खादी सतत आजीविका, महिला सशक्तिकरण और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनकर उभरी है। खादी और ग्रामोद्योग ग्रामीण रोजगार सृजन, आर्थिक आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के साथ समावेशी विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
ग्रामीण आजीविका और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका
खादी और ग्रामोद्योग (केवीआई) ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने, रोजगार के अवसर पैदा करने और आत्मनिर्भर भारत के विजन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी खादी पारंपरिक शिल्प कौशल को सतत उत्पादन पद्धतियों के साथ जोड़ती है। इससे विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को आजीविका के अवसर मिलते हैं।
हाथ से कताई खादी की विशिष्ट पहचान
खादी हाथ से काते और बुने गए कपड़े के रूप में प्राकृतिक रेशों तथा स्थानीय उत्पादन प्रणालियों पर आधारित है। इसकी श्रम-प्रधान और विकेंद्रीकृत प्रकृति विभिन्न कौशल स्तरों पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है और सतत ग्रामीण विकास में योगदान देती है। यह क्षेत्र सतत विकास लक्ष्य-1 यानी गरीबी उन्मूलन और सतत विकास लक्ष्य-8 यानी सभ्य कार्य एवं आर्थिक विकास के उद्देश्यों को भी समर्थन देता है। हाथ से कताई खादी और हथकरघा के बीच प्रमुख अंतर है। वर्षों से खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) कौशल विकास, क्षमता निर्माण और कौशल उन्नयन की पहलों के माध्यम से खादी संस्थानों को सहयोग प्रदान करता रहा है।
कताई-बुनाई की मजदूरी बढ़ने से कारीगरों को लाभ
अप्रैल 2025 से कताई और बुनाई की मजदूरी में वृद्धि, बेहतर कार्य उपकरणों और बुनियादी ढांचे के लिए सहायता तथा विपणन संबंधी उपायों को मजबूत करने जैसे कदम उठाए गए हैं। इन पहलों का उद्देश्य कारीगरों की आय में सुधार करना और पारंपरिक आजीविका को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है।
आधुनिक फैशन और जीवनशैली का हिस्सा बनी खादी
खादी अब आधुनिक फैशन और जीवनशैली का अभिन्न अंग बन गई है। खादी डेनिम, डिजाइनर साड़ियां, ब्राइडल वियर, आधुनिक शर्ट और ट्राउजर जैसी नई उत्पाद श्रेणियों ने नई पीढ़ी के बीच इसकी लोकप्रियता बढ़ाई है। दिल्ली स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (एनआईएफटी) के खादी उत्कृष्टता केंद्र ने विभिन्न श्रेणियों में खादी के 2,129 डिजाइन संग्रह विकसित किए हैं। 710 नए उत्पादों वाली नवयुग खादी और वेलनेस एवं योग परिधान संग्रह ‘स्वधा’ की शुरुआत ने खादी की आधुनिक छवि को और मजबूत किया है।
सरकारी योजनाओं से खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा
सरकार खादी विकास योजना, ग्रामोद्योग विकास योजना और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) जैसी योजनाओं के माध्यम से खादी एवं ग्रामोद्योग क्षेत्र में रोजगार सृजन को प्रोत्साहित कर रही है। इन योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता, कार्यशील पूंजी की सुविधा, गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल, प्रशिक्षण, टूलकिट, मजदूरी सहायता, विपणन संबंधी सहयोग, डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और सामाजिक सुरक्षा जैसे उपायों के माध्यम से सहायता उपलब्ध कराई जाती है। अहमदाबाद स्थित उद्यमिता विकास संस्थान (ईडीआईआई) के एक मूल्यांकन अध्ययन के अनुसार, इन योजनाओं से जुड़े 75% से अधिक कारीगरों की आय में संबंधित उपायों के बाद उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
खादी से महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता
खादी महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और समावेशी विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरी है। लगभग पांच लाख खादी कारीगरों में करीब 80% महिलाएं हैं। इससे इस क्षेत्र में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी का पता चलता है। अगरबत्ती निर्माण, हस्तनिर्मित कागज, शहद उद्योग और सेवा क्षेत्र जैसे कार्यों में भी महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है। इन गतिविधियों से महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करने और स्थायी आजीविका के अवसर बढ़ाने में मदद मिली है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में खादी के निर्यात की संभावनाएं
हस्तनिर्मित, प्रमाणित, प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों की वैश्विक मांग बढ़ने के साथ खादी और हस्तनिर्मित उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। खादी और ग्रामोद्योग ने न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के व्यापार पोर्टल पर निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसी) के रूप में पंजीकरण कराया है। इसके माध्यम से खादी संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक पहचान दिलाने और निर्यात के अवसर बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
पोंडुरु खादी के जीआई टैग से बढ़ेगी पहचान
सरकार ने खादी उत्पादों की ब्रांडिंग और बाजार में उनकी स्थिति मजबूत करने के लिए भी कदम उठाए हैं। पोंडुरु खादी को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने से इसकी विशिष्ट सूती सामग्री और पारंपरिक कताई-बुनाई प्रक्रियाओं के महत्व को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। आगरा में आयोजित पहले ब्रिक्स एमएसएमई फोरम में पोंडुरु खादी, भारत कस्तूरी कपास, बंगाल मलमल और प्राकृतिक रंगों से रंगे सूती उत्पादों का प्रदर्शन भी किया गया। इन उत्पादों के प्रदर्शन का उद्देश्य भारतीय पारंपरिक वस्त्रों और उनकी विशिष्टताओं को व्यापक पहचान दिलाना है।
खादी उत्पादन इकाइयों का हो रहा आधुनिकीकरण
परंपरागत प्रथाओं के संरक्षण के साथ तकनीकी उन्नयन और गुणवत्ता संवर्धन पर भी ध्यान दिया जा रहा है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग के सेंट्रल स्लीवर प्लांट का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। कर्नाटक के चित्तदुर्ग और केरल के कुत्तूर स्थित संयंत्रों का आधुनिकीकरण पूरा हो चुका है और वे परिचालन में आ गए हैं। चित्तदुर्ग संयंत्र अपनी 50% ऊर्जा आवश्यकता सौर ऊर्जा से पूरी करता है। पर्यावरणीय स्थिरता को और मजबूत करने के लिए पवन ऊर्जा के उपयोग पर भी विचार किया जा रहा है। ग्रामोद्योग समूहों को मजबूत बनाने के लिए खादी संस्थानों के तकनीकी उन्नयन और प्रौद्योगिकी आधारित साझा सुविधा केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव भी है। इन प्रयासों से उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
पर्यावरण संरक्षण में खादी की अहम भूमिका
खादी की अंतर्निहित पर्यावरणीय स्थिरता जलवायु परिवर्तन और जिम्मेदार उपभोग के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता बढ़ाती है। प्राकृतिक रेशों और रंगों पर आधारित इसकी उत्पादन प्रक्रिया में ऊर्जा और पानी की अपेक्षाकृत कम आवश्यकता होती है, जिससे पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव कम करने में मदद मिल सकती है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीआईआरसीओटी) के सहयोग से प्राकृतिक रूप से रंगीन कपास की किस्में विकसित करने की दिशा में पहल कर रहा है। इसका उद्देश्य पारंपरिक रंगाई प्रक्रियाओं से जुड़े पानी के उपयोग, रासायनिक प्रदूषण और ऊर्जा खपत को कम करना है।
पुनर्चक्रण और अपचक्रण से रोजगार के नए अवसर
खादी में हस्त-कताई के माध्यम से पुनर्चक्रण और अपचक्रण की भी व्यापक संभावनाएं हैं। इसमें ऐसे रेशों और तंतुओं का उपयोग भी शामिल है, जो मशीनीकृत कताई के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते। इस तरह की पहलों से अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा होने के साथ सतत विकास लक्ष्य-12 यानी जिम्मेदार उपभोग एवं उत्पादन और सतत विकास लक्ष्य-13 यानी जलवायु कार्रवाई में योगदान देने की क्षमता है।
परंपरा और आधुनिकता के संगम से आगे बढ़ रही खादी
स्वदेशी और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक से लेकर समकालीन फैशन एवं जीवनशैली के विकल्प तक खादी का सफर बदलती उपभोक्ता प्राथमिकताओं के अनुरूप ढलने की इसकी क्षमता को दर्शाता है। इसके साथ ही खादी ने अपनी पारंपरिक पहचान को भी बनाए रखा है। विरासत और नवाचार, रोजगार और उद्यमिता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समावेश तथा आर्थिक गतिविधियों और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को एक साथ जोड़कर खादी समावेशी एवं सतत विकास के व्यापक दृष्टिकोण में योगदान दे रही है।
पारंपरिक ज्ञान से भी मिल सकते हैं सतत विकास के समाधान
खादी का निरंतर विकास दर्शाता है कि सतत समाधान केवल आधुनिक तकनीकों से ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संरक्षित और परिष्कृत पारंपरिक प्रथाओं से भी प्राप्त किए जा सकते हैं। अपने कारीगरों, कताईकर्ताओं और ग्रामीण उद्यमियों के माध्यम से खादी समावेशी विकास, टिकाऊ आजीविका और जिम्मेदार उत्पादन का एक विशिष्ट मॉडल प्रस्तुत करती है। ग्रामीण रोजगार, महिला सशक्तिकरण, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को एक साथ आगे बढ़ाने की इसकी क्षमता इसे समावेशी और सतत भारत के निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बनाती है। (इनपुट: पीआईबी)


