लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को लोकतंत्र में विचारों और दृष्टिकोणों की भिन्नता के बावजूद आपसी सम्मान और गरिमा बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि असहमति व्यक्त करते समय भी वाणी में संयम और नैतिक आचरण बनाए रखना चाहिए। संत कबीर की शिक्षाएं मतभेदों के बीच भी दूसरों का सम्मान करने, करुणा रखने और सामाजिक समरसता को मजबूत करने की प्रेरणा देती हैं।
संत कबीर की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी स्थित कबीरधाम आश्रम में आयोजित संत कबीर महोत्सव एवं कबीर स्मृति भवन के शिलान्यास समारोह को संबोधित करते हुए बिरला ने कहा कि संत कबीर की करुणा, समानता और सामाजिक समरसता की शिक्षाएं छह शताब्दियों बाद भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि इन विचारों का व्यापक प्रसार समाज में संवेदनशीलता, पारस्परिक समझ और सद्भाव को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
जाति और धर्म की दीवारों को तोड़ने का संदेश
संत कबीर के सामाजिक सुधारों में योगदान का उल्लेख करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि जिस समय समाज जातिगत भेदभाव, धार्मिक मतभेदों और सामाजिक पूर्वाग्रहों से विभाजित था, उस समय संत कबीर ने रूढ़ियों को चुनौती दी। उन्होंने समाज को बांटने वाली दीवारों को तोड़ने और समानता का संदेश देने का कार्य किया। ओम बिरला ने कहा कि संत कबीर ने जनसाधारण की भाषा में रचित अपने सरल, लेकिन गहरे अर्थ वाले दोहों के माध्यम से सत्य, नैतिकता, समानता और सदाचरण की शिक्षा दी। उनकी शिक्षाएं आज भी समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा देती हैं।
आत्मचिंतन से विकसित होती है विनम्रता
आत्मचिंतन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बिरला ने संत कबीर के प्रसिद्ध दोहे, “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय; जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।” का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दूसरों में दोष खोजने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण और कमियों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आत्मचिंतन से विवेक और विनम्रता विकसित होती है। इससे दूसरों के प्रति करुणा और संवेदनशीलता की भावना भी मजबूत होती है। संत कबीर की यह शिक्षा व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामाजिक संबंधों को बेहतर बनाने में भी महत्वपूर्ण है।
व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होती है
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि किसी व्यक्ति को उसके पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके कर्मों और समाज के प्रति योगदान से याद किया जाता है। संत कबीर के सादगीपूर्ण जीवन और उनके स्थायी प्रभाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ कर्म, निःस्वार्थ सेवा और दूसरों के कल्याण के प्रति समर्पण समाज पर अमिट छाप छोड़ते हैं।
कबीर स्मृति भवन नई पीढ़ी को करेगा प्रेरित
कबीर स्मृति भवन के महत्व पर चर्चा करते हुए बिरला ने विश्वास व्यक्त किया कि यह संस्थान संत कबीर के विचारों और संदेश को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि इस तरह के संस्थान भावी पीढ़ियों को संत कबीर के आदर्शों को समझने और अपने जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। उन्होंने संत कबीर के आध्यात्मिक ज्ञान, जन-केंद्रित दृष्टिकोण और तर्कपूर्ण विचारों को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
संत असंग देव महाराज के योगदान की सराहना
इस अवसर पर बिरला ने संत असंग देव महाराज के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। उन्होंने भारत सहित विश्व के विभिन्न हिस्सों में संत कबीर की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार और समाज सेवा के प्रति उनके आजीवन समर्पण की सराहना की। उन्होंने कहा कि त्याग, अनुशासन और निःस्वार्थ सेवा से परिपूर्ण संतों का जीवन समाज को आध्यात्मिक शक्ति और प्रेरणा प्रदान करता है। उन्होंने संत कबीर के संदेश को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित संतों और अनुयायियों के योगदान की भी सराहना की।
वाणी में संयम और सामाजिक सद्भाव अपनाने का आह्वान
ओम बिरला ने सभी लोगों से संत कबीर की शिक्षाओं से प्रेरणा लेने, आत्मचिंतन की आदत विकसित करने और वाणी में संयम बनाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए काम करना और समाज में आपसी सम्मान की भावना को मजबूत करना जरूरी है। समारोह में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, संत असंग देव महाराज, अनेक जनप्रतिनिधि, संतगण और बड़ी संख्या में संत कबीर के अनुयायी उपस्थित थे। (इनपुट: पीआईबी)


