कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के अधीन भारतीय कॉर्पोरेट मामले संस्थान (आईआईसीए) ने दिवालियापन पेशेवर संस्थाओं के संघ के सहयोग से नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय सभागार में “भारत के पुनर्गठन पारितंत्र को पुनर्परिभाषित करना : एक दशक का ज्ञान, भविष्य की दिशाएं” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। इस अवसर पर आईआईसीए के प्रमुख शैक्षणिक कार्यक्रम पोस्ट ग्रेजुएट इनसॉल्वेंसी प्रोग्राम (पीजीआईपी) के छठे बैच का दीक्षांत समारोह भी आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य देश में उच्च प्रशिक्षित दिवालियापन पेशेवरों का एक मजबूत समूह तैयार करना है।
आईबीसी के एक दशक की उपलब्धियों पर जोर
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने दीक्षांत भाषण में कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) अब एक परिपक्व कानून बन चुकी है और इसके मूलभूत प्रश्न एक दशक के न्यायिक अनुभव से स्पष्ट हो चुके हैं। उन्होंने वर्ष 2016 से 2021 तक की अवधि को स्थापना काल और वर्तमान समय को परिष्करण काल बताया। उन्होंने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2026 इस कानून के निरंतर विकास और परिपक्वता को दर्शाता है।
न्यायिक और संस्थागत समन्वय की आवश्यकता
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल ने कहा कि आईबीसी ने शुरुआती न्यायिक फैसलों से लेकर जटिल बहुपक्षीय दिवालियापन मामलों तक उल्लेखनीय विकास किया है। उन्होंने समयबद्ध और अधिकतम मूल्य प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका और संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, उन्होंने सीमा पार दिवालियापन संबंधी संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग (यूएनसीआईटीआरएएल) मॉडल कानून को अपनाने के महत्व को भी रेखांकित किया।
आईबीसी ने बदली वित्तीय और कॉर्पोरेट व्यवस्था
कॉर्पोरेट कार्य सचिव दीप्ति गौर मुखर्जी ने आईबीसी को भारत के वित्तीय और कॉर्पोरेट पारितंत्र में व्यवहारिक क्रांति बताया। उन्होंने कहा कि समाधान प्रक्रियाओं के माध्यम से लगभग 4 लाख करोड़ रुपए की वसूली हुई है और लेनदारों को परिसमापन मूल्य का लगभग 170% प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया कि औपचारिक मंजूरी से पहले ही 32,000 से अधिक मामलों का निपटारा हुआ, जिससे लगभग 14 लाख करोड़ रुपए के ऋण सुरक्षित रहे। उन्होंने आईबीसी (संशोधन) अधिनियम, 2026 को एक ऐतिहासिक सुधार करार दिया।
पीजीआईपी बना दिवालियापन विशेषज्ञ तैयार करने का प्रमुख मंच
आईआईसीए के महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने पोस्ट ग्रेजुएट इनसॉल्वेंसी प्रोग्राम की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) द्वारा अनुमोदित यह दो वर्षीय पूर्णकालिक आवासीय कार्यक्रम युवाओं को पारंपरिक 10 वर्ष के अनुभव की अनिवार्यता के बिना दिवालियापन पेशेवर के रूप में पंजीकरण का अवसर प्रदान करता है। उन्होंने बताया कि सात बैचों के माध्यम से 239 प्रशिक्षित पेशेवरों का मजबूत नेटवर्क तैयार हो चुका है।
40 विद्यार्थियों को प्रदान की गई डिग्री
दीक्षांत समारोह के दौरान पीजीआईपी के छठे बैच के 40 विद्यार्थियों को डिग्री और प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। यह भारत के विकसित होते दिवालियापन और पुनर्गठन तंत्र के लिए नए पेशेवरों की तैयारी का प्रतीक माना गया।
मेधावी विद्यार्थियों को मिला सम्मान
संस्थान ने शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए विद्यार्थियों को सम्मानित भी किया। आशीष कुमार को प्रथम स्थान प्राप्त करने पर 50,000 रुपए, अरुण कुमार को द्वितीय स्थान पर 30,000 रुपए तथा के. गीता वैष्णवी को तृतीय स्थान पर 20,000 रुपए का नकद पुरस्कार प्रदान किया गया। ये पुरस्कार एजेडबी एंड पार्टनर्स द्वारा प्रायोजित किए गए थे।
नई पहलों की भी हुई घोषणा
कार्यक्रम के दौरान आईबीसी के पहले दशक के विकास, न्यायशास्त्र और प्रभाव को समर्पित राष्ट्रीय सम्मेलन स्मारिका का विमोचन किया गया। पीजीआईपी छात्रों के लिए पीएम विद्या लक्ष्मी योग्यता-सह-साधन छात्रवृत्ति की घोषणा की गई। इसके अलावा, वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन (ओएनओएस) प्लेटफॉर्म का विस्तार आईआईसीए तक किया गया, जिससे छात्रों, शोधकर्ताओं और संकाय सदस्यों को वैश्विक शैक्षणिक संसाधनों तक बेहतर पहुंच मिलेगी।
दिवालियापन ढांचे के भविष्य पर हुई व्यापक चर्चा
दीक्षांत समारोह के बाद आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत और विदेश के विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, नियामकों, न्यायिक अधिकारियों, शिक्षाविदों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में सीमा पार दिवालियापन, पुनर्गठन ढांचे, संकटग्रस्त परिसंपत्ति बाजार, प्रौद्योगिकी आधारित सुधार और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।
चार प्रमुख विषयों पर केंद्रित रहीं परिचर्चाएं
सम्मेलन में आयोजित चार प्रमुख पैनल चर्चाओं में सीमा पार दिवालियापन ढांचे, लेनदार-प्रेरित दिवालियापन समाधान प्रक्रिया, संकटग्रस्त परिसंपत्ति बाजार के विकास और प्रौद्योगिकी आधारित सुधारों पर विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञों ने माना कि आईबीसी (संशोधन) अधिनियम, 2026 भारत को वैश्विक मानकों के अनुरूप आधुनिक दिवालियापन व्यवस्था प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
प्रौद्योगिकी और एआई की भूमिका पर चर्चा
अंतिम पैनल में प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, वित्तीय स्वास्थ्य निगरानी उपकरणों और बड़े उद्यमों के लिए समाधानात्मक ढांचे के विकास पर चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने दिवालियापन प्रक्रिया में पारदर्शिता, दक्षता और समयबद्धता बढ़ाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
सुधारों के अगले चरण के लिए बनी सहमति
आईबीबीआई के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य और आईआईसीए के दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता केंद्र के प्रमुख सुधाकर शुक्ला ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। सम्मेलन का समापन भारत के दिवालियापन और पुनर्गठन ढांचे को और मजबूत बनाने तथा सुधारों के अगले चरण के लिए साझा प्रतिबद्धता के साथ हुआ। (इनपुट: पीआईबी)


