित करने के लिए चलाए गए सास-बहू सम्मेलन कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहते हैं कि सरकार की ओर से हमें गाइड लाइन मिली थी कि हमें इंस्टीट्यूशनल डीलीवरी को प्रोमोट करना है। हमें यह जानना था कि मातृ मृत्यु दर ज्यादा क्यों है? इसलिए सास-बहू जैसे स्टेक होल्डर्स को हमने अपने साथ जोड़ा और समस्या की जड़ में गए, फिर उसका समाधान निकाला। हमने पंचायतों से जुड़ के सभी स्टेक होल्डर्स को इस अभियान से जोड़ने का काम किया, जिसमें पंचायती राज सदस्य, सरपंच, मुखिया सबको जोड़ा। सबको जागरूक किया और सबसे जागरूकता अभियान में शामिल होने का आग्रह भी किया। इसका सकारात्मक असर हुआ।
3. स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के लिये जरूरी IEC
डॉ मीना ने बाताया कि उन्होंने गुजरात में उपचार के साथ-साथ प्रीवेंटिव हेल्थकेयर पर भी बहुत काम किया। आसपास में लोगों को जागरूक करने के लिए IEC यानी सूचना, शिक्षा एवं संचार के विविध माध्यमों का उपयोग किया। सरकरा ने स्कूल में छात्रों को सेंसटाइज करने से लेकर कम्युनिटी में जाकर सास-बहू सम्मेलन तक सब कुछ किया। इसके साथ-साथ नरेंद्रो मोदी जब गुजरात के सीएम थे तब बहुत सारे स्कूल हेल्थ प्रोग्राम, प्रजनन और बाल स्वास्थ्य, जेंडर बेस वायलेंस, एडोलेसेंट हेल्थ, कम्युनिकेबल डिजीज, बाल मृत्यु, मातृ मृत्यु, संस्थागत प्रसव, चिकित्सा जांच, फैमिली प्लानिंग, क्वालिटी हेल्थ एजुकेशन इत्यादि के प्रोग्राम भी हर एरिया में किए गए।
(लेखक के पास मीडिया जगत में लगभग डेढ़ दशक का अनुभव है, वे प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में काम कर चुके हैं)