विश्व जूनोटिक रोग दिवस: जब मानव, पशु और प्रकृति का स्वास्थ्य बनता है एक साझा संकल्प

बीते कुछ सालों में दुनिया ने जो कुछ झेला है, उसने हमें एक बात बिल्कुल साफ सिखा दी है कि इंसान की सेहत को सिर्फ इंसानी दुनिया तक सीमित रखकर नहीं समझा जा सकता। आज हम जब भी सांस लेते हैं, खाना खाते हैं या प्रकृति के करीब जाते हैं, तो अनजाने में ही ऐसे लाखों सूक्ष्मजीवों (वायरस और बैक्टीरिया) के संपर्क में आते हैं, जो असल में जानवरों की दुनिया का हिस्सा हैं। जब ये जीव जानवरों से इंसानों के शरीर में कदम रखते हैं, तो एक नई चुनौती खड़ी होती है। विज्ञान की भाषा में इस खतरे को ‘जूनोटिक रोग’ (Zoonotic Diseases) यानी पशुजनित बीमारी कहा जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, इंसानों में होने वाली हर 10 संक्रामक (फैलने वाली) बीमारियों में से 6 जानवरों से ही इंसानों में आती हैं। इतना ही नहीं, हाल के सालों में सामने आए नए खतरों (जैसे इबोला, मर्स, सार्स और कोविड-19) में से 75% बीमारियां जूनोटिक ही हैं। यानी जानवरों से फैली हैं। इसीलिए, हर साल 6 जुलाई को मनाया जाने वाला ‘विश्व जूनोटिक रोग दिवस’ सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि यह दुनिया की सेहत को सुरक्षित रखने का एक बड़ा अलर्ट है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि अगर हमारे जानवर और पर्यावरण बीमार रहेंगे, तो इंसान कभी स्वस्थ नहीं रह सकता।

6 जुलाई का इतिहास: एक महान वैज्ञानिक की खोज

इस खास दिन को मनाने के पीछे चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) के इतिहास की एक बेहद भावुक और क्रांतिकारी कहानी जुड़ी है। बात 6 जुलाई 1885 की है, जब फ्रांस के महान वैज्ञानिक लुई पाश्चर (Louis Pasteur) ने दुनिया को एक नया जीवनदान दिया था। हुआ यह था कि जोसेफ मेइस्टर नाम के एक नौ साल के मासूम बच्चे को एक पागल कुत्ते ने बुरी तरह काट लिया था। उस दौर में रेबीज होने का सीधा मतलब था तड़प-तड़प कर मौत। लुई पाश्चर ने अपनी लैब में एक नई वैक्सीन (टीका) तैयार तो की थी, लेकिन उसका इंसानों पर ट्रायल नहीं हुआ था। मासूम की जान बचाने के लिए उन्होंने एक बड़ा जोखिम लिया और उस बच्चे को रेबीज की पहली सफल वैक्सीन दी। चमत्कार हुआ, बच्चा पूरी तरह ठीक हो गया! इस तरह इंसानों ने जानवरों से फैलने वाली सबसे खतरनाक बीमारी को हराने की दिशा में अपना पहला कदम बढ़ाया। इसी ऐतिहासिक कामयाबी के सम्मान में हर साल 6 जुलाई को ‘विश्व जूनोटिक रोग दिवस’ मनाया जाता है।

जूनोटिक रोग क्या हैं और ये कैसे फैलते हैं?

सीधे शब्दों में कहें तो, ‘जूनोसिस’ (Zoonosis) हर उस बीमारी या इन्फेक्शन को कहते हैं जो रीढ़ की हड्डी वाले जानवरों (जैसे गाय, भैंस, कुत्ता, चमगादड़ या पक्षी) से इंसानों में फैलती है। यह बीमारियां हमारे तक मुख्य रूप से पांच तरीकों से पहुंचती हैं। सीधा संपर्क (Direct Contact): जब आप किसी बीमार जानवर के सीधे संपर्क में आते हैं। जैसे उसके थूक, लार, खून, पेशाब, किसी घाव या उसकी स्किन (त्वचा) को सीधे छूने से। आस-पास की चीजें (Indirect Contact): कई बार हम जानवर को नहीं छूते, लेकिन उन जगहों या चीजों को छू लेते हैं जहां बीमार जानवर रहते या घूमते हैं। जैसे मुर्गियों का दड़बा, गौशाला की दीवारें या पालतू जानवरों के खाने-पीने के बर्तन। खान-पान में लापरवाही (Food-borne): खाने-पीने की दूषित चीजों के जरिए। जैसे-बिना उबला (कच्चा) दूध पीना, अधपका मीट या अंडे खाना, या फिर जानवरों के मल-मूत्र से दूषित हुआ पानी पीना और वैसी ही सब्जियों को बिना धोए खा लेना। कीड़े-मकोड़ों के काटने से (Vector-borne): मच्छर, किल्नी (टिक्स), मक्खियों या पिस्सू के काटने से। ये कीड़े खुद बीमार नहीं होते, बल्कि बीमारी को संक्रमित जानवर के शरीर से उठाकर इंसानों तक पहुंचाने वाले ‘कूरियर’ का काम करते हैं। (जैसे-डेंगू, मलेरिया या जीका वायरस)। हवा के जरिए (Airborne): जब कोई संक्रमित जानवर सांस लेता है या छींकता है, तो हवा में उसके बारीक कण फैल जाते हैं। उस जगह पर सांस लेने से ये वायरस या बैक्टीरिया इंसान के अंदर चले जाते हैं।

प्रमुख जूनोटिक बीमारियां : जो जानवरों से हमतक पहुंचती हैं

रेबीज (Rabies): यह बीमारी संक्रमित कुत्ते, बंदर या बिल्ली के काटने या खरोंचने से फैलती है। इसके साथ एक बहुत ही गंभीर बात जुड़ी है लक्षण दिखने के बाद यह 100% जानलेवा है, लेकिन सही समय पर (काटने के तुरंत बाद) टीका (Vaccine) लग जाने पर इसे 100% रोका जा सकता है। कोविड-19 (COVID-19): जिसने पूरी दुनिया की रफ्तार को रोक दिया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस वायरस की शुरुआत भी जंगली जानवरों (जैसे चमगादड़) से ही हुई थी। बर्ड फ्लू और स्वाइन फ्लू (Avian & Swine Influenza): यह फेफड़ों और सांस से जुड़ा खतरनाक इन्फेक्शन है, जो क्रमशः संक्रमित पक्षियों (मुर्गियों) और सूअरों के संपर्क में आने से इंसानों में फैलता है।

निपाह और इबोला (Nipah & Ebola): ये दोनों बहुत ही खतरनाक और जानलेवा वायरस हैं, जिनमें मृत्यु दर बहुत ज्यादा होती है। निपाह मुख्य रूप से चमगादड़ों से और इबोला चिंपैंजी या गोरिल्ला जैसे जीवों से इंसानों तक पहुंचता है। एंथ्रेक्स और ब्रुसेलोसिस (Anthrax & Brucellosis): यह मवेशियों (गाय, भैंस, बकरी) से फैलने वाली बैक्टीरिया की बीमारियां हैं। यह उन लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं जो डेयरी फार्मिंग, खेती या पशुपालन से जुड़े हैं (जैसे बिना उबला दूध पीने या बीमार पशु के सीधे संपर्क से)। लेप्टोस्पायरोसिस (Leptospirosis): यह चूहों के पेशाब से दूषित हुए पानी या मिट्टी के संपर्क में आने से फैलता है, खासकर बाढ़ या भारी बारिश के दिनों में।

भारत के लिए यह खतरा इतना बड़ा क्यों है?

जूनोटिक बीमारियाँ पूरी दुनिया के लिए गंभीर स्वास्थ्य चुनौती हैं, लेकिन भारत जैसे विशाल, घनी आबादी वाले और जैव-विविधता से समृद्ध देश में इनका खतरा कहीं अधिक व्यापक और जटिल है। मनुष्य, पशु और पर्यावरण के बीच बढ़ते संपर्क, तीव्र शहरीकरण तथा जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसे संक्रमण तेजी से फैलने की आशंका बनी रहती है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित होते हैं। इसके 3 मुख्य कारण हैं:

रेबीज का सबसे बड़ा बोझ

आपको जानकर हैरानी होगी कि पूरी दुनिया में रेबीज की वजह से जितनी मौतें होती हैं, उनका लगभग एक-तिहाई (33%) हिस्सा अकेले भारत में होता है। इसका सबसे बड़ा कारण देश में आवारा कुत्तों की भारी संख्या और आम लोगों में जागरूकता की कमी है। इंसानों और जानवरों का बहुत करीबी नाता: भारत में दुनिया की सबसे बड़ी पशुधन आबादी (Livestock Population) यानी गाय, भैंस, भेड़ और बकरियां हैं। हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गांवों की जिंदगी पूरी तरह पशुपालन पर टिकी है। लोग अपने मवेशियों के साथ उठते-बैठते हैं, जिससे इंसानों और जानवरों का संपर्क बहुत ज्यादा और करीबी रहता है।

तेजी से कटते जंगल और फैलते शहर: जैसे-जैसे शहर बड़े हो रहे हैं, जंगलों को काटा जा रहा है। नतीजा यह है कि जंगली जानवरों के रहने की जगह खत्म हो रही है और वे इंसानी बस्तियों के करीब आने को मजबूर हैं। इसी वजह से जंगलों में रहने वाले नए-नए वायरस बहुत आसानी से इंसानों तक पहुंच रहे हैं।

हम खुद दे रहे हैं इन बीमारियों को न्योता: बढ़ने के कारण

कसूर जानवरों का नहीं, हमारा है: अक्सर लोग सोचते हैं कि इन बीमारियों के लिए सिर्फ जानवर जिम्मेदार हैं, लेकिन यह सोचना बिल्कुल गलत होगा। असल में, हमारी अपनी ही हरकतों ने इन खतरनाक वायरस को हमारे घरों तक पहुंचने का रास्ता दिया है। आइए समझें कैसे: जंगलों का खात्मा और उनका घर छीनना: जब हम अपने फायदे के लिए जंगलों को काटते हैं, तो जंगली जीवों के घर छिन जाते हैं। बेघर होकर मजबूरन वे इंसानी बस्तियों का रुख करते हैं। नतीजा यह होता है कि उनके शरीर में सालों से छिपे बैठे ‘अदृश्य वायरस’ बहुत आसानी से हम तक पहुंच जाते हैं। क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन): ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते तापमान के कारण मौसम का मिजाज बदल रहा है। अब गरम मौसम की वजह से मच्छरों, मक्खियों और किलनियों (टिक्स) को पनपने के लिए ज्यादा समय और नए इलाके मिल रहे हैं। यही वजह है कि जो बीमारियां पहले किसी खास इलाके तक सीमित थीं, वे अब नए-नए शहरों और देशों में पैर पसार रही हैं।

गंदे पोल्ट्री फॉर्म और जंगली जानवरों का अवैध व्यापार: तंग, संकरी और गंदगी से भरी मंडियों (जिन्हें वेट मार्केट कहा जाता है) में तरह-तरह के जंगली जानवरों को एक साथ ठूंस कर रखा जाता है। उनकी तस्करी की जाती है। ऐसी अस्वच्छ जगहों पर अलग-अलग जीवों के वायरस आपस में मिलते हैं और उन्हें म्यूटेट होने (यानी अपना रूप बदलकर और खतरनाक बनने) का पूरा मौका मिल जाता है। चंद घंटों का सफर (वैश्वीकरण): आज की दुनिया में एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचना महज कुछ घंटों का खेल है। आज फ्लाइट्स के जरिए दुनिया इतनी सिमट चुकी है कि किसी भी दूरदराज के गांव में पनपा वायरस अगले 24 घंटे के भीतर दिल्ली, न्यू यॉर्क या लंदन जैसे बड़े शहरों की आबादी में तबाही मचा सकता है।

समाधान: ‘वन हेल्थ’ (One Health) की सोच

इस पूरे चक्रव्यूह को तोड़ने का एकमात्र और सबसे असरदार जवाब है ‘वन हेल्थ’ (One Health)। यह एक ऐसी आधुनिक और वैज्ञानिक सोच है, जो मानती है कि इंसान, जानवर और पर्यावरण (प्रकृति) की सेहत कोई अलग-अलग चीजें नहीं हैं, बल्कि ये सब आपस में एक मजबूत चेन की तरह जुड़े हुए हैं। सरल शब्दों में कहें, तो अगर इस चेन की एक भी कड़ी बीमार हुई, तो पूरी दुनिया बीमार हो जाएगी। यह कैसे काम करता है? अगर हमें इंसानों को सुरक्षित और सेहतमंद रखना है, तो हमें सबसे पहले अपनी मिट्टी, पानी, जंगलों और बेजुबान जानवरों की सेहत को सुधारना होगा। इस नए नजरिए के तहत अब डॉक्टर (Human Doctors), पशु चिकित्सक (Veterinarians), पर्यावरण वैज्ञानिक (Environmental Scientists) और वन विभाग (Forest Department) अलग-अलग काम करने के बजाय, एक ही टीम के रूप में मिलकर काम करते हैं। जब सब मिलकर पहरेदारी करेंगे, तभी आने वाली महामारियों को समय रहते रोका जा सकेगा।

सरकार और टेक्नोलॉजी की ‘महा-पहरेदारी’

महामारियों के इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार और आज की आधुनिक टेक्नोलॉजी (तकनीक) मिलकर दो बड़े मोर्चों पर काम कर रहे हैं। राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन (National One Health Mission) पहले इंसानों के डॉक्टर अलग काम करते थे और जानवरों के डॉक्टर अलग। लेकिन इस मिशन के तहत भारत सरकार ने इंसानी स्वास्थ्य मंत्रालय (Health Ministry) और पशुपालन विभाग को एक ही मंच पर, यानी एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है। अब दोनों विभाग मिलकर किसी भी खतरे की जानकारी आपस में तुरंत साझा करते हैं, ताकि बीमारी इंसानों तक पहुँचने से पहले ही उसे रोका जा सके।

टेक्नोलॉजी के नए ‘हथियार’

आज के दौर में हम वायरस से लड़ने के लिए दो बेहद आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। जीनोमिक निगरानी (Genomic Surveillance): यह एक तरह का ‘वायरस ट्रैकर’ है। इसके जरिए वैज्ञानिक वायरस के डीएनए/आरएनए की बारीकी से जांच करते हैं और यह ट्रैक करते हैं कि वायरस कब और कैसे अपना रूप बदल (Mutate) रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा एनालिसिस: कंप्यूटर और AI की मदद से अब दुनिया भर के डेटा को खंगाला जाता है। यह तकनीक एक मौसम वैज्ञानिक की तरह पहले ही भांप लेती है और अनुमान लगा देती है कि दुनिया के किस कोने से अगली महामारी उठ सकती है।

रोकथाम और निजी बचाव: हमारी आदतें, हमारा कवच!

महामारियों और बीमारियों से लड़ना सिर्फ सरकार या डॉक्टरों का काम नहीं है। इसमें हमारी रोजमर्रा की आदतें सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बनती हैं। एक जागरूक नागरिक के तौर पर हमें बस कुछ छोटी-सी बातों का ध्यान रखना है। समय पर टीका (Vaccination): अगर आपके घर में कोई पालतू जानवर (जैसे कुत्ता या बिल्ली) है, तो समय पर उसका एंटी-रेबीज टीकाकरण जरूर करवाएं। यह उनकी सेहत के लिए भी जरूरी है और आपके परिवार की सुरक्षा के लिए भी। हाथों की सफाई है सबसे जरूरी: जब भी आप अपने पालतू या किसी भी जानवर को छुएं, उसका मल-मूत्र साफ करें या उसके संपर्क में आएं, तो उसके तुरंत बाद हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना कभी न भूलें। खान-पान में पूरी सावधानी: खाने-पीने के मामले में कभी लापरवाही न बरतें। दूध को हमेशा अच्छी तरह उबालकर ही पिएं। इसके अलावा, मीट या अंडे जैसी चीजों को अच्छी तरह पकाकर (Well-cooked) ही खाएं। जंगली जीवों से ‘मर्यादित दूरी’: जंगली जानवर अपनी दुनिया में ही अच्छे लगते हैं। इसलिए वन्यजीवों को बिना वजह छूने, उनके करीब जाने या उन्हें परेशान करने की कोशिश बिल्कुल न करें।

सबसे जरूरी बात: जानवर के काटने पर तुरंत क्या करें?

अगर कभी कोई आवारा जानवर या कुत्ता काट ले या खरोंच मार दे, तो अंधविश्वास या घरेलू नुस्खों (जैसे मिर्च, हल्दी या तेल लगाना) के चक्कर में पड़कर अपना समय बिल्कुल बर्बाद न करें। तुरंत ये दो कदम उठाएं: घाव को तुरंत नल के बहते पानी और साबुन से कम से कम 10 से 15 मिनट तक अच्छी तरह धोएं। इससे वायरस का असर काफी कम हो जाता है। बिना कोई देरी किए तुरंत डॉक्टर के पास जाएं और एंटी-रेबीज वैक्सीन का कोर्स पूरा करें। याद रखें, रेबीज का इलाज सिर्फ और सिर्फ सही समय पर लगी वैक्सीन ही है।

साझी जिम्मेदारी, साझा भविष्य!

आखिर में, हमें यह बात गहराई से समझनी होगी कि यह खूबसूरत धरती सिर्फ हम इंसानों की बपौती या जागीर नहीं है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और नन्हे जीवों का भी इस पर उतना ही हक है, जितना हमारा। कोविड-19 महामारी ने हमें बहुत बड़ी और भारी कीमत चुकाकर यही सिखाया है कि जब भी हम प्रकृति के नियमों के साथ खिलवाड़ करेंगे, उसका अंजाम खुद हमारे लिए ही आत्मघाती (जानलेवा) होगा।

आने वाले कल को सुरक्षित रखने के लिए अब ‘वन हेल्थ’ (One Health) की सोच ही एकमात्र रास्ता है। जब तक सरकारें, वैज्ञानिक, डॉक्टरों की टीम और हम सब आम नागरिक मिलकर एक मजबूत चैन या टीम की तरह काम नहीं करेंगे, तब तक इन अदृश्य और खतरनाक वायरस के हमलों को रोकना नामुमकिन होगा। हमारी सजगता, वैज्ञानिक सोच, ‘जियो और जीने दो’ का पुराना सिद्धांत और प्रकृति के प्रति सम्मान ही हमारी असली ढाल हैं। इसी ढाल के भरोसे हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ, सुरक्षित और मुस्कुराता हुआ कल दे सकते हैं।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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