मानव सभ्यता का इतिहास केवल पुरानी पुस्तकों, पांडुलिपियों या पत्थरों पर उकेरी गई इबारतों तक ही सीमित नहीं है। बीसवीं शताब्दी के आगमन के साथ जब कैमरे के लेंस ने दृश्यों को और रिकॉर्डर ने ध्वनियों को कैद करना शुरू किया, तो इतिहास ने एक नया और जीवंत रूप धारण कर लिया। आज हमारे पास स्वतंत्रता सेनानियों के गूंजते भाषण, महान ऐतिहासिक घटनाओं के चलते-फिरते चित्र, और लोक संस्कृति की वह अमूल्य धड़कनें मौजूद हैं जो हमें हमारे अतीत से सीधे जोड़ती हैं। इसी सजीव सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और इसके प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 27 अक्टूबर को ‘विश्व दृश्य-श्रव्य विरासत दिवस’ (World Day for Audiovisual Heritage) मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम “Your Window to the World” (दुनिया को देखने की आपकी खिड़की) है। यह विषय इस बात को गहराई से रेखांकित करता है कि कैसे पुरानी फिल्में, रेडियो प्रसारण और दृश्य-श्रव्य अभिलेख हमें विभिन्न संस्कृतियों, समाजों और बीते हुए युगों की झलक दिखाते हैं। यह दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि डिजिटल और एनालॉग रूप में मौजूद इन नाजुक स्मृतियों को संजोकर रखना केवल विशेषज्ञों का नहीं, बल्कि हम सबका सामूहिक दायित्व है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी समृद्ध विरासत से हमेशा जुड़ी रह सकें।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और दिवस की शुरुआत

विश्व दृश्य-श्रव्य विरासत दिवस की शुरुआत यूनेस्को के प्रयासों से हुई। 27 अक्टूबर 1980 को यूनेस्को के 21वें महासम्मेलन में चलचित्रों के संरक्षण एवं सुरक्षा संबंधी सिफारिश अपनाई गई। इस पहल ने फिल्मों और अन्य चलचित्र सामग्रियों को मनोरंजन के साधन के साथ ऐतिहासिक दस्तावेज तथा सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सुरक्षित रखने की आवश्यकता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाई। वर्ष 2005 में यूनेस्को के 33वें आम सम्मेलन में 27 अक्टूबर को विश्व दृश्य-श्रव्य विरासत दिवस मनाने का निर्णय लिया गया और 2006 से इसका आयोजन शुरू हुआ। इस दिवस का उद्देश्य दृश्य-श्रव्य सामग्री के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा पुरानी फिल्मों और रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने, उनका वर्गीकरण करने और उन्हें शोधकर्ताओं एवं आम लोगों के लिए सुलभ बनाने वाले विशेषज्ञों, संग्रहकर्ताओं तथा संस्थानों के योगदान को सम्मानित करना है।
दृश्य-श्रव्य विरासत का व्यापक अर्थ
दृश्य-श्रव्य विरासत में वे सामग्रियां शामिल हैं, जिनमें चित्रों और ध्वनियों के माध्यम से ऐतिहासिक घटनाओं, व्यक्तियों, समाज और सांस्कृतिक परंपराओं को दर्ज किया जाता है। इनमें मूक एवं फीचर फिल्में, वृत्तचित्र, समाचार फिल्में, रेडियो कार्यक्रम, टेलीविजन प्रसारण, साक्षात्कार, भाषण, संगीत रिकॉर्डिंग, लोकगीत, नाटक और डिजिटल वीडियो शामिल हैं। इनके माध्यम से किसी दौर की परिस्थितियों और मानवीय अनुभवों को जीवंत रूप में समझा जा सकता है। ऐतिहासिक भाषणों की रिकॉर्डिंग वक्ता की आवाज, अभिव्यक्ति शैली और तत्कालीन राजनीतिक चेतना से परिचित कराती है। वहीं, पुराने गांवों, पारंपरिक मेलों और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों के दृश्य क्षेत्रीय जीवन शैली तथा सांस्कृतिक परंपराओं की जानकारी देते हैं। यह विरासत आम नागरिकों, ग्रामीणों, आदिवासी समुदायों और स्थानीय कलाकारों के अनुभवों को इतिहास में स्थान देकर उसे अधिक व्यापक और मानवीय दृष्टिकोण प्रदान करती है।
संस्कृति, भाषा और लोक परम्पराओं के संरक्षण में भूमिका

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में दृश्य-श्रव्य विरासत का विशेष महत्व है। यहां अनेक भाषाएं, बोलियां, लोकगीत, नृत्य शैलियां, पारंपरिक कलाएं और धार्मिक-सामाजिक परंपराएं प्रचलित हैं। इनमें से कई परंपराएं मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं, लेकिन बदलती जीवन शैली और नई पीढ़ी की रुचियों के कारण कुछ परंपराएं धीरे-धीरे सीमित हो रही हैं। इसलिए उनका समय रहते दस्तावेजीकरण आवश्यक है।मिथिला की लोक संस्कृति इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। विद्यापति के पदों का गायन, सामा-चकेवा के लोकगीत, विवाह संस्कारों के पारंपरिक गीत, कोहबर की रस्में और लोकनाट्य यहां की सांस्कृतिक पहचान हैं। इनकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग से भावी पीढ़ियां इनकी भाषा, संगीत, मौलिकता और सामाजिक संदर्भों को समझ सकेंगी। इसी तरह राजस्थान का लोक संगीत, पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय नृत्य परंपराएं, दक्षिण भारत की शास्त्रीय संगीत शैलियां और विभिन्न क्षेत्रों की मौखिक कथाएं सुरक्षित रखी जा सकती हैं। रिकॉर्डिंग में कलाकारों का उच्चारण, वाद्य यंत्रों का प्रयोग, प्रस्तुति शैली और स्थानीय परिवेश भी दर्ज होते हैं। हालांकि, संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों और कलाकारों की भागीदारी, सहमति तथा परंपराओं के सही संदर्भ का ध्यान रखना जरूरी है। इससे यह प्रयास विश्वसनीय और उपयोगी बनता है।
पत्रकारिता और प्रसारण के इतिहास का महत्व

दृश्य-श्रव्य विरासत का पत्रकारिता और जनसंचार के इतिहास में विशेष महत्व है। पुराने समाचार प्रसारण, ऐतिहासिक साक्षात्कार, चुनावी भाषण, संसद की चर्चाएं, आपदाओं के दृश्य और राष्ट्रीय आयोजनों की रिकॉर्डिंग देश की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक यात्रा को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। भारत में आकाशवाणी और दूरदर्शन ने जनसंचार, शिक्षा, सांस्कृतिक प्रसार तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। आकाशवाणी के पुराने कार्यक्रम, विविध भारती के संगीत प्रसारण, दूरदर्शन के ऐतिहासिक समाचार बुलेटिन और कृषि एवं शिक्षा संबंधी कार्यक्रम अपने समय के समाज की झलक दिखाते हैं। इन अभिलेखों से समाचार प्रस्तुति में बदलाव, जनहित के विषयों की प्राथमिकता और तकनीकी विकास के प्रभावों का अध्ययन किया जा सकता है। समाचारों की भाषा, संवाद शैली, संगीत और दृश्य प्रस्तुति भी पत्रकारिता के विकास को समझने में सहायक हैं। इसलिए प्रसारण संस्थानों को वर्तमान घटनाओं की रिपोर्टिंग के साथ ऐतिहासिक प्रसारणों, महत्वपूर्ण कार्यक्रमों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का व्यवस्थित संरक्षण भी करना चाहिए, ताकि भावी पीढ़ियों को भारत के सार्वजनिक जीवन और मीडिया के विकास की प्रामाणिक जानकारी मिल सके।
भारत में संरक्षण के प्रमुख प्रयास

भारत में दृश्य-श्रव्य विरासत के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार (NFAI), राष्ट्रीय सांस्कृतिक दृश्य-श्रव्य अभिलेखागार (NCAA) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की स्थापना फरवरी 1964 में हुई थी। इसका उद्देश्य भारतीय सिनेमा की विरासत का संकलन, संरक्षण और दस्तावेजीकरण करना तथा फिल्म संस्कृति को प्रोत्साहित करना है। वर्तमान में यह राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (NFDC) के अंतर्गत कार्य करता है। वर्ष 2015 में शुरू राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन ने पुरानी फिल्मों के डिजिटलीकरण और पुनर्स्थापन को बढ़ावा दिया। राष्ट्रीय सांस्कृतिक दृश्य-श्रव्य अभिलेखागार का उद्देश्य मौखिक परंपराओं, प्रदर्शन कलाओं, सांस्कृतिक प्रथाओं, अनुष्ठानों और पारंपरिक ज्ञान को दृश्य-श्रव्य माध्यमों में सुरक्षित रखना है। इस परियोजना के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को सौंपी गई थी। इन पहलों से सांस्कृतिक रिकॉर्डिंगों की पहचान, डिजिटलीकरण और उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलती है। साथ ही, भारतीय सिनेमा, संगीत, लोककला और पारंपरिक ज्ञान को शिक्षा, शोध तथा सांस्कृतिक समझ के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है।
संरक्षण के सामने प्रमुख चुनौतियां
दृश्य-श्रव्य विरासत का संरक्षण कई चुनौतियों से जुड़ा है। पुरानी फिल्म रीलों में रासायनिक बदलाव, टूट-फूट और रंगों का क्षरण हो सकता है, जबकि ऑडियो-वीडियो टेप समय के साथ खराब हो जाते हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव, नमी, धूल और अनुचित भंडारण भी इन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। डिजिटल सामग्री का संरक्षण भी चुनौतीपूर्ण है। कंप्यूटर या हार्ड डिस्क में रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं, क्योंकि उपकरण खराब हो सकते हैं, फाइल प्रारूप पुराने पड़ सकते हैं और उन्हें चलाने वाली तकनीक अनुपलब्ध हो सकती है। इसलिए रिकॉर्डिंग की कई प्रतियां सुरक्षित रखना, उनकी नियमित जांच करना और तकनीक बदलने पर उन्हें नए फाइल प्रारूप में सहेजना जरूरी है। अभिलेखों का उचित विवरण भी आवश्यक है। व्यक्ति, स्थान, तारीख, भाषा और घटना से संबंधित जानकारी के अभाव में रिकॉर्डिंग की पहचान और उपयोग कठिन हो जाता है। इसके अलावा, कॉपीराइट, निजता और संवेदनशील ऐतिहासिक सामग्री को सार्वजनिक करने से जुड़े प्रश्नों पर सावधानी बरतनी चाहिए। इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों, पर्याप्त वित्तीय संसाधनों, आधुनिक तकनीक और संस्थानों के बीच सहयोग की आवश्यकता है।
डिजिटल युग में नई संभावनाएं

डिजिटल तकनीक ने दृश्य-श्रव्य विरासत के संरक्षण और प्रसार को आसान बनाया है। पुरानी फिल्मों, ऑडियो टेपों और वीडियो रिकॉर्डिंगों को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखकर शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, पत्रकारों और आम नागरिकों के लिए दूर से भी उपलब्ध कराया जा सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से आवाज पहचानने, भाषण को लिखित रूप देने, सामग्री खोजने और अभिलेखों का वर्गीकरण करने में सहायता मिलती है। आधुनिक तकनीक से पुरानी रिकॉर्डिंग का अनावश्यक शोर कम करने और क्षतिग्रस्त दृश्यों को सुधारने का काम भी किया जा सकता है। बहुभाषी तकनीक क्षेत्रीय भाषाओं की सामग्री को अधिक लोगों तक पहुंचाने में उपयोगी है। हालांकि, तकनीक के इस्तेमाल में सावधानी जरूरी है। रिकॉर्डिंग में कृत्रिम बदलाव किए जाने पर मूल और संशोधित रूप का अंतर स्पष्ट होना चाहिए। ऐतिहासिक सामग्री की प्रामाणिकता, संदर्भ और विश्वसनीयता बनाए रखना भी आवश्यक है। डिजिटल संग्रह तभी उपयोगी होंगे, जब सामग्री सुरक्षित रहने के साथ लंबे समय तक खोजने और समझने योग्य भी बनी रहेगी।
समाज और नई पीढ़ी की भागीदारी
दृश्य-श्रव्य विरासत के संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकारों, अभिलेखागारों और प्रसारण संस्थानों की नहीं, बल्कि परिवारों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कलाकारों, पत्रकारों और स्थानीय समुदायों की भी है। घरों में रखी पुरानी ऑडियो कैसेट, पारिवारिक वीडियो, स्थानीय आयोजनों की रिकॉर्डिंग और दुर्लभ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भविष्य के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज बन सकती हैं। इनके संरक्षण के लिए उचित भंडारण, उपलब्ध जानकारी का विवरण और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की सलाह जरूरी है। पुरानी रिकॉर्डिंग को अनुपयुक्त उपकरणों से बार-बार चलाने या बिना जानकारी के नष्ट करने से बचना चाहिए। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में स्थानीय इतिहास, लोक भाषाओं तथा पारंपरिक कलाओं पर आधारित दृश्य-श्रव्य परियोजनाएं विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ सकती हैं। समाज की सक्रिय भागीदारी से संरक्षण का दायरा संस्थागत संग्रहों से आगे बढ़कर आम लोगों के जीवन तक पहुंचेगा। इससे उन आवाजों, अनुभवों और परंपराओं को भी इतिहास में स्थान मिलेगा, जो अन्यथा दर्ज होने से वंचित रह सकते हैं।
स्मृतियों का संरक्षण, भविष्य की धरोहर
विश्व दृश्य-श्रव्य विरासत दिवस हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल घटनाओं और तारीखों का विवरण नहीं, बल्कि मानवीय अनुभवों, आवाजों, दृश्यों और सांस्कृतिक स्मृतियों का संग्रह है। पुराने समाचार बुलेटिन, ऐतिहासिक भाषण, फिल्में और लोकगीत भावी पीढ़ियों के लिए ज्ञान तथा सांस्कृतिक पहचान के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। वर्ष 2026 की थीम “Your Window to the World” बताती है कि दृश्य-श्रव्य अभिलेख हमें विभिन्न समाजों और संस्कृतियों को समझने का अवसर देते हैं। इनका संरक्षण केवल तकनीकी कार्य नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। इसके लिए पुराने अभिलेखों का वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटल तकनीक का जिम्मेदार उपयोग और सरकारी संस्थानों के साथ आम नागरिकों की भागीदारी जरूरी है। अतीत की आवाजों और दृश्यों को सहेजना मानवता की सामूहिक स्मृति बचाना है। इससे भावी पीढ़ियां अपनी जड़ों, सांस्कृतिक विविधता और साझा मानवीय अनुभवों को समझ सकेंगी। यही इस दिवस का मूल संदेश है।


