06/11/25 | 6:25 pm

Print

क्या विपक्ष की राजनीति और तथ्यों के बीच बड़ा फर्क है?

बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद से ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बार-बार चुनाव-प्रक्रिया खासतौर पर वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ी की बातें उठाईं। समय-समय पर उन्होंने ईवीएम, वोटर लिस्ट और विशेष रूप से बिहार में हुई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को निशाना बनाया। जैसे-जैसे मतदान करीब आया, उनकी बहस में तारतम्यता और कार्रवाई का अभाव दिखा। सवाल उठता है कि अपने दावों को साबित करने का कानूनी प्रक्रियागत रास्ता वो क्यों नहीं अपना पा रहे? क्या उनकी राजनीति और तथ्यों के बीच बड़ा फर्क है?

अपील क्यों नहीं कर पा रहे?

इन सवालों का जवाब जानने के लिए सबसे पहले टाइमलाइन पर नजर डालनी चाहिए। राहुल गांधी ने इस साल अगस्त में बिहार में ‘Vote Adhikar Yatra’ शुरू की और SIR के खिलाफ आवाज़ उठाई। यह यात्रा और तीखी बयानबाज़ी प्रदेश की वोटिंग मशीनरी पर शक की लहर पैदा करने के इरादे से की गई नज़र आती है। तथ्यों की मांग लोकतंत्र में जायज़ है लेकिन सवाल यह है कि जब SIR या अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई, तब क्यों किसी औपचारिक शिकायत या अपील का सहारा नहीं लिया गया? प्रक्रिया के दौरान मौजूद वैधानिक विकल्पों का प्रयोग न करना वादे की साख पर असर डालता है।

दावों में कितना दम?

दूसरा बिंदु हरियाणा वाले दावे का है। हाल के दिनों में राहुल ने हरियाणा चुनावों को लेकर भी कथित ‘वोट चोरी’ जैसी दलीलें पेश कीं। चुनाव आयोग और अन्य स्रोतों ने इस तरह के दावे पर सवाल उठाए और यह स्पष्ट किया कि हरियाणा की अंतिम चुनावी सूची के खिलाफ कोई औपचारिक अपील दायर नहीं की गई थी जबकि अपील दायर करना और प्रक्रिया के तहत प्रमाण पेश करना कानूनी तौर पर ऐसा रास्ता है जिसके जरिए किसी भी विवाद का निपटारा हो सकता है। यही कारण है कि आयोग और तटस्थ विश्लेषक पूछ रहे हैं कि अगर दावा इतना ठोस है तो पार्टी या उसके एजेंटों ने क्यों कानूनी/प्रक्रियागत कदम नहीं उठाए?

अपने पोलिंग एजेंट्स से भी सवाल पूछेंगे राहुल गांधी?

तीसरी बात मतदान एजेंटों (polling agents) द्वारा और बूथ लेवल पर उठने वाली आपत्तियों को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मतदान के दिन किसी मतदाता की पहचान पर संदेह होने पर मतदान-एजेंट और प्रेसीडिंग ऑफिसर के पास निर्धारित फॉर्म व प्रक्रियाएं हैं जिनके तहत आपत्ति दर्ज की जा सकती है।

चुनाव आयोग के हैंडबुक और नियमों के अनुसार, हर प्रत्याशी अपने मतदान केंद्र पर मतदान एजेंट नियुक्त करता है। ये एजेंट मतदान प्रक्रिया के दौरान किसी भी अनियमितता या संदिग्ध मतदाता की पहचान पर तुरंत आपत्ति दर्ज कर सकते हैं। यदि किसी मतदाता के नाम, पहचान या पात्रता पर संदेह हो, तो एजेंट को प्रेसीडिंग ऑफिसर (Presiding Officer) के समक्ष इसे लिखित रूप में दर्ज कराना होता है। यह लिखित रिकॉर्ड जैसे कि फॉर्म-17A, निरीक्षण-रजिस्टर या प्रेसीडिंग ऑफिसर की डायरी बाद में कानूनी समीक्षा या न्यायिक जांच के दौरान सबूत के रूप में प्रयोग किया जाता है।

इसलिए यदि किसी चुनाव में ऐसी स्टैंडर्ड प्रक्रियाओं (Standard Procedures) का पालन नहीं किया गया यानी एजेंटों ने मौके पर आपत्तियां दर्ज नहीं कीं या लिखित रिकॉर्ड नहीं बनवाया तो बाद में किए गए आरोप या कानूनी दावों का क्या मतलब है?

SIR का असल मकसद?

अब बात करते हैं SIR की। SIR का मकसद है केवल उन मतदाताओं का सही रिकॉर्ड सुनिश्चित करना जिनका स्थान-स्थानांतरण, मृत्यु या अन्य कारणों से रोल से हटना चाहिए या नए नाम जोड़ना चाहिए। तमाम विश्लेषण और आयोग के बयान बताते हैं कि SIR को लेकर जितनी राजनीतिक बयानबाजी की गई उसकी तुलना में आपत्तियां नहीं आईं। राजनीतिक तर्क चलाना सर्वथा सम्भव है पर तथ्य-आधारित कानूनी चुनौती तब ही प्रभावी होगी जब उस प्रक्रिया के दौरान या तुरन्त बाद प्रमाण के साथ अपील की जाती। केवल मंचों पर आरोप लगाने से लोकतांत्रिक वैधानिक प्रक्रिया पर दबाव बनाने कि कोशिश तो की जा सकती है लेकिन निर्णय-परिणाम बदलना असंभव है।

वास्ताविक कदम उठाने से परहेज क्यों?

लोकतंत्र में राजनीतिक नेतृत्व का काम आलोचना करना और नागरिकों को आश्वस्त करना दोनों है लेकिन अगर विपक्ष चुनाव-प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह व्यक्त कर रहा है तो उसे बेहद आसाना वास्ताविक कदम उठाने चाहिए थे। नंबर एक- औपचारिक अपील/रिव्यू के लिए आयोग के पास दस्तावेज़ दाखिल करते। नंबर दो- यदि मतदान के समय किसी प्रकार की आपत्ति थी तो मतदान-एजेंटों के रेकॉर्ड (फॉर्म 17-A/प्रेसीडिंग-आफिसर डायरी आदि) का सार्वजनिक लेखा-जोखा दें। इन सभी बातों में से कम से कम एक का अनुपालन किए बिना बड़े-बड़े आरोप केवल संदेह उत्पन्न करते हैं, न कि निर्णायक तथ्य।

ऐसे में राहुल गांधी अगर अपने दावों को साबित करने के लिए कानूनी प्रक्रिया नहीं अपना रहे हैं तो उनकी बातों की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता प्रभावित होती है। बिहार-प्रकरण में भी यह प्रश्न प्रमुखता से उभरता है। क्या आरोपों को साबित करने की जिम्मेदारी निभाई गयी, या यह केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा है? लोकतंत्र के हित में बेहतर होगा कि राजनीतिक आरोपों के साथ-साथ सबूत, अपील और वैधानिक प्रक्रियाएं भी अपनाई जाएं तभी मतदाता और संविधान दोनों का भरोसा जिंदा रहेगा।

(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है। वर्तमान में वे प्रसार भारती न्यूज सर्विस के साथ जुड़े हैं।)