08/10/26 | 3:02 am

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नाना पाटेकर : संघर्ष, अभिनय, सादगी और मानवीय संवेदना से गढ़ा एक असाधारण व्यक्तित्व

कुछ कलाकार पर्दे पर किरदार निभाते हैं, कुछ उनमें अपना रंग भरते हैं, लेकिन विरले कलाकार ऐसे होते हैं जो किरदार को ही अपना जीवन बना देते हैं। नाना पाटेकर इसी विरल परंपरा के अभिनेता थे। उनकी आवाज में जीवन की तपिश, संवादों में विद्रोह की धार, आंखों में अनुभव की गहराई और मौन में ऐसी संवेदना थी, जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती थी। वे अभिनय नहीं करते थे, किरदार को जीते थे। विश्वनाथ पाटेकर से नाना पाटेकर तक की उनकी यात्रा संघर्ष, साधना और आत्मविश्वास से निर्मित हुई। मराठी रंगमंच की तपती जमीन से शुरू हुआ उनका सफर लगभग पांच दशकों तक हिंदी और मराठी सिनेमा के विस्तृत आकाश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाता रहा। उनकी कला में समय के साथ परिपक्वता आती गई और हर भूमिका के साथ उन्होंने अभिनय की नई संभावनाओं को सामने रखा। 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने अपने एक ऐसे सशक्त कलाकार को खो दिया, जिसकी पहचान किसी एक छवि, शैली या भूमिका तक सीमित नहीं रही। यही कारण है कि उनकी रचनात्मक विरासत समय की धूल से धुंधली होने के बजाय आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

सिनेमा से समाज तक संवेदना की यात्रा

उन्होंने अभिनय को चकाचौंध से निकालकर जीवन की कठोर सच्चाइयों के करीब खड़ा किया। नायक, खलनायक, चरित्र अभिनेता, हास्य कलाकार और निर्देशक, हर भूमिका में उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी। परिंदा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, खामोशी, वेलकम और नटसम्राट उनके बहुरंगी अभिनय संसार के जीवंत प्रमाण हैं। उत्कृष्ट अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और वर्ष 2013 का पद्म श्री उनके रचनात्मक अवदान की प्रतिष्ठित स्वीकृतियां हैं।लेकिन नाना पाटेकर का व्यक्तित्व कैमरे की रोशनी से कहीं आगे तक फैला था। किसानों और ग्रामीण समाज की पीड़ा से उनका जुड़ाव, नाम फाउंडेशन के माध्यम से जल संरक्षण और ग्रामीण पुनर्वास के प्रयास तथा भारतीय सेना के प्रति उनका गहरा सम्मान उनके भीतर बसे संवेदनशील मनुष्य की पहचान थे। सादगी उनके स्वभाव में थी और सामाजिक सरोकार उनके जीवन में। नाना पाटेकर की असली विरासत उनकी फिल्मों से आगे है। उन्होंने अपने अभिनय से किरदारों को आवाज दी और अपने जीवन से इंसानियत को अर्थ। यही कारण है कि पर्दा भले ही शांत हो जाए, लेकिन उनकी आवाज, उनके संवाद और उनकी संवेदना भारतीय सिनेमा की स्मृतियों में सदियों तक गूंजती रहेगी।

संघर्ष की जमीन से अभिनय के आकाश तक

नाना पाटेकर का जीवन किसी तैयार फिल्मी पटकथा की तरह आसान नहीं था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र में हुआ। कला के प्रति रुचि ने उन्हें मुंबई के सर जेजे. स्कूल ऑफ आर्ट्स तक पहुंचाया और इसके बाद रंगमंच उनके रचनात्मक जीवन का महत्वपूर्ण आधार बना। रंगमंच अभिनय की ऐसी पाठशाला है, जहां कलाकार को कैमरे की सुविधा नहीं मिलती। वहां संवाद, देहभाषा, आवाज, मौन और भाव सब कुछ कलाकार को स्वयं साधना पड़ता है। नाना पाटेकर के अभिनय में आगे चलकर जो तीव्रता दिखाई दी, उसकी जड़ें इसी रंगमंचीय प्रशिक्षण में थीं। उन्होंने अभिनय को केवल संवाद बोलने की कला नहीं माना, बल्कि चरित्र के भीतर उतरकर उसकी मानसिक दुनिया को समझने का माध्यम बनाया।फिल्मों में प्रवेश के बाद शुरुआती दौर में उन्हें तत्काल वह लोकप्रियता नहीं मिली, जो पारंपरिक नायकों को मिलती थी। लेकिन उन्होंने अपनी राह अलग चुनी। उनका चेहरा पारंपरिक अर्थों में रोमांटिक नायक की छवि से मेल नहीं खाता था और उनकी आवाज में भी वह बनावटी मिठास नहीं थी, जो व्यावसायिक सिनेमा के कई किरदारों में सुनाई देती थी। उनके पास था यथार्थ का स्पर्श, अनुभव की कठोरता और भावनाओं को भीतर से पकड़ लेने की क्षमता। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

‘गमन’ से राष्ट्रीय पहचान तक

नाना पाटेकर ने 1978 की फिल्म गमन से हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों में लगातार काम किया। 1988 में मीरा नायर की सलाम बॉम्बे! ने उनके अभिनय को व्यापक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद परिंदा ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया। परिंदा में उनका अभिनय केवल एक नकारात्मक चरित्र का चित्रण नहीं था। उन्होंने हिंसा और अपराध की दुनिया में फंसे व्यक्ति के भीतर मौजूद मानसिक द्वंद्व को भी प्रभावशाली ढंग से सामने रखा। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उनकी संवाद-अदायगी, आंखों की भाषा और चेहरे की कठोरता ने दर्शकों को यह अनुभव कराया कि अभिनय केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि चरित्र की आंतरिक बेचैनी को जीना भी है। इसके बाद क्रांतिवीर ने नाना पाटेकर को एक अलग ऊंचाई दी। फिल्म में उन्होंने सामाजिक अन्याय, व्यवस्था से असंतोष और आम आदमी के आक्रोश को आवाज दी। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उनके संवाद केवल संवाद नहीं रह गए। वे जनभावना की अभिव्यक्ति बन गए। यही वह दौर था, जब नाना पाटेकर की आवाज भारतीय सिनेमा की सबसे पहचानने योग्य आवाजों में शामिल हो गई।

अभिनय की कोई एक परिभाषा नहीं

नाना पाटेकर को केवल गंभीर और आक्रामक भूमिकाओं का अभिनेता मानना उनके साथ न्याय नहीं होगा। उनका अभिनय संसार जितना गंभीर था, उतना ही बहुरंगी भी। अग्निसाक्षी में उन्होंने एक संवेदनशील और जटिल भूमिका निभाई, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। खामोशी : द म्यूजिकल में उनका अभिनय भावनात्मक गहराई का उदाहरण बना। अंगार, तिरंगा, शक्ति : द पावर, अपूर्व चप्पन, अपहरण और राजनीति जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग स्वभाव और मानसिकता वाले किरदार निभाए। अपहरण में नकारात्मक भूमिका ने एक बार फिर साबित किया कि वे किसी भी चरित्र की मनोवैज्ञानिक परतों को अपने अभिनय से उभार सकते थे। और फिर आया वेलकम का उदय शेट्टी। जिस अभिनेता की पहचान गंभीर और तीखे किरदारों से थी, उसने हास्य के क्षेत्र में भी अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि उदय शेट्टी स्वयं एक लोकप्रिय सांस्कृतिक चरित्र बन गया। उनकी संवाद-अदायगी, चेहरे के भाव और हास्य की टाइमिंग ने यह सिद्ध कर दिया कि अभिनय की उनकी सीमा किसी एक विधा तक नहीं थी। यही बहुमुखी प्रतिभा उन्हें अपने समय के दूसरे कलाकारों से अलग करती है।

‘नटसम्राट’ : मंच, स्मृति और मनुष्य की पीड़ा

यदि नाना पाटेकर के अभिनय जीवन की कुछ सबसे उल्लेखनीय भूमिकाओं को चुना जाए तो मराठी फिल्म नटसम्राट का नाम अवश्य आएगा। इसमें उन्होंने रंगमंच के एक वृद्ध कलाकार की भूमिका निभाई, जो जीवन के उत्तरार्ध में परिवार, स्मृतियों, अकेलेपन और अपनी पहचान के संकट से जूझता है। यह भूमिका उनके अपने रंगमंचीय अनुभव और अभिनय की परिपक्वता का मानो संगम थी। इसमें संवादों की शक्ति के साथ मौन का भी उतना ही महत्व था। एक कलाकार जब अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी अपनी कला और स्मृतियों के सहारे खड़ा रह जाता है, तब उसके भीतर का खालीपन किस तरह आकार लेता है, नाना पाटेकर ने इसे अत्यंत मार्मिकता से प्रस्तुत किया। नटसम्राट ने यह भी दिखाया कि अभिनय की असली शक्ति उम्र के साथ कम नहीं होती, बल्कि अनुभव के साथ और गहरी हो सकती है।

पर्दे के पीछे का सैनिक मन

नाना पाटेकर के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका भारतीय सैन्य व्यवस्था से जुड़ाव था। वे Territorial Army से जुड़े और सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनके जीवन में सेना के प्रति सम्मान केवल फिल्मों की भूमिका तक सीमित नहीं रहा। उनका सैनिकों के प्रति लगाव विशेष रूप से कारगिल युद्ध के समय चर्चा में आया। सैनिकों के बीच जाना, उनके जीवन की कठिनाइयों को करीब से समझना और सैन्य जीवन के प्रति सम्मान व्यक्त करना उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने लाता है, जो फिल्मों की चकाचौंध से अलग था। उन्होंने प्रहार : द फाइनल अटैक का निर्देशन भी किया, जिसमें सैनिक जीवन और सैन्य अनुशासन की पृष्ठभूमि थी। निर्देशक के रूप में उनका यह प्रयास बताता है कि सेना और राष्ट्र सेवा के विषय उनके लिए केवल फिल्मी कथानक नहीं थे, बल्कि उनमें उनकी व्यक्तिगत रुचि और संवेदना भी जुड़ी हुई थी।

किसान की पीड़ा तक पहुंचती संवेदना

नाना पाटेकर की मानवीय संवेदना का सबसे ठोस विस्तार उनके सामाजिक कार्यों में दिखाई देता है। महाराष्ट्र में किसानों की समस्याओं, सूखे और ग्रामीण संकट ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ NAAM Foundation की स्थापना की। संस्था का उद्देश्य महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में किसानों और ग्रामीण समुदायों की सहायता करना तथा जल संकट और ग्रामीण समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करना था। NAAM Foundation के कार्यों में किसानों को सहयोग देने के साथ जल संरक्षण, जल संसाधनों के पुनर्जीवन, गांवों के विकास और ग्रामीण समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने जैसे प्रयास शामिल रहे हैं। संस्था स्वयं अपने आरंभ को महाराष्ट्र के सूखे, किसानों की पीड़ा और बढ़ती किसान आत्महत्याओं के संकट के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में वर्णित करती है। यहां नाना पाटेकर के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। वे केवल किसानों की समस्या पर बोलने वाले कलाकार नहीं रहे; उन्होंने अपनी लोकप्रियता और संसाधनों को उनके बीच काम करने के प्रयास से जोड़ा। इससे उनके सामाजिक सरोकारों को एक व्यावहारिक दिशा मिली।

स्टारडम के बीच सादगी

फिल्मी दुनिया में लोकप्रियता अक्सर व्यक्ति और उसकी सार्वजनिक छवि के बीच दूरी पैदा कर देती है। नाना पाटेकर का व्यक्तित्व इस मामले में अलग दिखाई देता रहा। वे ग्लैमर की दुनिया का हिस्सा होते हुए भी उससे पूरी तरह संचालित नहीं हुए। उनकी बातचीत में सीधेपन की छाप थी। उनके विचारों में स्पष्टता थी और कई बार उनकी बेबाकी भी चर्चा का विषय बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए उनकी तीव्रता, विशिष्ट व्यक्तित्व, बहुमुखी प्रतिभा और स्पष्टवादिता को याद किया है। उनकी सादगी को केवल बाहरी जीवन शैली के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह उनके कला-दर्शन में भी दिखाई देती थी। वे भूमिका को बड़ा बनाने के लिए अनावश्यक अभिनय का सहारा नहीं लेते थे। कई बार उनकी आंखों का एक भाव या आवाज का एक उतार-चढ़ाव पूरे दृश्य पर भारी पड़ जाता था।

आवाज, मौन और अभिनय की भाषा

नाना पाटेकर के अभिनय पर चर्चा उनकी आवाज के बिना अधूरी है। उनकी आवाज में ऐसी प्राकृतिक दृढ़ता थी कि सामान्य वाक्य भी उनके मुंह से निकलकर प्रभावशाली बन जाता था। लेकिन केवल ऊंची या तीखी आवाज उनकी विशेषता नहीं थी। असली शक्ति उनके नियंत्रण में थी। वे जानते थे कि कब आवाज को तेज करना है और कब धीमा। कब शब्दों को रोकना है और कब मौन को संवाद बनने देना है। उनकी आंखें, चेहरे की मांसपेशियां, शरीर का तनाव और संवाद के बीच का विराम सब मिलकर अभिनय की एक ऐसी भाषा बनाते थे, जिसे दर्शक सहज रूप से समझ लेते थे। उनकी यही शैली उन्हें भीड़ में अलग करती थी। वे पर्दे पर आते थे तो दृश्य का केंद्र अपने आप बदल जाता था। यही कारण है कि कई बार सीमित समय की भूमिका भी उनकी उपस्थिति के कारण दर्शकों की स्मृति में लंबे समय तक बनी रहती थी।

पुरस्कारों से बड़ी उपलब्धि : दर्शकों की स्मृति

नाना पाटेकर को तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले परिंदा और अग्निसाक्षी के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता तथा क्रांतिवीर के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान। उन्हें कई फिल्मफेयर और अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। लेकिन किसी कलाकार के लिए पुरस्कारों से भी बड़ा सम्मान दर्शकों की स्मृति में जीवित रहना होता है। नाना पाटेकर इस कसौटी पर बेहद सफल रहे। उनके अनेक संवाद, किरदार और दृश्य आज भी लोगों की बातचीत का हिस्सा हैं। यह भी उनकी कला की सफलता का प्रमाण है कि गंभीर सिनेमा से लेकर व्यावसायिक फिल्मों और कॉमेडी तक, अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों ने उन्हें स्वीकार किया। एक ओर क्रांतिवीर और नटसम्राट का कलाकार था, दूसरी ओर वेलकम का उदय शेट्टी। एक ओर सैनिक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा व्यक्तित्व था, दूसरी ओर मंच पर चरित्र को जीवंत करने वाला रंगकर्मी।

कलाकार की सामाजिक जिम्मेदारी

नाना पाटेकर का जीवन यह प्रश्न भी सामने रखता है कि एक लोकप्रिय कलाकार की समाज के प्रति क्या जिम्मेदारी हो सकती है। उनकी यात्रा का उत्तर स्पष्ट है लोकप्रियता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज से संवाद का माध्यम भी बन सकती है। उन्होंने किसानों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझा। ग्रामीण संकट से जुड़े कार्यों में भाग लिया। सेना और सैनिकों के प्रति अपना सम्मान व्यवहार में व्यक्त किया। अभिनय में भी उन्होंने ऐसे पात्रों को आवाज दी, जिनमें संघर्ष, असंतोष, पीड़ा और न्याय की आकांक्षा थी। इस दृष्टि से उनका जीवन अभिनय और सामाजिक संवेदना के बीच एक पुल की तरह दिखाई देता है।

नाना पाटेकर की विरासत

हर बड़ा कलाकार अपने पीछे केवल फिल्में नहीं छोड़ता। वह एक शैली, एक दृष्टि और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मानदंड छोड़ जाता है। नाना पाटेकर की विरासत भी इसी व्यापक अर्थ में समझी जानी चाहिए। उन्होंने यह दिखाया कि अभिनेता बनने के लिए केवल आकर्षक व्यक्तित्व पर्याप्त नहीं है। चरित्र को समझना, उसके भीतर उतरना, उसके संघर्ष को महसूस करना और उसे ईमानदारी से दर्शकों तक पहुंचाना जरूरी है। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि लोकप्रिय सिनेमा और गंभीर अभिनय के बीच कोई अनिवार्य दीवार नहीं है। एक कलाकार एक ही समय में दर्शकों का मनोरंजन भी कर सकता है और समाज के गंभीर प्रश्नों को भी सामने ला सकता है। रंगमंच से शुरू हुई उनकी यात्रा सिनेमा तक पहुंची, लेकिन उनका कलाकार वहीं नहीं रुका। वह सामाजिक जीवन में भी दिखाई दिया। यही उनकी विरासत को व्यापक बनाता है।

पर्दा गिरा, लेकिन आवाज बाकी है

नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई केवल किसी दूसरे कलाकार के आने से नहीं हो सकती। कलाकार आते हैं, भूमिकाएं निभाते हैं और चले जाते हैं, लेकिन कुछ कलाकार अपनी आवाज, अपनी शैली और अपने किरदारों के माध्यम से सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं। नाना पाटेकर उन्हीं कलाकारों में थे। उनका जीवन संघर्ष से शुरू हुआ, रंगमंच की तपस्या से निखरा और सिनेमा के विस्तृत आकाश में अपनी अलग पहचान बनाता गया। उन्होंने खलनायक को भी मनुष्य की जटिलता दी, नायक को भी बेचैनी दी और हास्य पात्र को भी ऐसी जीवंतता दी कि वह दर्शकों की स्मृति में बस गया। परिंदा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, खामोशी, नटसम्राट और वेलकम जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग रूप उनकी अभिनय क्षमता की व्यापकता का प्रमाण हैं। लेकिन नाना पाटेकर की सबसे बड़ी पहचान शायद यही नहीं है कि उन्होंने कितने पुरस्कार जीते या कितनी सफल फिल्में दीं। उनकी असली पहचान उस संवेदनशील मनुष्य में थी, जिसने किसानों की पीड़ा को महसूस किया, ग्रामीण भारत के संकट से जुड़ने का प्रयास किया और अपनी लोकप्रियता को सामाजिक सेवा की दिशा में लगाया।

अभिनय और इंसानियत की अमिट छाप

NAAM Foundation के माध्यम से उनकी यह संवेदना संस्थागत रूप में आगे बढ़ी और किसानों तथा ग्रामीण समुदायों की सहायता के प्रयासों से जुड़ी। वे अभिनय के ऐसे साधक थे, जिनकी आवाज में आक्रोश था तो आंखों में करुणा भी। उनके व्यक्तित्व में कठोरता थी तो भीतर कहीं एक बेहद संवेदनशील मनुष्य भी मौजूद था। शायद इसी विरोधाभास ने उनके अभिनय को इतना वास्तविक बनाया। आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके किरदार जीवित हैं। उनकी आवाज जीवित है। उनका रंगमंच जीवित है। उनके सामाजिक सरोकारों की स्मृति जीवित है। और सबसे बढ़कर, अभिनय को ईमानदारी से जीने की उनकी परंपरा जीवित है। भारतीय सिनेमा के इस असाधारण कलाकार के लिए यही कहा जा सकता है कि पर्दे पर उनका अंतिम दृश्य भले समाप्त हो गया हो, लेकिन उनके निभाए किरदारों की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। वे आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों और दर्शकों से संवाद करते रहेंगे। नाना पाटेकर चले गए, लेकिन उनका अभिनय भारतीय सिनेमा की स्मृति में लंबे समय तक उसी तीव्रता से गूंजता रहेगा, जिस तीव्रता से उनकी आवाज कभी पर्दे से निकलकर सीधे दर्शकों के मन तक पहुंचती थी।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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