विश्व अल्जाइमर दिवस : भूलने की बीमारी से आगे, स्मृति और सम्मान बचाने की चुनौती

मनुष्य की पहचान केवल उसके नाम, चेहरे या शरीर से नहीं होती। उसकी असली पहचान उसकी यादों, अनुभवों, रिश्तों, भाषा, आदतों और जीवन से जुड़ी छोटी-बड़ी स्मृतियों से बनती है। यही कारण है कि जब किसी व्यक्ति की स्मरण शक्ति और सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है, तो इसका असर केवल उसके स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास, व्यवहार, सामाजिक जीवन और परिवार पर पड़ता है। अल्जाइमर रोग इसी चुनौती का एक गंभीर रूप है। यह केवल भूलने की सामान्य समस्या नहीं, बल्कि मस्तिष्क से जुड़ी ऐसी खतरनाक बीमारी है, जो समय के साथ स्मृति, सोच, निर्णय लेने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। उम्र बढ़ने के साथ कुछ बातें भूल जाना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार एक ही बात पूछना, परिचित लोगों या स्थानों को पहचानने में परेशानी होना, रोजमर्रा के कामों में कठिनाई, बातचीत में सही शब्द न मिलना या व्यवहार में असामान्य बदलाव जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय रहते चिकित्सकीय सलाह और उचित जांच से स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है। नियमित शारीरिक व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, मानसिक सक्रियता और सामाजिक जुड़ाव मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माने जाते हैं। जागरूकता, संवेदनशीलता और परिवार का सहयोग इस बीमारी से प्रभावित व्यक्ति के जीवन को सम्मानजनक, सहज, सुरक्षित और गरिमापूर्ण बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

अल्जाइमर और डिमेंशिया में क्या अंतर है?

अल्जाइमर को समझने से पहले डिमेंशिया को समझना जरूरी है। डिमेंशिया किसी एक बीमारी का नाम नहीं, बल्कि मस्तिष्क की कार्यक्षमता में गिरावट से जुड़ी व्यापक स्थिति है। इसमें याददाश्त, सोचने-समझने, भाषा, निर्णय लेने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। अल्जाइमर डिमेंशिया का सबसे आम कारण है, लेकिन हर डिमेंशिया अल्जाइमर नहीं होता। इसके अन्य प्रमुख प्रकारों में वैस्कुलर डिमेंशिया, लेवी बॉडी डिमेंशिया और फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया शामिल हैं। कुछ लोगों में डिमेंशिया के एक से अधिक प्रकार के बदलाव भी पाए जा सकते हैं। इसलिए भूलने की समस्या को तुरंत अल्जाइमर मान लेना उचित नहीं है। स्मृति कमजोर होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं और कुछ कारणों का उपचार संभव है। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

बीमारी को केवल उम्र का असर मानना ठीक नहीं

अल्जाइमर और डिमेंशिया को लेकर सबसे आम गलतफहमियों में से एक यह है कि ये उम्र बढ़ने की स्वाभाविक प्रक्रिया हैं। वास्तव में ऐसा नहीं है। उम्र डिमेंशिया का सबसे महत्वपूर्ण ज्ञात जोखिम कारक जरूर है, लेकिन डिमेंशिया सामान्य उम्र बढ़ने का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह 65 वर्ष से अधिक उम्र में अधिक आम है, लेकिन कम उम्र में भी इसके मामले हो सकते हैं। इसलिए उम्र को बीमारी का अकेला कारण मानने के बजाय व्यक्ति के व्यवहार और कार्यक्षमता में आए बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। खासकर तब, जब समस्या धीरे-धीरे बढ़ रही हो और व्यक्ति के सामान्य जीवन में हस्तक्षेप करने लगे।

शुरुआती संकेतों को पहचानना क्यों जरूरी है?

अल्जाइमर के शुरुआती संकेत अक्सर सामान्य भूलने की समस्या जैसे लग सकते हैं। व्यक्ति हाल की बातें भूल सकता है, एक ही सवाल बार-बार पूछ सकता है, सामान रखकर भूल सकता है या बातचीत के दौरान सही शब्द खोजने में कठिनाई महसूस कर सकता है। आगे चलकर परिचित रास्तों पर जाने, समय और स्थान समझने, निर्णय लेने तथा रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है। कुछ मामलों में स्मृति कमजोर होने से पहले व्यवहार और मनोदशा में बदलाव भी दिखाई देते हैं। व्यक्ति सामाजिक गतिविधियों से दूर रहने, अधिक चिंतित या उदास रहने लग सकता है। हालांकि, इन संकेतों का मतलब सीधे अल्जाइमर नहीं है। ऐसे बदलाव दिखने पर चिकित्सकीय सलाह और उचित जांच जरूरी है।

मस्तिष्क में क्या होता है?

अल्जाइमर एक जटिल न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, जिसमें मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं और उनके बीच संपर्क धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। वैज्ञानिक शोध में अमाइलॉयड और टाऊ प्रोटीन से जुड़े बदलावों को महत्वपूर्ण माना गया है। बीमारी बढ़ने पर मस्तिष्क के कुछ हिस्सों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और न्यूरॉन्स के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान बाधित होता है। हालांकि, अल्जाइमर को केवल एक प्रोटीन या जैविक प्रक्रिया से समझना पर्याप्त नहीं है। उम्र, आनुवंशिक प्रवृत्ति, रक्त वाहिकाओं का स्वास्थ्य, चयापचय संबंधी समस्याएं और जीवनशैली भी जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए शोध का जोर अब शुरुआती पहचान, जोखिम कम करने और प्रभावी उपचार के नए तरीकों पर भी है।

किन लोगों में जोखिम अधिक हो सकता है?

उम्र डिमेंशिया का सबसे महत्वपूर्ण ज्ञात जोखिम कारक है, लेकिन इसके अलावा कई ऐसे कारक हैं, जिन्हें नियंत्रित करके जोखिम कम किया जा सकता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, हानिकारक मात्रा में शराब का सेवन, सामाजिक अलगाव, अवसाद, सुनने-देखने की समस्या, सिर की चोट, स्ट्रोक और वायु प्रदूषण को डिमेंशिया के बढ़े जोखिम से जोड़ा गया है। इसलिए मस्तिष्क का स्वास्थ्य शरीर के समग्र स्वास्थ्य से जुड़ा है। हृदय, रक्त वाहिकाओं और चयापचय को स्वस्थ रखना भी संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। जुलाई 2026 में WHO ने डिमेंशिया के जोखिम को कम करने संबंधी दिशानिर्देश अपडेट किए। उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुसार, डिमेंशिया के जोखिम का 45 प्रतिशत तक हिस्सा ऐसे कारकों से जुड़ा हो सकता है, जिन्हें जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी उपायों से रोका या टाला जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बीमारी को हर व्यक्ति में निश्चित रूप से रोका जा सकता है। संदेश यह है कि स्वस्थ जीवनशैली और जोखिम कारकों का नियंत्रण मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद कर सकता है।

स्वस्थ जीवन शैली की भूमिका

मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए कोई एक चमत्कारी उपाय नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, सामाजिक सक्रियता और मानसिक रूप से सक्रिय रहना उपयोगी आदतें हैं। रक्तचाप, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना भी जरूरी है। पढ़ना, नई चीजें सीखना, संगीत, लेखन, बातचीत और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना मानसिक सक्रियता बनाए रखने में मदद करता है। सुनने में परेशानी होने पर समय पर जांच और जरूरत के अनुसार श्रवण यंत्र का इस्तेमाल भी महत्वपूर्ण है। WHO के अनुसार डिमेंशिया का जोखिम जीवन के अलग-अलग चरणों में जमा होता है। इसलिए स्वस्थ जीवनशैली की आदतें बचपन और युवावस्था से विकसित करना मस्तिष्क के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है।

समय पर निदान क्यों जरूरी है?

2026 के विश्व अल्जाइमर माह का महत्वपूर्ण संदेश है कि निदान में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। शुरुआती पहचान से व्यक्ति और परिवार को भविष्य की देखभाल, आर्थिक मामलों और महत्वपूर्ण निर्णयों की समय रहते योजना बनाने का अवसर मिलता है। जांच से यह भी पता लगाया जा सकता है कि स्मृति और व्यवहार में बदलाव के पीछे कोई अन्य कारण तो नहीं है। दवाओं के प्रभाव, पोषण संबंधी कमी, नींद की समस्या, अवसाद या अन्य चिकित्सकीय स्थितियां भी ऐसी समस्याओं का कारण हो सकती हैं। इसलिए किसी बुजुर्ग के बार-बार भूलने पर उसे डांटने या मजाक बनाने के बजाय शांतिपूर्वक चिकित्सकीय सलाह लेना अधिक उपयोगी कदम है।

निदान की प्रक्रिया कैसी होती है?

अल्जाइमर की पहचान केवल एक साधारण रक्त जांच से नहीं होती। डॉक्टर पहले व्यक्ति के स्वास्थ्य और बीमारी का इतिहास समझते हैं तथा परिवार से व्यवहार और रोजमर्रा के कामों में आए बदलावों की जानकारी लेते हैं। इसके बाद संज्ञानात्मक परीक्षण, शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल जांच की जाती है। जरूरत पड़ने पर MRI या CT स्कैन जैसे मस्तिष्क इमेजिंग परीक्षण भी किए जा सकते हैं। आधुनिक चिकित्सा में बायोमार्कर और रक्त आधारित जांचों पर भी तेजी से शोध हो रहा है। हालांकि, किसी भी जांच के परिणाम को व्यक्ति के लक्षणों और चिकित्सकीय मूल्यांकन के संदर्भ में समझना जरूरी है। सही निदान के लिए विशेषज्ञ की सलाह महत्वपूर्ण है।

उपचार में क्या बदलाव आ रहे हैं?

अभी डिमेंशिया का पूर्ण इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मरीज के लिए कुछ नहीं किया जा सकता। लक्षणों को नियंत्रित करने, दैनिक कार्यक्षमता बनाए रखने, मानसिक और सामाजिक सक्रियता बढ़ाने तथा जीवन की गुणवत्ता सुधारने के कई तरीके मौजूद हैं। WHO के अनुसार शारीरिक गतिविधि, सामाजिक जुड़ाव, संज्ञानात्मक गतिविधियां, पुनर्वास और देखभालकर्ताओं को सहयोग देने से मरीज के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। अल्जाइमर के शुरुआती चरणों में बीमारी की गति को प्रभावित करने वाले नए उपचारों पर भी शोध जारी है। इनकी पात्रता, संभावित लाभ, जोखिम और उपलब्धता व्यक्ति की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा लेना उचित नहीं है। Alzheimer’s Disease International के अनुसार 2026 में अल्जाइमर और डिमेंशिया से जुड़े 192 क्लिनिकल ट्रायल में 158 दवाएं पाइपलाइन में हैं। हालांकि, किसी दवा का क्लिनिकल ट्रायल में होना उसके प्रभावी और सुरक्षित उपचार के रूप में स्थापित होने की गारंटी नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक परीक्षणों और नियामकीय मूल्यांकन के परिणाम जरूरी हैं।

परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण क्यों है?

अल्जाइमर केवल मरीज की बीमारी नहीं रह जाती, बल्कि धीरे-धीरे पूरे परिवार के जीवन को प्रभावित करती है। जो व्यक्ति पहले घर के काम, आर्थिक फैसले, खरीदारी या बाहर आने-जाने जैसे काम स्वयं करता था, उसे आगे चलकर सहायता की जरूरत पड़ सकती है। देखभाल करने वाले परिवार के सदस्यों के लिए यह भावनात्मक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण अनुभव हो सकता है। मरीज एक ही बात बार-बार पूछ सकता है, परिचित लोगों को पहचानने में कठिनाई हो सकती है या उसके व्यवहार में बदलाव आ सकता है। ऐसी स्थिति में बहस या डांटने के बजाय शांत संवाद, धैर्य और नियमित दिनचर्या अधिक उपयोगी होती है। WHO के अनुसार, 2019 में डिमेंशिया की वैश्विक आर्थिक लागत लगभग 1.3 ट्रिलियन डॉलर थी। देखभाल के घंटों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत थी। इसलिए परिवारों को चिकित्सा के साथ परामर्श, प्रशिक्षण, विश्राम और सामाजिक सहयोग भी मिलना जरूरी है।

भारत के सामने विशेष चुनौती

भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश में डिमेंशिया की चुनौती को सामाजिक परिस्थितियों और स्वास्थ्य व्यवस्था के संदर्भ में समझना जरूरी है। बुजुर्गों की बढ़ती आबादी, संयुक्त परिवारों में बदलाव, शहरों की ओर पलायन और कामकाजी परिवारों की व्यस्तता के कारण लंबे समय तक घर पर देखभाल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंच, जबकि शहरों में महंगी जांच और विशेषज्ञ परामर्श बड़ी बाधाएं बन सकते हैं। कई परिवार स्मृति संबंधी समस्याओं को उम्र का सामान्य हिस्सा मान लेते हैं, जिससे इलाज में देरी हो सकती है। भारत सरकार का National Programme for Health Care of the Elderly (NPHCE) बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर केंद्रित है। इसके तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से जिला अस्पतालों और जेरियाट्रिक केंद्रों तक सेवाओं का ढांचा विकसित किया गया है। इसमें स्वास्थ्य संवर्धन, बचाव, निदान, उपचार और पुनर्वास शामिल हैं। आगे प्राथमिक स्तर के स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देकर शुरुआती संकेतों की पहचान और समय पर विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।

कलंक बीमारी से बड़ी बाधा न बन जाए

अल्जाइमर और डिमेंशिया से जुड़े सामाजिक कलंक को दूर करना बेहद जरूरी है। किसी व्यक्ति के भूलने, भ्रमित होने या व्यवहार में बदलाव को लेकर उसका मजाक उड़ाना उसके आत्मसम्मान को चोट पहुंचा सकता है। परिवार भी बीमारी को छिपाने लगे तो समय पर मदद मिलने की संभावना कम हो जाती है। WHO के अनुसार डिमेंशिया के बारे में जागरूकता और समझ की कमी के कारण लोगों को कलंक और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए भाषा और व्यवहार दोनों में संवेदनशीलता जरूरी है। मरीज को केवल उसकी बीमारी से पहचानना सही नहीं है। वह वही व्यक्ति है जिसने जीवनभर परिवार और समाज में अपनी भूमिका निभाई है। बीमारी उसकी गरिमा और अधिकारों को समाप्त नहीं करती।

तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नई संभावनाएं

स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से डिमेंशिया की पहचान और देखभाल के नए रास्ते खुल रहे हैं। टेलीमेडिसिन से दूरदराज के मरीजों को विशेषज्ञ सलाह तक पहुंच मिल सकती है। डिजिटल संज्ञानात्मक परीक्षण, पहनने योग्य उपकरण और मोबाइल आधारित निगरानी से मरीज की दैनिक गतिविधियों और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल भी शुरुआती संकेतों की पहचान, आवाज और भाषा के विश्लेषण तथा संभावित जोखिमों के आकलन जैसे क्षेत्रों में शोध का विषय बना हुआ है। लेकिन तकनीक के साथ निजता, डेटा सुरक्षा, गलत निष्कर्ष और डिजिटल असमानता जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हैं। इसलिए AI को चिकित्सकीय विशेषज्ञता का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक उपकरण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

रोकथाम को जीवनशैली से जोड़ना होगा

अल्जाइमर के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि चर्चा केवल बीमारी शुरू होने के बाद के उपचार तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मस्तिष्क का स्वास्थ्य जीवनभर की आदतों से जुड़ा है। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, रक्तचाप और मधुमेह पर नियंत्रण, धूम्रपान से दूरी, पर्याप्त नींद, सामाजिक संपर्क और मानसिक सक्रियता जैसी आदतें व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। इनका उद्देश्य अल्जाइमर से बचाव की गारंटी देना नहीं, बल्कि उन जोखिमों को कम करना है जिन पर व्यक्ति कुछ हद तक नियंत्रण रख सकता है। यही सोच WHO के 2026 के नए दिशानिर्देशों में भी दिखाई देती है, जिसमें डिमेंशिया के जोखिम को कम करने को जीवन के अलग-अलग चरणों में स्वास्थ्य संबंधी उपायों से जोड़ने पर जोर दिया गया है।

देखभाल का अर्थ केवल दवा नहीं

अल्जाइमर के मरीज के लिए दवा महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन देखभाल का अर्थ इससे कहीं व्यापक है। घर का वातावरण सुरक्षित होना चाहिए। दवाओं का नियमित प्रबंधन, गिरने से बचाव, पर्याप्त भोजन और पानी, नींद तथा दैनिक गतिविधियों पर ध्यान देना जरूरी है। मरीज को उसकी क्षमता के अनुसार काम करने का अवसर देना चाहिए। हर काम अपने हाथ में ले लेना उसकी बची हुई आत्मनिर्भरता को और कम कर सकता है। इसके बजाय जहां जरूरत हो, वहां सहायता और जहां संभव हो, वहां स्वतंत्रता देना बेहतर है। संगीत सुनना, पुराने परिचित गीतों या तस्वीरों के माध्यम से बातचीत करना, बागवानी, हल्की शारीरिक गतिविधि और परिवार के साथ समय बिताना मरीज के भावनात्मक जीवन को सहारा दे सकता है। ऐसी गतिविधियों का उद्देश्य बीमारी को ठीक करना नहीं, बल्कि व्यक्ति की जीवन गुणवत्ता और भावनात्मक जुड़ाव को बनाए रखना है।

मरीज के अधिकार और गरिमा

डिमेंशिया बढ़ने के साथ व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी इच्छाओं और सम्मान का कोई महत्व नहीं रह जाता। शुरुआती अवस्था में व्यक्ति से उसकी प्राथमिकताओं, भविष्य की देखभाल और महत्वपूर्ण निर्णयों के बारे में बातचीत करना इसलिए जरूरी है। देखभाल के दौरान अनावश्यक नियंत्रण, अपमानजनक व्यवहार या मरीज को हर निर्णय से अलग कर देना उचित नहीं है। स्वास्थ्य व्यवस्था और परिवार दोनों को व्यक्ति की गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों का ध्यान रखना चाहिए। WHO ने डिमेंशिया के संदर्भ में मानवाधिकार आधारित देखभाल की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।

शोध की दिशा और आने वाला समय

अल्जाइमर के क्षेत्र में शोध का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। एक ओर नई दवाओं और disease-modifying therapies पर अध्ययन हो रहा है, दूसरी ओर ऐसे biomarkers खोजे जा रहे हैं जिनसे बीमारी को लक्षण बहुत स्पष्ट होने से पहले पहचानने में मदद मिल सके। भविष्य में संभवतः ऐसी चिकित्सा व्यवस्था विकसित हो जहां व्यक्ति के जोखिम, जैविक संकेतों, जीवनशैली और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों को एक साथ देखकर उपचार की योजना बनाई जाए। लेकिन इसके लिए बड़े पैमाने पर अनुसंधान, विविध आबादी की भागीदारी और लंबे समय तक वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होंगे। 2026 में ADI द्वारा क्लिनिकल ट्रायल पर विशेष ध्यान दिया जाना इसी दिशा का संकेत है। नई चिकित्सा को प्रयोगशाला से मरीज तक पहुंचाने के लिए वैज्ञानिक परीक्षणों की विश्वसनीयता और उसमें मरीजों की भागीदारी दोनों महत्वपूर्ण हैं।

समाज को क्या करना चाहिए?

अल्जाइमर से निपटने की जिम्मेदारी केवल डॉक्टर या परिवार की नहीं हो सकती। समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। सार्वजनिक स्थानों को बुजुर्गों के लिए अधिक सुरक्षित और अनुकूल बनाया जा सकता है। स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं। परिवारों को परामर्श और सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है। स्कूलों और कॉलेजों में भी उम्रदराज लोगों के प्रति संवेदनशीलता और मानसिक स्वास्थ्य की समझ विकसित करना उपयोगी होगा। मीडिया की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बीमारी को सनसनी या डर के रूप में पेश करने के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करना जरूरी है।

डिमेंशिया का असर मरीज से आगे पूरे परिवार तक

विश्व अल्जाइमर दिवस हमें केवल एक बीमारी के बारे में जागरूक नहीं करता, बल्कि यह भी सोचने का अवसर देता है कि बढ़ती उम्र के समाज में हम अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करें। अल्जाइमर में स्मृति कमजोर हो सकती है, लेकिन व्यक्ति की गरिमा, भावनाएं और रिश्तों का महत्व बना रहता है। डिमेंशिया का प्रभाव केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार, स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसका सामना करने के लिए समय पर पहचान, सही निदान, उपलब्ध उपचार का उचित इस्तेमाल, स्वस्थ जीवनशैली, परिवार की भागीदारी और देखभाल कर्ताओं को सहयोग जरूरी है। 2026 के विश्व अल्जाइमर माह की थीम “The Earlier You Know, The More You Can Do” समय पर जानकारी और जांच के महत्व को रेखांकित करती है। भूलने की समस्या को हमेशा उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। शुरुआती पहचान से व्यक्ति और परिवार को बेहतर तैयारी और देखभाल की योजना बनाने का अवसर मिलता है। अंततः अल्जाइमर से जुड़ी चुनौती केवल स्मृति बचाने की नहीं, बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने की भी है। यह आलेख अटल बिहारी वाजपेयी आयुर्विज्ञान संस्थान एवं डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ. आशीष कुमार दुग्गल से हुई विस्तृत बातचीत और उनके दीर्घ चिकित्सकीय अनुभव एवं शोध पर आधारित है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।