पारंपरिक काला पॉटरी शिल्प को मिलेगा नया जीवन, NIT राउरकेला की ग्रीन तकनीक

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने काला टेराकोटा शिल्प के उत्पादन के लिए एक पर्यावरण अनुकूल तकनीक विकसित की है।

संस्थान ने सोमवार को बताया कि पेटेंट प्राप्त यह सतत उत्पादन प्रक्रिया पारंपरिक खुले गड्ढे (ओपन-पिट) वाली दो दिन की फायरिंग को घटाकर सात घंटे से भी कम कर देती है, और इससे न तो कारीगरों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और न ही पर्यावरण को नुकसान होता है।

वर्तमान पद्धति में फायरिंग के दौरान कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे जहरीले गैस निकलते हैं, जिनसे शिल्पकारों को सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याएं होती हैं।

सिरेमिक इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर स्वदेश कुमार प्रातिहार ने बताया कि “यह सतत प्रक्रिया पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक तकनीक का संगम है। मुख्य तकनीक यह है कि तैयार बर्तनों को एक बंद वैक्यूम चैम्बर में अप्रत्यक्ष रूप से गर्म किया जाता है।”

उन्होंने कहा कि गर्म करने की प्रक्रिया के दौरान कार्बनयुक्त तेल के पायरोसिस से कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन कालिख बनती है, जो काली रंगत देने के लिए जरूरी रिड्यूसिंग वातावरण तैयार करती है।

नई विधि से तैयार उत्पादों में एकसमान काली चमक मिलती है और इसके लिए न खुले चूल्हों की जरूरत होती है, न ही विशेष कौशल या विशेष मिट्टी की। यह तकनीक पारंपरिक तरीके में होने वाले प्रदूषण को भी पूरी तरह समाप्त करती है।

संस्थान का कहना है कि यह तकनीक न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि पारंपरिक काले टेराकोटा शिल्प के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

भारत में काला मिट्टी शिल्प लंबे समय से पारंपरिक तकनीकों से तैयार किया जाता रहा है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश का निजामाबाद ब्लैक पॉटरी, जिसमें ‘कबिज’ नामक विशेष मिश्रण और सरसों के तेल से पॉलिश कर काले बर्तन तैयार किए जाते हैं।