नीति आयोग ने देश में औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के बड़े विस्तार को ध्यान में रखते हुए सीमेंट, एल्युमिनियम और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्रों के लिए उत्सर्जन घटाने का एक विस्तृत रोडमैप जारी किया है। यह पहल विकसित भारत के 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य और भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।
नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम ने कहा कि करीब डेढ़ साल पहले नीति आयोग में ग्रीन ट्रांजिशन, एनर्जी, एनवायरनमेंट और क्लाइमेट चेंज डिवीजन की स्थापना की गई थी। इससे पहले नीति आयोग में जलवायु परिवर्तन या हरित परिवर्तन पर केंद्रित कोई अलग प्रभाग नहीं था। आज यह नीति आयोग का सबसे बड़ा प्रभाग बन चुका है, जिसमें लगभग 50 पेशेवर कार्यरत हैं, जिनमें पीएचडी, एमबीए और विषय विशेषज्ञ शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह टीम देश में हरित परिवर्तन से जुड़े ज्ञान का एक मजबूत और बौद्धिक रूप से सशक्त स्रोत बन चुकी है।
रोडमैप के अनुसार, वर्ष 2047 तक सीमेंट उत्पादन में चार गुना और एल्युमिनियम उत्पादन में पांच गुना वृद्धि का अनुमान है। वर्तमान में औद्योगिक क्षेत्र देश के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 24 प्रतिशत का योगदान देता है, जिसे भारत की नेट-जीरो 2070 की प्रतिबद्धता और 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए नियंत्रित करना आवश्यक है।
देश में वर्तमान सीमेंट उत्पादन 390 मिलियन टन है, जो 2047 तक बढ़कर 1,743 मिलियन टन होने का अनुमान है। फिलहाल सीमेंट क्षेत्र से 246 मिलियन टन CO2 समतुल्य उत्सर्जन होता है, जो भारत के कुल उत्सर्जन का लगभग 6 प्रतिशत है। भविष्य में उत्पादन बढ़ने के साथ उत्सर्जन में भी वृद्धि की आशंका को देखते हुए रोडमैप में वैकल्पिक ईंधन के रूप में नगर ठोस कचरे से बने रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (RDF) के उपयोग, क्लिंकर के विकल्पों को बढ़ावा देने और कार्बन कैप्चर एवं उपयोग (CCU) परियोजनाओं की सिफारिश की गई है।
एल्युमिनियम क्षेत्र में भारत का मौजूदा उत्पादन लगभग 50 लाख टन प्रति वर्ष है, जिसका उपयोग सौर ऊर्जा प्रणालियों, इलेक्ट्रिक वाहनों, एयरोस्पेस और समुद्री क्षेत्रों में किया जाता है। देश अपने प्राथमिक एल्युमिनियम उत्पादन का 40 से 50 प्रतिशत निर्यात भी करता है। इस क्षेत्र से वर्तमान में लगभग 83 मिलियन टन CO2 समतुल्य उत्सर्जन होता है, जो 2070 तक बढ़कर 376 मिलियन टन CO2 समतुल्य होने का अनुमान है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि एल्युमिनियम एक कठिन-से-नियंत्रित क्षेत्र है, क्योंकि इसके निर्माण में 75 प्रतिशत से अधिक उत्सर्जन बिजली खपत से जुड़ा होता है। अल्पकालिक अवधि यानी 2030 तक इस बिजली आपूर्ति को नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ने का सुझाव दिया गया है। मध्यम अवधि में परमाणु ऊर्जा को विकल्प के रूप में देखा गया है, जबकि दीर्घकाल में कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) के साथ कैप्टिव थर्मल पावर को प्राथमिकता दी गई है।
रोडमैप में देश के लगभग 6.9 करोड़ एमएसएमई की पहचान की गई है, जो चमड़ा, वस्त्र, कागज, स्टील री-रोलिंग, फाउंड्री, रसायन और फार्मा जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ये इकाइयाँ भारत के कुल निर्यात में 45.7 प्रतिशत और सकल मूल्य वर्धन में 30 प्रतिशत का योगदान देती हैं। एमएसएमई क्षेत्र से लगभग 135 मिलियन टन CO2 समतुल्य उत्सर्जन होता है, जो देश के कुल उत्सर्जन का 3 से 4 प्रतिशत है।
नीति आयोग के रोडमैप में एमएसएमई के लिए ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, माइक्रो यूनिट्स को हरित बिजली से जोड़ने और प्राकृतिक गैस जैसे कम-उत्सर्जन ईंधनों के उपयोग पर जोर दिया गया है। अगले पांच वर्षों में इन उपायों के जरिए 55 से 62 प्रतिशत तक उत्सर्जन में कमी की संभावना जताई गई है। इसके तहत ऊर्जा-कुशल बॉयलर, हीट पंप, हीट एक्सचेंजर, रोलिंग, मिलिंग और कूलिंग उपकरणों के उपयोग से विशिष्ट ऊर्जा खपत में कम से कम 20 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है।
रोडमैप में पात्र संयंत्र और मशीनरी के लिए 15 प्रतिशत तक पूंजी सब्सिडी के रूप में वायबिलिटी गैप फंडिंग देने का भी सुझाव दिया गया है। नीति आयोग का मानना है कि यह रणनीति औद्योगिक विकास और पर्यावरण संतुलन के बीच संतुलन बनाते हुए भारत को सतत और हरित विकास की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
-(इनपुटःएजेंसी)


