वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की वित्तीय मजबूती की नई राह

दुनिया आज गहरे बदलावों के दौर से गुजर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा आपूर्ति में जोखिम, वैश्विक पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव, ऊंचा वैश्विक ऋण और तकनीकी परिवर्तन ये सभी जोखिम अब अलग-अलग घटनाएं नहीं रहे, बल्कि आपस में जुड़े हुए चुनौतियों के रूप में सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में भारत को केवल तेज विकास दर के लक्ष्य तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि वित्तीय स्थिरता और लचीलापन (रेजिलिएंस) को भी आर्थिक नीति के केंद्र में रखना होगा। नई दिल्ली में आयोजित कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में वित्त मंत्री और भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के विचार इसी व्यापक दृष्टिकोण को सामने लाते हैं।

झटकों के बीच भी मजबूत भारत

वित्त मंत्री ने कहा कि भारत ने पिछले दशक में जनधन-आधार-मोबाइल, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आवास, स्वच्छ भारत, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत और खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से नागरिकों की क्षमता और अर्थव्यवस्था की आधारशिला मजबूत की है। मजबूत बैंकिंग प्रणाली, कम गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए), नियंत्रित मुद्रास्फीति, कम चालू खाता घाटा और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार यह दिखाते हैं कि भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी अच्छी स्थिति में है।

अब अगली चुनौती – स्थिरता की

वित्त मंत्री ने बताया कि आने वाले वर्षों में रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक स्तर पर खुले और नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी, कौशल विकास, निजी निवेश और अनुसंधान एवं नवाचार भारत की आर्थिक प्राथमिकताएं हैं। इन लक्ष्यों की सफलता के लिए एक मजबूत और स्थिर वित्तीय तंत्र अति आवश्यक है।

सावधानी ही समझदारी

आरबीआई गवर्नर ने चेताया कि लंबे समय तक स्थिरता रहने पर जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है और पिछली मंदियों की स्मृति कमजोर पड़ जाती है। इसलिए अच्छे समय में भी सतर्कता बनाए रखना ही समझदारी है।

आरबीआई की पांच प्राथमिकताएं

प्रणालीगत मजबूती को और सुदृढ़ करना। ऐसी क्षमता विकसित करना कि वैश्विक या घरेलू किसी भी झटके के दौरान बैंकिंग प्रणाली, वित्तीय संस्थान और भुगतान तंत्र बिना बाधा के काम करते रहें। नए और आपस में जुड़े जोखिमों की पहचान। भू-राजनीतिक घटनाएं, साइबर खतरे, तकनीकी विफलताएं, वैश्विक ऋण, परिसंपत्ति मूल्य में उतार-चढ़ाव और पूंजी प्रवाह जैसे जुड़े जोखिमों का समय रहते आकलन करना।

बेहतर और अधिक विस्तृत आंकड़ों की व्यवस्था एनबीएफसी, पूंजी बाजार, क्रॉस-बॉर्डर एक्सपोज़र और तकनीकी निर्भरताओं पर उच्च गुणवत्ता वाले आंकड़े तैयार करना, ताकि जोखिम का आकलन अधिक सटीक हो। पूरे वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती केवल बैंक ही नहीं, बल्कि एनबीएफसी, पूंजी बाजार, भुगतान प्रणाली, तकनीकी अवसंरचना और महत्वपूर्ण तृतीय पक्षों की लचक क्षमता बढ़ाना। वित्तीय नवाचार में भरोसे की रक्षा। एआई, टोकनाइजेशन और नई वित्तीय तकनीकों के उपयोग के साथ उपभोक्ता और निवेशक के विश्वास, सुरक्षा और वित्तीय अखंडता सुनिश्चित करना।

भारत के लिए मार्ग स्पष्ट

भारत की अगली आर्थिक छलांग की कसौटी केवल यह नहीं होगी कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कितनी तेज़ी से बढ़ी, बल्कि यह भी होगा कि दुनिया में अगला बड़ा झटका आने पर भारत कितनी मजबूती से खड़ा रहता है। विकास और स्थिरता का यह संतुलन ही आत्मनिर्भर, समावेशी और सतत भारत की नींव बनेगा।

लेखक डीडी न्यूज़ में वरिष्ठ संवाददाता हैं।

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