भारत ने जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति करते हुए राष्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक मजबूत संस्थागत ढांचा विकसित किया है। देश में 2.76 लाख से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) का गठन किया जा चुका है और 2.72 लाख से अधिक पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (पीबीआर) तैयार किए गए हैं, जिनमें स्थानीय प्रजातियों, पारिस्थितिक तंत्रों और पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया गया है।
भारत की जैव विविधता शासन व्यवस्था तीन-स्तरीय ढांचे पर आधारित है। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए), राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड तथा स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियां संरक्षण और सतत उपयोग से जुड़े कार्यों का संचालन करती हैं। यह व्यवस्था जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (सीबीडी) के तहत भारत की वैश्विक प्रतिबद्धताओं को स्थानीय स्तर तक पहुंचाने में मदद करती है।
जैव विविधता भारत की पर्यावरणीय और विकास संबंधी प्राथमिकताओं का महत्वपूर्ण आधार है। यह खाद्य सुरक्षा, आजीविका, जलवायु अनुकूलन और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। देश के वन, आर्द्रभूमियां, पर्वतीय क्षेत्र, तटीय क्षेत्र, मरुस्थल, घासभूमियां और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र लाखों लोगों की आजीविका का आधार हैं।
पिछले एक दशक में भारत ने वैज्ञानिक प्रबंधन, आवास पुनर्स्थापन, प्रजाति संरक्षण कार्यक्रमों और सामुदायिक भागीदारी को जोड़ते हुए एकीकृत संरक्षण दृष्टिकोण अपनाया है। इसके तहत संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार, वन्यजीव निगरानी को मजबूत करना, क्षतिग्रस्त पारिस्थितिक तंत्रों का पुनरुद्धार और जैव संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा दिया गया है।
भारत की जैव विविधता संरक्षण व्यवस्था का आधार जैव विविधता अधिनियम, 2002 है, जिसमें 2023 में संशोधन भी किया गया। यह कानून जैव विविधता संरक्षण, संसाधनों के सतत उपयोग और लाभों के न्यायसंगत बंटवारे को सुनिश्चित करता है। संशोधित प्रावधान अनुसंधान, नवाचार और पारंपरिक ज्ञान आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी मजबूत करते हैं।
देश में जैव विविधता संरक्षण के लिए कई वैज्ञानिक संस्थान कार्य कर रहे हैं। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई), भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) जैसे संस्थान प्रजातियों के दस्तावेजीकरण, निगरानी और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। जैव विविधता अधिनियम की धारा 39 के तहत 20 संस्थानों को राष्ट्रीय रिपॉजिटरी के रूप में अधिसूचित किया गया है।
पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर स्थानीय जैव विविधता संरक्षण का एक महत्वपूर्ण उपकरण बनकर उभरे हैं। इन रजिस्टरों में जैव संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय नस्लों, प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्रों का रिकॉर्ड रखा जाता है। देशभर में तैयार किए गए 2.72 लाख से अधिक पीबीआर अब डिजिटल रूप में ई-पीबीआर में परिवर्तित किए जा रहे हैं।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिबद्धताओं को मजबूत किया है। देश ने नागोया प्रोटोकॉल के क्रियान्वयन पर अपनी पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट तथा जैव विविधता कन्वेंशन के तहत सातवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रस्तुत की है। साथ ही 2024-2030 के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्ययोजना (एनबीएसएपी) को कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे के अनुरूप तैयार किया गया है।
जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां उल्लेखनीय रही हैं। देश का कुल वन और वृक्ष आवरण लगभग 8.27 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है। इसके अलावा देश में 1,134 से अधिक संरक्षित क्षेत्र हैं, जो लगभग 1.88 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।
वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में भी भारत ने महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। बाघों की संख्या 2014 में 2,226 से बढ़कर नवीनतम आकलन के अनुसार 3,682 हो गई है। प्रजातियों की निगरानी और संरक्षण के लिए आधुनिक डेटाबेस और वैज्ञानिक प्रणालियों को भी मजबूत किया जा रहा है।
लाभ-साझेदारी (एबीएस) व्यवस्था के तहत भारत ने 2017 से 2026 के बीच 12,830 अनुमोदन जारी किए हैं। मई 2026 तक लगभग 145 करोड़ रुपये लाभार्थियों को वितरित किए जा चुके हैं, जिससे देशभर की करीब 11,000 जैव विविधता प्रबंधन समितियों को लाभ मिला है।
सरकार का कहना है कि जैव विविधता संरक्षण अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सतत और समावेशी विकास का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। आने वाले वर्षों में भारत 2030 और उससे आगे के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए संरक्षण, पारिस्थितिक पुनर्स्थापन और सामुदायिक भागीदारी को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।
-पीआईबी


