विश्व आवास दिवस : सुरक्षित आवास ही खुशहाल और गरिमापूर्ण जीवन की बुनियाद

प्रकृति के विशाल आंचल में हर जीव अपने लिए एक सुरक्षित बसेरा खोजता है। पक्षी तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला बुनते हैं और मनुष्य अपने सपनों, श्रम और उम्मीदों से घर का निर्माण करता है। घर महज ईंट, पत्थर, सीमेंट से खड़ी चारदीवारी नहीं, बल्कि सुरक्षा की छत, गरिमा का आधार और भविष्य के सपनों को आकार देने वाली वह जगह है, जहां जीवन अपनी जड़ों को मजबूती देता है। हर वर्ष अक्टूबर के पहले सोमवार को मनाया जाने वाला विश्व आवास दिवस हमें याद दिलाता है कि सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक आवास केवल सुविधा नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और बेहतर जीवन की बुनियादी शर्त है। यह दिवस उन करोड़ों लोगों की ओर दुनिया का ध्यान खींचता है, जिनके लिए आज भी सुरक्षित छत एक अधूरा सपना है।

तेजी से बढ़ते शहरीकरण, महंगी होती जमीन, बढ़ते किराये, अनियोजित शहरी विस्तार, झुग्गी-बस्तियों के विस्तार और जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली आपदाओं ने आवास की चुनौती को और जटिल बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वर्ष 2026 में दुनिया में करीब 2.8 अरब लोग किसी न किसी रूप में आवास की समस्‍या से जूझ रहे हैं, जबकि लगभग 1.1 अरब लोग झुग्गी-बस्तियों और अनौपचारिक बस्तियों में जीवन बिता रहे हैं। ऐसे में आवास का प्रश्न केवल मकान निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और समावेशी विकास से जुड़ा व्यापक सरोकार बन गया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1985 में विश्व आवास दिवस की स्थापना की और 1986 में पहली बार इसका आयोजन हुआ। इसका उद्देश्य मानव बस्तियों की स्थिति पर वैश्विक विमर्श को आगे बढ़ाना तथा सभी के लिए पर्याप्त आवास के अधिकार को रेखांकित करना है। वर्ष 2026 में यह दिवस ‘Adequate Housing for All’ यानी ‘सभी के लिए पर्याप्त आवास’ की भावना के साथ मनाया जा रहा है। एक ऐसे भविष्य का संकल्प, जहां किसी के सिर पर केवल छत ही नहीं, बल्कि सुरक्षित, सम्मानजनक और आश्वस्त जीवन की छांव भी हो।

आवास : जीवन की बुनियादी जरूरत से विकास के आधार तक

आवास का अर्थ केवल सिर पर छत होना नहीं है। पर्याप्त आवास में सुरक्षा, स्वच्छता, पानी, बिजली, उचित वेंटिलेशन, स्वास्थ्यकर वातावरण, आवागमन की सुविधा और सामाजिक सेवाओं तक पहुंच भी शामिल है। यदि किसी परिवार के पास मकान तो है, लेकिन वहां पीने का साफ पानी नहीं है, शौचालय नहीं है, बिजली नहीं है या वह बाढ़ और भूस्खलन जैसे खतरों के बीच स्थित है, तो उसे पूर्ण अर्थों में पर्याप्त आवास नहीं कहा जा सकता। आवास का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवन के दूसरे क्षेत्रों से सीधे जुड़ा है। खराब आवासीय परिस्थितियां स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। भीड़भाड़, नमी, वायु प्रदूषण और खराब स्वच्छता बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए विशेष चुनौती पैदा करती है। दूसरी ओर, स्थिर और सुरक्षित घर बच्चों की शिक्षा के लिए बेहतर वातावरण तैयार करता है। जिस परिवार को बार-बार घर बदलना पड़ता है या विस्थापन का सामना करना पड़ता है, उसके बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक जीवन पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए आवास नीति को केवल मकान बनाने की योजना के रूप में देखने के बजाय उसे स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, परिवहन, सामाजिक सुरक्षा और पर्यावरण से जोड़कर देखने की जरूरत है।

दुनिया के सामने बढ़ता आवास संकट

विश्व स्तर पर तेजी से हो रहे शहरीकरण ने आवास की मांग को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया है। विकासशील देशों के शहरों में रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन शहरों की आवासीय क्षमता उस गति से नहीं बढ़ पा रही है। परिणामस्वरूप अनेक लोग अनौपचारिक बस्तियों, झुग्गियों या असुरक्षित किराये के मकानों में रहने को मजबूर हैं। वैश्विक आवास संकट का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि घरों की उपलब्धता और उनकी कीमत के बीच अंतर बढ़ रहा है। जमीन महंगी होने, निर्माण लागत बढ़ने और शहरों में रोजगार के प्रमुख केंद्रों के आसपास जमीन की सीमित उपलब्धता के कारण निम्न और मध्यम आय वर्ग के लिए घर खरीदना कठिन होता जा रहा है। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं, संघर्षों और विस्थापन के कारण लाखों परिवारों को सुरक्षित आवास की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में दुनिया के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर नए आवास का निर्माण और दूसरी ओर मौजूदा अनौपचारिक एवं कमजोर बस्तियों को बेहतर बनाना। केवल नए मकान बनाना पर्याप्त नहीं होगा; आवास को शहर की अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं से भी जोड़ना होगा।

भारत में आवास की बदलती तस्वीर

भारत में भी आवास का प्रश्न लंबे समय से विकास के केंद्र में रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आवास की जरूरतों का स्वरूप अलग-अलग है। ग्रामीण क्षेत्रों में चुनौती पक्के, सुरक्षित और बुनियादी सुविधाओं से युक्त घर उपलब्ध कराने की है, जबकि शहरों में जमीन की कमी, बढ़ती कीमतें, किराये का बोझ और प्रवासी आबादी के लिए किफायती आवास बड़ी चुनौतियां हैं। भारत में आवासीय नीतियों का दायरा भी धीरे-धीरे केवल मकान निर्माण से आगे बढ़ा है। अब जोर इस बात पर है कि परिवारों को ऐसा घर मिले, जिसमें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों और जो उन्हें सामाजिक सुरक्षा तथा सम्मान का एहसास भी कराए। ग्रामीण भारत में पक्के घरों के निर्माण ने परिवारों की जीवन-स्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव की संभावनाएं पैदा की हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में किफायती आवास, किराये के मकान और कमजोर वर्गों के लिए आवासीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।

प्रधानमंत्री आवास योजना : आवास को जनकल्याण से जोड़ने का प्रयास

भारत में प्रधानमंत्री आवास योजना आवासीय जरूरतों को पूरा करने की प्रमुख सरकारी पहलों में शामिल है। शहरी क्षेत्र के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के माध्यम से पात्र परिवारों को पक्का और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के नए चरण PMAY-U 2.0 को 1 सितंबर 2024 से पांच वर्ष के लिए लागू किया गया है। इसका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में पात्र परिवारों को किफायती दर पर घर बनाने, खरीदने या किराये पर लेने में सहायता देना है। योजना में लाभार्थी आधारित निर्माण, किफायती आवास साझेदारी, किफायती किराये के आवास और ब्याज सब्सिडी जैसे चार प्रमुख विकल्प रखे गए हैं। PMAY-U 2.0 के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, निम्न आय वर्ग और मध्यम आय वर्ग के पात्र परिवारों को अलग-अलग प्रावधानों के माध्यम से सहायता देने की व्यवस्था है। योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किफायती आवास के साथ किराये के आवास को भी नीति का हिस्सा बनाया गया है। यह विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों, कामकाजी महिलाओं, औद्योगिक श्रमिकों, निर्माण श्रमिकों और अन्य शहरी गरीबों के लिए महत्वपूर्ण है।

महिला के नाम घर : आवास से सशक्तिकरण तक

आवास योजनाओं का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष महिलाओं के स्वामित्व से जुड़ा है। घर महिला के नाम या पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर होने से संपत्ति में महिला की हिस्सेदारी और उसकी सामाजिक सुरक्षा मजबूत होती है। PMAY-U 2.0 के प्रावधानों में सामान्य स्थिति में घर को परिवार की महिला मुखिया के नाम या पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर रखने की व्यवस्था की गई है। इससे आवास योजना को महिला सशक्तिकरण के व्यापक उद्देश्य से जोड़ा गया है। किसी महिला के नाम संपत्ति होना केवल कानूनी स्वामित्व नहीं है। यह परिवार और समाज में उसकी निर्णय क्षमता को मजबूत कर सकता है तथा संकट की परिस्थितियों में आर्थिक सुरक्षा का आधार बन सकता है। विधवा, अकेली महिला, दिव्यांग, वरिष्ठ नागरिक और अन्य कमजोर वर्गों के लिए आवास की सुरक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

शहरी भारत की चुनौती : किफायती आवास

भारत के शहरों में आवास का सबसे बड़ा सवाल किफायती घरों की उपलब्धता से जुड़ा है। शहरों में रोजगार के अवसर तो बढ़ते हैं, लेकिन रोजगार पाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुरक्षित और किफायती घर उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं है। खासकर प्रवासी श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के सामने यह चुनौती अधिक गंभीर होती है। कई बार कम आय वाले परिवारों को शहर के मुख्य हिस्से से दूर रहना पड़ता है। इससे काम पर आने-जाने का समय और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं। इसलिए आवास नीति को परिवहन नीति से जोड़ना जरूरी है। यदि किफायती घर शहर से बहुत दूर होंगे, तो आवास का आर्थिक लाभ लंबी यात्रा और परिवहन खर्च में कम हो सकता है। यही कारण है कि भविष्य की शहरी योजना में घर, रोजगार और परिवहन को एक साथ देखना होगा।

प्रवासी श्रमिकों के लिए किराये का आवास

शहरों में काम करने वाले लाखों प्रवासी श्रमिकों के लिए अपना घर खरीदना हमेशा संभव नहीं होता। उनके लिए सुरक्षित और किफायती किराये के आवास की व्यवस्था अधिक व्यावहारिक समाधान हो सकती है। किफायती किराये का आवास केवल रहने की जगह नहीं देता, बल्कि श्रमिकों को स्थिरता प्रदान करता है। इससे उन्हें अस्थायी और असुरक्षित बस्तियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। PMAY-U 2.0 में Affordable Rental Housing को अलग विकल्प के रूप में शामिल किया जाना इसी बदलती जरूरत की ओर संकेत करता है। भविष्य में शहरों को ऐसे आवासीय मॉडल विकसित करने होंगे, जहां प्रवासी और अस्थायी कामगार भी सम्मानजनक वातावरण में रह सकें और रोजगार केंद्रों तक आसानी से पहुंच सकें।

झुग्गी-बस्तियां : समस्या के साथ समाधान की तलाश

शहरों की झुग्गी-बस्तियां अक्सर अनियोजित शहरीकरण का परिणाम होती हैं। यहां रहने वाले लोगों को केवल अवैध या अतिक्रमणकारी मानकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। इन बस्तियों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो शहर की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी सेवाएं और श्रम उपलब्ध कराते हैं। इसलिए झुग्गी सुधार में पुनर्वास के साथ-साथ स्थान पर ही बस्ती के उन्नयन की संभावना पर भी विचार करना चाहिए। पानी, बिजली, सड़क, स्वच्छता, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाओं की उपलब्धता के साथ सुरक्षित आवासीय ढांचा विकसित करना अधिक मानवीय और व्यावहारिक रास्ता हो सकता है। जहां पुनर्वास आवश्यक हो, वहां यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि लोगों को रोजगार और सामाजिक नेटवर्क से बहुत दूर न भेज दिया जाए। केवल मकान उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं; जीवन और आजीविका का संबंध भी बनाए रखना जरूरी है।

ग्रामीण आवास : परंपरा और आधुनिकता का संतुलन

ग्रामीण आवास की अपनी विशिष्ट जरूरतें हैं। गांवों में घर का संबंध केवल परिवार के रहने से नहीं, बल्कि कृषि, पशुपालन, घरेलू उद्योग और सामाजिक जीवन से भी होता है। इसलिए ग्रामीण आवास की योजना स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए। स्थानीय निर्माण सामग्री, पारंपरिक वास्तुकला और जलवायु-अनुकूल डिजाइन को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जा सकता है। गर्म क्षेत्रों में प्राकृतिक वेंटिलेशन, अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निकासी और बाढ़ प्रभावित इलाकों में ऊंचे तथा सुरक्षित निर्माण जैसे उपाय आवास को अधिक टिकाऊ बना सकते हैं। ग्रामीण आवास को सड़क, पानी, बिजली, इंटरनेट, स्वास्थ्य केंद्र और स्कूल जैसी सुविधाओं से जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है। इससे गांवों में जीवन की गुणवत्ता बेहतर होगी और अनावश्यक पलायन को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में सुरक्षित आवास

जलवायु परिवर्तन ने आवास की चुनौती को और गंभीर बना दिया है। बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन, अत्यधिक गर्मी और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आवासीय ढांचे को नुकसान पहुंचा रही हैं। ऐसे में भविष्य के घर केवल सुंदर और सुविधाजनक नहीं, बल्कि जलवायु-सहिष्णु और आपदा-रोधी भी होने चाहिए। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जल निकासी और ऊंचे निर्माण, भूकंप संभावित क्षेत्रों में सुरक्षित निर्माण तकनीक तथा गर्म क्षेत्रों में ऊर्जा-कुशल डिजाइन अपनाना आवश्यक है। घरों की योजना बनाते समय स्थानीय पर्यावरण और आपदा जोखिम का आकलन किया जाना चाहिए। ऊर्जा-कुशल भवन, सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन, प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन जैसे उपाय आवास को पर्यावरण के अनुकूल बना सकते हैं। इस तरह आवास नीति जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति का भी हिस्सा बन सकती है।

आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा का गहरा संबंध

स्वस्थ जीवन के लिए स्वस्थ आवास जरूरी है। घर में स्वच्छ पानी, पर्याप्त रोशनी, उचित वेंटिलेशन और स्वच्छ शौचालय जैसी सुविधाएं स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों के लिए सुरक्षित आवास की जरूरत और अधिक होती है। इसी तरह घर बच्चों की शिक्षा का पहला वातावरण भी है। यदि घर में पढ़ने के लिए सुरक्षित स्थान, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी उपलब्ध हो, तो बच्चों को शिक्षा के नए साधनों का लाभ मिल सकता है। इसके विपरीत अस्थिर और भीड़भाड़ वाला आवास बच्चों की पढ़ाई में बाधा डाल सकता है। इसलिए आवास में किया गया निवेश वास्तव में स्वास्थ्य और शिक्षा में भी निवेश है।

तकनीक बदल सकती है आवास की तस्वीर

डिजिटल तकनीक ने आवास योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और निगरानी की नई संभावनाएं पैदा की हैं। जियो-टैगिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, ऑनलाइन आवेदन, GIS आधारित योजना और डिजिटल भुगतान जैसी व्यवस्थाएं योजनाओं की निगरानी को बेहतर बना सकती हैं। भविष्य में कम लागत वाली निर्माण तकनीक, ऊर्जा-कुशल सामग्री, प्री-फैब्रिकेटेड निर्माण और अन्य आधुनिक तकनीकों से कम समय और कम संसाधनों में बेहतर आवास उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। लेकिन तकनीक का उपयोग तभी सार्थक होगा जब वह अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। डिजिटल व्यवस्था के साथ उन लोगों के लिए मानवीय सहायता भी जरूरी है, जो डिजिटल साधनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं।

आवास से आगे : समावेशी शहरों की जरूरत

भविष्य के शहर ऐसे नहीं होने चाहिए जहां एक ओर ऊंची इमारतें और आधुनिक सुविधाएं हों और दूसरी ओर बड़ी आबादी बुनियादी आवास से वंचित हो। समावेशी शहरों में हर आय वर्ग के लोगों के लिए स्थान होना चाहिए। बच्चों के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, बुजुर्गों के लिए सुगम वातावरण, दिव्यांगजनों के लिए बाधारहित आवागमन, महिलाओं के लिए सुरक्षित परिवेश और गरीब परिवारों के लिए किफायती आवास ये सभी अच्छे शहर की पहचान हैं। शहरी नियोजन में समुदाय की भागीदारी भी बढ़ाई जानी चाहिए। जिस समुदाय के लिए आवासीय योजना बनाई जा रही है, उसकी वास्तविक जरूरतों को समझे बिना बनाई गई योजना लंबे समय तक प्रभावी नहीं हो सकती।

भविष्य का आवास कैसा हो?

भविष्य का आवास केवल पक्का मकान नहीं, बल्कि सुरक्षित, किफायती, टिकाऊ, समावेशी और सुविधाओं से जुड़ा घर होना चाहिए। ऐसा घर जो व्यक्ति को प्रकृति और आपदाओं से सुरक्षा दे, परिवार के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए और बच्चों को शिक्षा के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराए। आवासीय योजनाओं में स्थानीय परिस्थितियों, आय स्तर, परिवार की संरचना और आजीविका के स्वरूप को ध्यान में रखना होगा। बुजुर्गों, दिव्यांगजनों, महिलाओं, प्रवासी श्रमिकों और अन्य कमजोर वर्गों के लिए विशेष जरूरतों को भी योजना का हिस्सा बनाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आवास को शहर की मुख्यधारा से अलग नहीं किया जा सकता। घर के साथ सड़क, परिवहन, रोजगार, स्कूल, अस्पताल, बाजार, स्वच्छता, पानी और डिजिटल सेवाएं उपलब्ध हों, तभी आवास वास्तव में जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला सकता है।

हर व्यक्ति के लिए घर और हर घर के लिए गरिमा

विश्व आवास दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि विकास का वास्तविक अर्थ क्या है। केवल ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और आधुनिक शहर किसी समाज की प्रगति का पूरा पैमाना नहीं हो सकते। विकास तब सार्थक होता है, जब समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को भी सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले। वर्ष 2026 की “सभी के लिए पर्याप्त आवास” की थीम इसी व्यापक चुनौती को सामने रखती है। दुनिया के करोड़ों लोगों के लिए आवास की कमी आज भी वास्तविक समस्या है। इसलिए आवास निर्माण के साथ किफायती कीमत, सुरक्षित स्थान, बुनियादी सेवाएं, रोजगार तक पहुंच और पर्यावरणीय स्थिरता को भी नीति का हिस्सा बनाना होगा। भारत के संदर्भ में भी लक्ष्य केवल अधिक से अधिक मकान बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसे घर और ऐसी बस्तियां विकसित करना होना चाहिए जहां परिवार सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी पहलों ने आवास को व्यापक सामाजिक सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। आगे की चुनौती यह है कि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और घर के साथ जीवन की आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध हों।आखिरकार, घर विकास की सबसे छोटी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। एक सुरक्षित घर से परिवार में स्थिरता आती है, स्थिरता से शिक्षा और स्वास्थ्य को आधार मिलता है, और यही आधार व्यक्ति को आर्थिक रूप से आगे बढ़ने का अवसर देता है। इसलिए विश्व आवास दिवस का संदेश केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह संकल्प होना चाहिए कि विकास की यात्रा में कोई परिवार बेघर, असुरक्षित या बुनियादी सुविधाओं से वंचित न रहे। सच्चे अर्थों में समावेशी विकास वही है, जिसमें हर व्यक्ति के पास रहने के लिए केवल छत नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीने के लिए एक सुरक्षित घर हो।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।