02/02/26 | 12:36 pm

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संतुलित उर्वरकों का उपयोग: फसल के साथ ही मृदा स्वास्थ्य के लिए जरूरी

हरित क्रांति ने भारत के कृषि इतिहास में एक निर्णायक मोड़ स्थापित किया। कृषि के लिए शुरू की गई तमाम योजना का ही असर है कि आज देश “कठिनाई से गुजारा कमाऊ-खाऊ” की स्थिति से निकलकर आत्मनिर्भर और अंततः खाद्यान्न निर्यातक राष्ट्र में परिवर्तित करने में सहायक सिद्ध हुई है। इसमे सबसे बड़ा योगदान 1960 के दशक के मध्य में धान और गेहूं की उर्वरक-संवेदनशील उच्च उपज देने वाली किस्मों (HYVs) की शुरुआत, विस्तारित सिंचाई सुविधाओं और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के समर्थन शामिल है। खाद्यान्न उत्पादन में इस तीव्र वृद्धि ने न केवल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की, बल्कि भूख को उल्लेखनीय रूप से कम किया और ग्रामीण आजीविकाओं में सुधार लाया, जिससे भारत अन्य विकासशील देशों के लिए एक उदाहरण के रूप में उभरा।

हालांकि, इन उत्पादकता वृद्धि के आधार बने तीव्रीकरण ने धीरे-धीरे अपनी सीमाएं उजागर कर दीं। निरंतर खेती, नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों पर असंतुलित निर्भरता तथा जैविक खादों के उपयोग में कमी के परिणामस्वरूप पोषक तत्वों में असंतुलन उत्पन्न हुआ और मृदा स्वास्थ्य में क्रमिक गिरावट आई। उर्वरकों के अत्यधिक एवं असंतुलित उपयोग से द्वितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का क्षरण तेज हुआ, मृदा संरचना बिगड़ी तथा अपवाह और रिसाव के माध्यम से पोषक तत्वों की हानि बढ़ी।

मृदा उर्वरता में गिरावट फसल वृद्धि और उपज को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रही है:
पौधों की मेटाबॉलिजम प्रक्रियाओं को बाधित करके,
कीटों और रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाकर, तथा
उत्पाद की गुणवत्ता को कम करके।

असंतुलित उर्वरीकरण के दुष्परिणाम केवल मृदा क्षरण तक सीमित नहीं हैं। ये प्रक्रियाएं पर्यावरणीय प्रदूषण को और बढ़ावा देती हैं तथा संभावित स्वास्थ्य जोखिम भी उत्पन्न करती हैं। इसके नकारात्मक प्रभाव पशुधन क्षेत्र तक भी होते हैं, क्योंकि पोषक तत्वों से वंचित मृदाओं पर उगाई गई फसलों में अक्सर चारा एवं आहार के लिए आवश्यक खनिज तत्वों की कमी पाई जाती है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उनकी उत्पादकता में कमी आती है। परिणामस्वरूप, पोषक तत्वों का असंतुलन एकीकृत फसल–पशुधन उत्पादन प्रणालियों की दीर्घकालिक स्थिरता और दक्षता के लिए एक गंभीर बाधा बन जाता है। अतः मृदा उर्वरता को बनाए रखना और वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ कृषि पद्धतियों को अपनाना कृषि उत्पादन की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है। मृदा उर्वरता, जो इसके रासायनिक, भौतिक और जैविक गुणों द्वारा निर्धारित होती है, पोषक तत्वों के कुशल उपयोग, आर्थिक व्यवहार्यता तथा पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला है।

 

असंतुलित उर्वरीकरण से उत्पन्न हो रही चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने दीर्घकालिक उर्वरक प्रयोगों पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (AICRP-LTFE) की शुरुआत की। विभिन्न कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों तथा फसल प्रणालियों में लागू इस अध्ययन का उद्देश्य निरंतर उर्वरक प्रयोग के मृदा स्वास्थ्य, फसल उत्पादकता और प्रणाली की स्थिरता पर दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन करना था। इस अध्ययन से पोषक तत्वों के क्षरण, मृदा अवनयन तथा तर्कसंगत उर्वरक प्रबंधन की आवश्यकता के संबंध में सशक्त अनुभवजन्य साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जिनसे नीति निर्माण को दिशा मिली है और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए उच्च-इनपुट कृषि को बनाए रखने हेतु संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को प्रोत्साहन मिला है। इसी संदर्भ में, भारत सरकार मृदा स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित एवं बनाए रखने के लिए संतुलित उर्वरीकरण को एक प्रमुख रणनीति के रूप में सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है, जिससे सतत कृषि उत्पादकता को समर्थन मिल सके। कुंजी

संतुलित उर्वरीकरण: सतत कृषि की कुंजी
संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पोषक तत्वों के अधिकतम अवशोषण और हानियों को न्यूनतम करके उर्वरक उपयोग दक्षता को बढ़ाता है, साथ ही पोषक तत्वों के बीच सहक्रियात्मक अंतःक्रियाओं को प्रोत्साहित करता है, जो पौधों की बेहतर वृद्धि, फसल प्रदर्शन और उत्पादकता को सहारा देती हैं। यह दीर्घकाल में मृदा उर्वरता—जिसमें मृदा कार्बनिक पदार्थ और जैविक स्वास्थ्य शामिल हैं—को बनाए रखता है, पर्याप्त पोषण के माध्यम से संभावित और वास्तविक फसल उपज के बीच के अंतर को कम करने में सहायक होता है, तथा असंतुलित उर्वरक उपयोग से उत्पन्न पोषक तत्व अपवाह, रिसाव और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसे पर्यावरणीय प्रभावों को घटाता है।

संतुलित उर्वरीकरण का वैज्ञानिक आधार जस्टस वॉन लीबिग के न्यूनतम का नियम (Law of the Minimum) से जुड़ा है, जिसके अनुसार फसल की वृद्धि उस पोषक तत्व द्वारा सीमित होती है जिसकी उपलब्धता सबसे कम होती है, भले ही अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों। यह सिद्धांत इस बात को रेखांकित करता है कि किसी एक पोषक तत्व का अत्यधिक प्रयोग निरर्थक है, जब अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की कमी बनी रहती है। अतः संतुलित उर्वरीकरण का तात्पर्य सभी आवश्यक पादप पोषक तत्वों—मुख्य पोषक तत्वों तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों—का फसल की आवश्यकता, मृदा की उर्वरता स्थिति और प्रचलित जलवायु परिस्थितियों के आधार पर उचित अनुपात, मात्रा, समय और विधि से प्रयोग करना है। यह केवल नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) के उपयोग की पारंपरिक पद्धति से आगे बढ़कर एक समग्र पोषक तत्व प्रबंधन दृष्टिकोण को अपनाता है।

संतुलित उर्वरीकरण के लाभ
संतुलित उर्वरीकरण सतत कृषि का एक मूलभूत स्तंभ है, जो कृषि संबंधी, आर्थिक तथा पर्यावरणीय स्तर पर व्यापक लाभ प्रदान करता है:

–उच्च फसल उत्पादकता: संतुलित पोषक तत्व आपूर्ति से फसलें अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँच पाती हैं, जिससे उपज में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।

–उच्च उपज देने वाली किस्मों का सर्वोत्तम प्रदर्शन: उन्नत फसल किस्मों से अधिकतम उत्पादकता प्राप्त करने के लिए संतुलित पोषण अत्यंत आवश्यक है।

–पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार: पर्याप्त सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता मुख्य पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता को बढ़ाती है और अपव्यय को कम करती है।

–बेहतर फसल गुणवत्ता और तनाव सहनशीलता: संतुलित पोषण प्राप्त पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता और तनाव सहनशीलता अधिक होती है, जिससे मानव उपभोग और पशु आहार के लिए उच्च गुणवत्ता की उपज प्राप्त होती है।

–मृदा स्वास्थ्य और स्थिरता में सुधार: संतुलित उर्वरीकरण मृदा उर्वरता, सूक्ष्मजीवी गतिविधि, मृदा संरचना तथा जल धारण क्षमता को सुदृढ़ करता है।

–पर्यावरणीय जोखिमों में कमी: फसल की मांग के अनुरूप पोषक तत्वों का प्रयोग अपवाह, रिसाव और जल प्रदूषण को न्यूनतम करता है।

–लागत-प्रभावी इनपुट उपयोग: संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन किसानों को इनपुट्स का अधिकतम दक्षता से उपयोग करने में मदद करता है, अनावश्यक उर्वरक लागत को घटाता है तथा अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता के माध्यम से लाभ बढ़ाता है, जिससे यह दीर्घकाल में एक लागत-प्रभावी दृष्टिकोण बनता है।

 

संतुलित उर्वरीकरण की प्रक्रिया: मृदा से समाधान तक
संतुलित उर्वरीकरण प्राप्त करने के लिए विज्ञान, नीति, प्रौद्योगिकी और किसानों की सहभागिता को एकीकृत करने वाली बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता होती है। भारतीय कृषि में सतत पोषक तत्व प्रबंधन सुनिश्चित करने हेतु निम्नलिखित उपाय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM): संतुलित उर्वरीकरण प्राप्त करने के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM) एक मुख्य रणनीति है, जो स्मार्ट न्यूट्रिएंट यूज़ सिद्धांत पर आधारित है—एक व्यावहारिक, वैज्ञानिक ढांचा। यह जैविक इनपुट, खनिज उर्वरक और जैविक स्रोतों को विवेकपूर्ण तरीके से मिलाकर पोषक तत्वों के कुशल, किफायती और सतत उपयोग को सक्षम बनाता है। INM इस बात को मानता है कि केवल रासायनिक उर्वरक या केवल जैविक इनपुट फसलों की पूरी पोषण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए यह एक समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है, जिसमें शामिल हैं:
रासायनिक उर्वरक – आवश्यक मुख्य पोषक तत्व (NPK) प्रदान करने के लिए।
* जैविक पदार्थ – कम्पोस्ट, फार्मयार्ड मैन्योर, गोबर और हरित खाद जैसे धैंचा, मृदा संरचना, जल धारण क्षमता और सूक्ष्मजीव गतिविधि को बढ़ाने के लिए।
* फसल चक्र एवं अवशेष प्रबंधन – प्रणाली में विविधता बढ़ाने, कीट और रोग चक्र को तोड़ने, और पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार के लिए।

प्रौद्योगिकी के माध्यम से अनुकूलित उर्वरक: अनुकूलित उर्वरक विशेष फसल और मृदा की पोषक तत्व आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किए जाते हैं। इन उर्वरकों में मुख्य और सूक्ष्म पोषक तत्व वैज्ञानिक रूप से निर्धारित अनुपात में शामिल होते हैं। उदाहरण के लिए, स्थानीय मृदा में कमी के आधार पर जिंक, बोरॉन और सल्फर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व को यूरिया या DAP के साथ मिश्रित किया जा सकता है। यह लक्षित उपयोग पोषक तत्व हानियों को कम करने, उर्वरक दक्षता बढ़ाने और बेहतर फसल प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने में मदद करता है।

मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसाएं: मृदा परीक्षण संतुलित उर्वरीकरण में एक मूलभूत और आवश्यक कदम है। परीक्षण परिणामों के आधार पर मृदाओं को कम, मध्यम या उच्च पोषक तत्व स्तर वाली श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। पोषक तत्वों की कमी वाली मृदाओं के लिए उर्वरक की मात्रा बढ़ाई जाती है, और जहां पोषक तत्व पर्याप्त हों, वहां मात्रा घटाई जाती है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना इस दृष्टिकोण का समर्थन करती है और किसानों को खेत-विशेष मृदा डेटा प्रदान करके उन्हें अधिक सटीक उर्वरक आवेदन में सक्षम बनाती है और अत्यधिक उपयोग से बचाती है।

मृदा परीक्षण–फसल प्रतिक्रिया (STCR) दृष्टिकोण: STCR दृष्टिकोण उर्वरक आवेदन को सीधे फसल उपज लक्ष्यों से जोड़ता है। यह मृदा पोषक तत्व स्थिति, फसल प्रकार और स्थानीय जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक पोषक तत्व की सही मात्रा का आकलन करता है। यह विधि उर्वरक के अत्यधिक या अपर्याप्त उपयोग को रोकती है, पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार करती है और सतत फसल उत्पादन को समर्थन देती है।

निदान एवं अनुशंसा एकीकृत प्रणाली (DRIS): यह दृष्टिकोण केवल पूर्ण पोषक तत्व मानों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय पौध ऊतक का विश्लेषण करके पोषक तत्वों के अनुपात (जैसे N/P या N/K) का मूल्यांकन करता है। असंतुलन पाए जाने पर सुधारात्मक उपाय—आमतौर पर शीर्ष पर ड्रेसिंग (top dressing) के माध्यम से—सुझाए जाते हैं। यह दृष्टिकोण लंबी अवधि वाली फसलों के लिए लाभकारी है और गेहूं व सोयाबीन में सकारात्मक परिणाम दिखा चुका है।

स्थल-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन (SSNM): यह दृष्टिकोण फसल की वास्तविक आवश्यकता और खेत के भीतर मृदा भिन्नता के अनुसार उर्वरक के आवेदन पर केंद्रित है। समान उर्वरक खुराक के बजाय, यह सुनिश्चित करता है कि पोषक तत्व केवल वहीं और तभी लगाए जाएँ, जहाँ और जब उनकी आवश्यकता हो। इसमें शामिल हैं:
* खेत की भिन्नताओं का आकलन करके मृदा उर्वरता के अंतर को समझना
* मौजूदा पोषक स्रोतों का उपयोग, जैसे मृदा भंडार, फसल अवशेष और जैविक खाद
* केवल पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए उर्वरक का उपयोग करना, अत्यधिक उपयोग से बचना

 

यह दृष्टिकोण तीन चरणों में कार्यान्वित किया जाता है:
स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर यथार्थवादी उपज लक्ष्य निर्धारित करना
मृदा और जैविक स्रोतों से प्राकृतिक पोषक तत्व आपूर्ति का आकलन करना
शेष कमी को पूरा करने के लिए उर्वरक लागू करना

पुनर्योजी कृषि: संतुलित उर्वरीकरण के लिए एक पूरक दृष्टिकोण
पुनर्योजी कृषि एक समग्र खेती का दृष्टिकोण है, जिसका केंद्र मृदा स्वास्थ्य की पुनर्स्थापना और जैव विविधता को बढ़ाना है। इसके मुख्य अभ्यासों में मृदा में व्यवधान कम करना, फसल चक्र को बढ़ावा देना, कवर क्रॉप्स की खेती करना और कृषि वानिकी (एग्रोफॉरेस्ट्री) प्रणालियों को शामिल करना शामिल है।
मृदा संरचना में सुधार और कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाकर, पुनर्योजी कृषि प्रथाएँ मृदा की पोषक तत्व और जल धारण क्षमता को बढ़ाती हैं, जिससे फसलों द्वारा पोषक तत्वों का अधिक कुशल अवशोषण संभव होता है। इसका परिणाम पोषक तत्वों की हानि में कमी, उर्वरक के पुनरावृत्ति प्रयोग की आवश्यकता में कमी और पोषक तत्वों के अधिक कुशल उपयोग के रूप में सामने आता है, जो संतुलित उर्वरीकरण का समर्थन करता है। भारतीय संदर्भ में, व्यापक रूप से अपनाई जाने वाली पुनर्योजी कृषि प्रथाओं में सूक्ष्म सिंचाई, प्रिसिजन मैकेनाइजेशन, प्राकृतिक खेती, कवर क्रॉपिंग, मल्चिंग और जलवायु-सहनशील कृषि प्रणाली शामिल हैं।

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