“विश्व मातृभाषा दिवस : मातृभाषा में निहित है सृजन, संवेदना और सांस्कृतिक निरंतरता”

जब सृष्टि की विराट निस्तब्धता को चीरती हुई किसी नवजीवन की प्रथम किलकारी आकाश में तरंगित होती है, उसी क्षण मानव सभ्यता का सबसे कोमल, किन्तु सबसे प्रखर अध्याय आरम्भ होता है वो है मातृभाषा का अध्याय। वह ध्वनि केवल स्वर नहीं होती; वह जीवन की उद्घोषणा होती है। वह केवल उच्चारण नहीं, अस्तित्व का प्रथम आलाप होता है। मातृभाषा कोई साधारण व्याकरण नहीं, वह ममता की मृदुल उंगलियों से गढ़ी हुई भाव-प्रतिमा है; वह मां की गोद में उतरती लोरी की लय है; वह उस मिट्टी की महक है, जिसमें पीढ़ियों के संस्कार, संघर्ष और स्वप्न गहराई से रचे-बसे होते हैं। प्रत्येक वर्ष 21 फरवरी को विश्व समुदाय International Mother Language Day के रूप में मातृभाषाओं के सम्मान, संरक्षण और संवर्धन का संकल्प दोहराता है। यह दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भाषाई विविधता के संरक्षण का वैश्विक घोष है। एक स्मरण कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि सभ्यता का संस्कार है।

मातृभाषा चेतना का प्रथम दीप

मातृभाषा चेतना का प्रथम दीप है वह दीप जो मन के अंधकार में अर्थ का आलोक भर देता है। इसी के सहारे हम संसार को पहचानते हैं, संबंधों को संज्ञा देते हैं, संवेदनाओं को स्वर प्रदान करते हैं। इसी में “मां” का संबोधन अर्थ पाता है, “घर” की परिभाषा आकार लेती है, “अपनापन” की अनुभूति आकार ग्रहण करती है। यह हमारी स्मृतियों का निधि-कोष है, हमारी पहचान का प्राणतत्व है, हमारे स्वाभिमान का सुवर्ण-चिह्न है। जब हम मातृभाषा में बोलते हैं, तब केवल शब्द नहीं बहते हमारी आत्मा अपनी संपूर्ण सच्चाई और सहजता के साथ प्रकट होती है; हमारी चेतना बिना किसी आवरण के स्वयं को अभिव्यक्त करती है।

युगों से मातृभाषाएं दीपशिखा-सी अडिग रहीं

इतिहास की अनवरत धारा में साम्राज्य उठे और ध्वस्त हुए, सीमाएं खिंचीं और मिट गईं, युगों ने समय के पृष्ठ पलटे; किंतु मातृभाषाएं दीपशिखा-सी अडिग रहीं आंधियों से जूझती हुई, पर बुझी नहीं। उनमें लोकगीतों की गूंज है, ऋषियों के ध्यान की गंभीरता है, किसानों की थकान भरी सांसों का स्वर है, कवियों की करुणा और क्रांति की पुकार है। वे केवल संस्कृति की वाहक नहीं, सभ्यता की संवाहक हैं। अतीत की स्मृति, वर्तमान की अभिव्यक्ति और भविष्य की संभावनाओं को जोड़ने वाला जीवंत सेतु।

मातृभाषा है मनुष्य की आत्मा का महाकाव्य

मातृभाषा की यह महागाथा किसी भाषाई अस्तित्व की मात्र कथा नहीं; यह मनुष्य की आत्मा का महाकाव्य है। यहां प्रत्येक अक्षर एक संस्कार है, प्रत्येक शब्द एक अनुभव-सम्पदा है, प्रत्येक वाक्य एक कालखंड की धड़कन है। मातृभाषा में मानवता सांस लेती है, इतिहास बोलता है और भविष्य आकार लेता है। यही वह अमर गीत है, जो समय के पार भी गूंजता रहता है अनश्वर, अविचल, आलोकित।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: रक्त से लिखी गई वर्णमाला

मातृभाषा के संघर्ष का इतिहास बलिदान की स्याही से लिखा गया है। 21 फरवरी 1952 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में उर्दू को एकमात्र राजभाषा घोषित किए जाने के विरोध में छात्रों ने आंदोलन किया। 21 फरवरी को ढाका विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें कई छात्र शहीद हुए। वे केवल शरीरों को नहीं बेध रही थीं, वे एक संस्कृति की जुबान को खामोश करने की कोशिश थी। यह घटना केवल राजनीतिक विरोध नहीं थी, यह अपनी मातृभाषा बांग्ला के सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई थी। यूनेस्को द्वारा इस दिन को वैश्विक स्वीकृति देना इस बात का प्रमाण है कि भाषा केवल संवाद का सेतु नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक अस्मिता का सबसे प्रखर अस्त्र है। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी राष्ट्र को गुलाम बनाना होता है, सबसे पहले उसकी भाषा छीनी जाती है। भाषा का जाना, एक सामूहिक स्मृति (Collective Memory) का मिट जाना है।

मातृभाषा और सांस्कृतिक अस्मिता

भाषा केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना की वाहक है। प्रत्येक मातृभाषा में उस समाज की जीवनशैली, परंपराएं, आस्थाएं, उत्सव, लोकगीत, लोक कथाएं और सामूहिक स्मृतियां निहित होती हैं। भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में यह विविधता अद्भुत है। यहां भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं मान्यता प्राप्त हैं। असमिया,बंगाली,गुजराती, हिंदी, कन्नड़,कश्मीरी, कोंकणी,मलयालम,मणिपुरी,मराठी, नेपाली, ओड़िया (पहले उड़िया), पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली, डोगरी। पर इनसे इतर सैकड़ों बोलियां और भाषाएं हैं जो लोग जीवन में प्रचलित हैं। जब कोई बच्चा अपनी मातृभाषा में सीखता है, तो वह केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त नहीं करता, वह अपनी संस्कृति से जुड़ता है। मातृभाषा में शिक्षा, विचार और संवेदना का संप्रेषण सहज और गहरा होता है। यही कारण है कि विश्व भर के शिक्षाविद प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर बल देते हैं।

मातृभाषा है संस्कृति की संवाहिका

भाषा संस्कृति की संवाहिका होती है। यदि संस्कृति एक वृक्ष है, तो मातृभाषा उसका रस (Sap) है। हर भाषा की अपनी एक ‘तासीर’ होती है। हिंदी का ‘ममता’, संस्कृत का ‘वात्सल्य’ या तमिल का ‘अंबु’ (Anbu) जो सूक्ष्म भाव पैदा करते हैं, उनका शब्दकोशों में अनुवाद तो संभव है, पर आत्मा का स्थानांतरण नहीं। हमारी लोककथाएं, मुहावरे, लोकोक्तियां और वे पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां जो दादियों-नानियों की जुबान पर जीवित थीं, वे मातृभाषा के साथ ही दम तोड़ रही हैं। भाषा का लुप्त होना एक ‘एनसाइक्लोपीडिया’ के जल जाने के समान है।

मातृभाषा में मौलिकता का उत्सव

मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) के शोध यह सिद्ध कर चुके हैं कि मनुष्य की मौलिक सोच (Original Thinking) उसकी मातृभाषा में ही प्रस्फुटित होती है। जो बच्चा अपनी प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में पाता है, उसकी समस्या समाधान (Problem Solving) की क्षमता और सृजनात्मकता अन्य बच्चों की तुलना में 40% अधिक होती है। जब हम बच्चे पर विदेशी भाषा थोपते हैं, तो उसका मस्तिष्क ज्ञान अर्जित करने के बजाय ‘अनुवाद’ करने के कठिन श्रम में उलझ जाता है। इससे ‘रटंत विद्या’ को बढ़ावा मिलता है और मौलिक शोध की संभावना कम हो जाती है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा में अनिवार्य करने की पहल इसी वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है।

मातृभाषा में सामाजिक समरसता

समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से भाषा वह ‘गोंद’ है जो विभिन्न वर्गों को जोड़ती है। जब कोई उच्चाधिकारी किसी ग्रामीण से उसकी मातृभाषा या बोली में बात करता है, तो सत्ता का अहंकार गिर जाता है और एक मानवीय संबंध स्थापित होता है। कोई भी राष्ट्र तब तक पूर्ण विकसित नहीं कहला सकता जब तक उसका ज्ञान-विज्ञान उसकी आम जनता की भाषा में न हो। मातृभाषा ही वह माध्यम है, जिससे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को लोकतंत्र की मुख्यधारा में लाया जा सकता है।

वैश्वीकरण की चुनौती और भाषाओं का संकट

21वीं सदी ‘भाषाई नरसंहार’ (Linguistic Genocide) की साक्षी बन रही है। भाषाई विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया की लगभग 7000 भाषाओं में से आधी इस सदी के अंत तक विलुप्त हो सकती हैं। हर दो सप्ताह में एक भाषा अपनी अंतिम सांस ले रही है। वर्तमान में इंटरनेट की 80% से अधिक सामग्री केवल 10 भाषाओं में सिमटी है। यह स्थिति अन्य भाषाओं को ‘अदृश्य’ बना रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में यदि हम अपनी भाषाओं का डेटाबेस तैयार नहीं करते, तो तकनीक के नक्शे से हमारी पहचान मिट जाएगी।

विविधता का महासागर

भारत विश्व का सबसे समृद्ध भाषाई प्रयोगशाला है। यहां भाषाएं एक-दूसरे को काटती नहीं, बल्कि रचती-बुनती हैं। दक्षिण की ‘मणिप्रवालम’ शैली हो या उत्तर की ‘हिंदुस्तानी’ (हिंदी-उर्दू का मेल), भारत ने हमेशा भाषाओं के सह-अस्तित्व का उत्सव मनाया है। भारत की अष्टम अनुसूची की 22 भाषाएं और सैकड़ों बोलियां हमारे लोकतंत्र की असली ताकत हैं। भारत को भाषाई कट्टरता से बचते हुए एक ऐसे संतुलन की आवश्यकता है जहां मातृभाषा को ‘हृदय’, राष्ट्रभाषा को ‘प्राण’ और वैश्विक भाषा को ‘खिड़की’ माना जाए।

मातृभाषा में संवेदना का शिखर

साहित्य की आत्मा मातृभाषा में ही खिलती है। साहित्य वह दर्पण है जिसमें भाषा अपनी सुंदरता देखती है। तुलसी की अवधी, मीरा की राजस्थानी, टैगोर की बांग्ला, विद्यापति की मैथिली, नामदेव की मराठी, कबीर की अवधी-ब्रज, प्रेमचंद की हिंदी, इन महाकवियों ने अपनी भाषाओं को वह गरिमा दी कि वे अमर हो गईं। कोई भी रचनाकार अपनी मातृभाषा में जितनी गहराई से अपनी पीड़ा या आनंद व्यक्त कर सकता है, वह किसी अन्‍य भाषा में संभव नहीं। मातृभाषा लेखक को वह ‘मुहावरा’ प्रदान करती है जो सीधा पाठक के मर्म को भेदता है।

भाषिक शोध एवं भविष्य की राह

आधुनिक शोध बताते हैं कि बहुभाषी (Multilingual) होना मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। अल्जाइमर जैसी बीमारियों का प्रभाव उन लोगों पर कम होता है जो अपनी मातृभाषा के साथ सक्रिय रहते हैं। डिजिटल सशक्तिकरण हमें अपनी मातृभाषाओं को कोडिंग, सॉफ्टवेयर और डिजिटल कंटेंट से जोड़ना होगा। विकिपीडिया जैसे प्लेटफार्मों पर स्थानीय भाषाओं में ज्ञान का विस्तार करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

एक सभ्यता का संकल्प

मातृभाषा का प्रश्न मात्र भावुकता का विषय नहीं, यह हमारे अस्तित्व, अस्मिता और आत्मसम्मान का प्रश्न है। अपनी भाषा को त्याग देना मानो अपनी ही स्मृतियों को स्वयं ‘फॉर्मेट’ कर देना है। अपने इतिहास, अपने लोकानुभव और अपनी सांस्कृतिक चेतना को विस्मृति के अंधकार में धकेल देना है। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, वह हमारे सामूहिक अनुभवों की जीवित धरोहर है; वह हमारी पहचान की आधारशिला है। हमें ऐसा समाज निर्मित करना होगा जहां अपनी भाषा बोलना पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि जड़ों से गहरे जुड़े होने और वास्तविक विद्वत्ता का प्रमाण माना जाए। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से विच्छेद नहीं, बल्कि उन्हें सहेजते हुए नए क्षितिजों की ओर बढ़ना है। खिड़कियां खोलिए, विश्व की हवाओं का स्वागत कीजिए, नई भाषाएं सीखिए, नए विचारों को अपनाइए परंतु जिस भूमि पर आपके संस्कार अंकुरित हुए हैं, उस मिट्टी की बोली को अपनी सांसों से ओझल मत होने दीजिए। स्मरण रहे, जब शब्द मरते हैं तो केवल ध्वनियां नहीं खोतीं; उनके साथ एक पूरा लोक, एक संपूर्ण इतिहास, एक जीवंत संसार विलुप्त हो जाता है। इसलिए भाषा का संरक्षण केवल परंपरा की रक्षा नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की रक्षा है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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