विश्व डाक दिवस : चिट्ठियों की आत्मीयता से डिजिटल युग तक संचार की ऐतिहासिक यात्रा

मानव सभ्यता का इतिहास केवल विकास और परिवर्तन का इतिहास नहीं, बल्कि संवाद और संपर्क की निरंतर यात्रा भी रहा है। जब मनुष्य ने अपनी बात दूर बैठे स्वजनों, मित्रों और प्रशासन तक पहुंचाने की आवश्यकता महसूस की, तभी संदेशों के आदान-प्रदान के विभिन्न माध्यमों का विकास शुरू हुआ। दूतों और संदेशवाहकों से लेकर कबूतरों के जरिए संदेश भेजने तक की परंपरा आगे चलकर संगठित डाक व्यवस्था में विकसित हुई। अक्षर से शब्द और शब्द से संदेश तक की यह यात्रा मानव सभ्यता के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की महत्वपूर्ण कहानी कहती है। हर वर्ष 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस (World Post Day) मनाया जाता है। यह दिवस केवल चिट्ठियों और डाक टिकटों की स्मृतियों को संजोने का अवसर नहीं, बल्कि उस वैश्विक संचार व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करता है, जिसने भौगोलिक दूरियों को कम करने, समाजों को जोड़ने और देशों के बीच संपर्क को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 9 अक्टूबर 1874 को स्विट्जरलैंड के बर्न में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (UPU) की स्थापना के लिए संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। बाद में 1969 में टोक्यो में आयोजित UPU कांग्रेस ने 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।

बदलते समय के साथ डाक का नया स्वरूप

कभी एक चिट्ठी किसी परिवार के लिए खुशी, प्रतीक्षा, प्रेम या कुशल-क्षेम का संदेश लेकर आती थी। आज ई-मेल, मोबाइल और इंटरनेट ने संवाद को लगभग तात्कालिक बना दिया है, लेकिन डाक व्यवस्था की भूमिका समाप्त नहीं हुई। उसने समय के साथ अपना स्वरूप बदला है। पत्रों से आगे बढ़कर पार्सल, ई-कॉमर्स, वित्तीय सेवाओं, बीमा, सरकारी सुविधाओं और अंतिम छोर तक वितरण की व्यापक व्यवस्था इसका हिस्सा बन चुकी है। इस दृष्टि से विश्व डाक दिवस परंपरा, तकनीकी परिवर्तन, सामाजिक विश्वास और मानवीय संपर्क की उस निरंतर यात्रा का उत्सव है, जिसमें माध्यम बदलते रहे, लेकिन मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की आवश्यकता हमेशा बनी रही।

प्राचीन सभ्यताओं से शुरू हुई संदेशों की यात्रा

डाक व्यवस्था का इतिहास आधुनिक डाकघरों से कहीं पुराना है। जब संगठित राज्य और साम्राज्य अस्तित्व में आए, तब शासकों के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से सूचना प्राप्त करना और वहां आदेश पहुंचाना आवश्यक हो गया। यही आवश्यकता संगठित संदेश व्यवस्था की आधारभूमि बनी। प्राचीन मिस्र, चीन, फारस और रोम जैसी सभ्यताओं में विभिन्न रूपों में संदेश पहुंचाने की व्यवस्थाएं विकसित हुईं। फारसी साम्राज्य में घुड़सवार संदेशवाहकों के माध्यम से राजकीय संदेशों को तेजी से पहुंचाने की व्यवस्था उल्लेखनीय थी। रोमन साम्राज्य में Cursus Publicus नामक राजकीय संदेश प्रणाली प्रशासन और सैन्य संचार का महत्वपूर्ण माध्यम थी। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य आज की तरह सामान्य नागरिकों के पत्र पहुंचाना नहीं था। उनका प्रमुख उद्देश्य शासन, सेना, कर व्यवस्था और प्रशासन से संबंधित सूचनाओं का आदान-प्रदान था। फिर भी इन्हीं व्यवस्थाओं ने संगठित डाक तंत्र के विकास की आधारभूमि तैयार की।

भारत में संदेश और दूत परंपरा

भारत में संदेश पहुंचाने की परंपरा भी अत्यंत प्राचीन रही है। भारतीय साहित्य और धार्मिक ग्रंथों में दूत की अवधारणा अनेक रूपों में दिखाई देती है। संदेश लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने वाले दूत केवल सूचना के वाहक नहीं थे, बल्कि वे राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। प्राचीन भारतीय राज्य व्यवस्था में शासन के विभिन्न अंगों के बीच सूचना का आदान-प्रदान आवश्यक था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में प्रशासन, गुप्तचर और सूचना तंत्र का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य संचालन में सूचना की गति और विश्वसनीयता को महत्वपूर्ण माना जाता था। समय के साथ दूत व्यवस्था अधिक संगठित होती गई। राजकीय आदेशों, सैन्य सूचनाओं और प्रशासनिक संदेशों को निर्धारित मार्गों से भेजने की व्यवस्था विकसित हुई। इस प्रकार भारत में आधुनिक डाक व्यवस्था आने से बहुत पहले ही संदेश संचार की एक मजबूत परंपरा मौजूद थी।

शेरशाह सूरी से मुगल काल तक डाक चौकियों का विकास

मध्यकालीन भारत में संचार व्यवस्था को संगठित स्वरूप देने में शेरशाह सूरी का विशेष महत्व माना जाता है। उनके शासनकाल में सड़कों, सरायों और डाक चौकियों के विकास ने प्रशासनिक संचार को गति दी। विशेष रूप से लंबी दूरी के मार्गों पर संदेश वाहकों के लिए सुविधाएं विकसित की गईं। ग्रैंड ट्रंक रोड का विकास केवल व्यापार और यातायात के लिए महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि उसने संचार व्यवस्था को भी मजबूत आधार दिया। रास्तों में सराय और डाक चौकियां स्थापित होने से संदेशों को एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक पहुंचाना आसान हुआ। मुगल काल में भी डाक-चौकियों और संदेशवाहकों की व्यवस्था का विस्तार हुआ। साम्राज्य का आकार बड़ा होने के कारण राजधानी और प्रांतीय प्रशासन के बीच नियमित सूचना का आदान-प्रदान आवश्यक था। डाक व्यवस्था शासन की आंख और कान की तरह काम करती थी। इससे पता चलता है कि संचार व्यवस्था किसी भी विशाल राज्य की प्रशासनिक क्षमता का महत्वपूर्ण आधार होती है।

आधुनिक भारतीय डाक व्यवस्था की नींव

भारत में आधुनिक डाक प्रणाली के विकास में ब्रिटिश शासन का महत्वपूर्ण चरण रहा। ईस्ट इंडिया कंपनी के समय डाक सेवाओं का उपयोग मुख्यतः प्रशासनिक और सरकारी उद्देश्यों के लिए किया जाता था। धीरे-धीरे इस व्यवस्था को अधिक संगठित और व्यापक स्वरूप दिया गया। 19वीं शताब्दी में भारत की डाक व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार हुए। 1854 में डाक व्यवस्था के व्यापक सुधारों ने आधुनिक भारतीय डाक प्रणाली की आधारभूमि मजबूत की। समान डाक दर और डाक टिकट के इस्तेमाल से पत्र भेजना अधिक व्यवस्थित और आम लोगों के लिए सुलभ हुआ। भारतीय डाक के इतिहास में सिंध डाक (Scinde Dawk) का विशेष स्थान है, जिसे 1852 में जारी किया गया था। इसके बाद 1854 में अखिल भारतीय स्तर पर डाक टिकट जारी किए गए। डाक टिकट ने केवल पत्र भेजने की प्रक्रिया को आसान नहीं बनाया, बल्कि आगे चलकर यह इतिहास, कला और संस्कृति के संरक्षण का माध्यम भी बन गया।

डाक टिकट : छोटे कागज पर दर्ज बड़ा इतिहास

डाक टिकटों का इतिहास अपने आप में शोध का महत्वपूर्ण विषय है। आकार में छोटे ये टिकट किसी देश की राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्मृतियों को अपने भीतर समेटे रहते हैं। भारत में विभिन्न कालखंडों में जारी डाक टिकटों पर स्वतंत्रता सेनानियों, महापुरुषों, वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, कलाकारों, खिलाड़ियों, ऐतिहासिक स्मारकों और सांस्कृतिक परंपराओं को स्थान मिला है। इस दृष्टि से डाक टिकट केवल डाक शुल्क का प्रमाण नहीं, बल्कि लघु ऐतिहासिक दस्तावेज भी हैं। फिलाटेली यानी डाक टिकट संग्रह ने इतिहास, कला और समाज के अध्ययन में एक अलग क्षेत्र विकसित किया। किसी समय जारी किए गए टिकट उस दौर की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, सांस्कृतिक दृष्टि और सामाजिक स्मृति की झलक दे सकते हैं।

डाकिया : सूचना का वाहक और संवेदना का साथी

भारत के सामाजिक जीवन में डाकिए की भूमिका केवल पत्र पहुंचाने तक सीमित नहीं रही। खासकर ग्रामीण भारत में डाकिया लंबे समय तक सरकारी व्यवस्था और आम नागरिक के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा है। किसी गांव में डाकिए का आना अक्सर किसी खबर के आने का संकेत होता था। उसके थैले में किसी युवक की नौकरी का पत्र हो सकता था, किसी की बेटी के विवाह का निमंत्रण हो सकता था, किसी सैनिक का कुशल-क्षेम हो सकता था या किसी परिवार के लिए आर्थिक सहायता का मनीऑर्डर। इसलिए डाकिया केवल संदेशवाहक नहीं, बल्कि लोगों की आशाओं और भावनाओं का वाहक बन गया। भारतीय साहित्य और सिनेमा में भी डाकिए की यह छवि बार-बार दिखाई देती है। डाकिए के माध्यम से चिट्ठी का भावनात्मक संसार भारतीय जनजीवन का हिस्सा बना।

चिट्ठियां : निजी संवाद से सामाजिक इतिहास तक

चिट्ठियां केवल दो व्यक्तियों के बीच संवाद नहीं होतीं। समय बीतने के बाद वे इतिहास की महत्वपूर्ण सामग्री बन जाती हैं। किसी व्यक्ति के लिखे पत्र से उस समय के सामाजिक जीवन, पारिवारिक संबंधों, राजनीतिक परिस्थितियों और व्यक्तिगत विचारों के बारे में जानकारी मिल सकती है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं के पत्राचार ने राजनीतिक विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के पत्र आज इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं। पत्रों में औपचारिक इतिहास से अलग जीवन का मानवीय पक्ष दिखाई देता है। इनमें भय, आशा, प्रेम, संघर्ष, चिंता, उत्साह और भविष्य के सपने दर्ज होते हैं। इसीलिए पत्र साहित्य और निजी पत्राचार इतिहासकारों के लिए मूल्यवान स्रोत हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन और संचार व्यवस्था

ब्रिटिश शासन में डाक और संचार व्यवस्था प्रशासन के नियंत्रण का महत्वपूर्ण साधन थी। लेकिन दूसरी ओर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रों और संदेशों का उपयोग विचारों तथा सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए भी हुआ। स्वतंत्रता सेनानियों को एक-दूसरे तक राजनीतिक विचार और संगठनात्मक सूचनाएं पहुंचानी होती थीं। कई बार प्रत्यक्ष संपर्क संभव नहीं होता था, ऐसे में पत्र और अन्य संदेश माध्यम महत्वपूर्ण बन जाते थे। इस प्रकार डाक व्यवस्था का इतिहास केवल प्रशासन का इतिहास नहीं है। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन की कहानी से भी जुड़ा हुआ है।

तार ने बढ़ाई संचार की गति

डाक के बाद संचार जगत में एक बड़ी क्रांति तार सेवा के रूप में आई। जहां पत्र को पहुंचने में कई दिन लग सकते थे, वहीं तार के माध्यम से अपेक्षाकृत कम समय में संदेश पहुंचाया जा सकता था। सरकारी आदेश, व्यावसायिक संदेश, युद्ध संबंधी सूचना और आपातकालीन समाचारों के लिए तार अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम बन गया। भारतीय समाज में तार का नाम लंबे समय तक गंभीर और महत्वपूर्ण समाचारों से जुड़ा रहा। बाद में टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन और फिर इंटरनेट के आने से तार व्यवस्था का महत्व धीरे-धीरे कम हुआ। यह परिवर्तन इस बात का उदाहरण है कि तकनीकी विकास संचार के माध्यमों को लगातार बदलता रहता है।

स्वतंत्र भारत में डाक का विस्तार

आजादी के बाद भारतीय डाक व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी देश के विशाल और विविध भूगोल को एक विश्वसनीय संचार नेटवर्क से जोड़ना। शहरों से निकलकर डाक व्यवस्था गांवों, पहाड़ी क्षेत्रों, सीमावर्ती इलाकों और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंची। डाकघर धीरे-धीरे केवल पत्र और पार्सल भेजने का स्थान नहीं रहा। बचत योजनाओं, मनीऑर्डर, बीमा, पेंशन और अन्य वित्तीय सेवाओं के माध्यम से उसने नागरिक जीवन में व्यापक भूमिका निभाई। विशेषकर ग्रामीण और कम बैंकिंग सुविधा वाले क्षेत्रों में डाकघर ने वित्तीय समावेशन की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यही कारण है कि भारतीय डाक को केवल संचार व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सेवा नेटवर्क के रूप में भी देखा जाता है।

वित्तीय समावेशन से डिजिटल बैंकिंग तक

समय के साथ डाक विभाग ने वित्तीय सेवाओं को भी अपने नेटवर्क का हिस्सा बनाया। पोस्ट ऑफिस सेविंग्स बैंक, डाक जीवन बीमा और ग्रामीण डाक जीवन बीमा जैसी सेवाओं ने छोटे बचतकर्ताओं और ग्रामीण परिवारों को वित्तीय सुरक्षा से जोड़ा। डिजिटल युग में इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक जैसी पहल ने डाक नेटवर्क को आधुनिक वित्तीय सेवाओं से जोड़ा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि डाक व्यवस्था ने तकनीकी परिवर्तन को चुनौती के रूप में देखने के बजाय उसे अपनी सेवाओं के विस्तार का माध्यम बनाया है।

ई-कॉमर्स ने बदली डाक की भूमिका

इंटरनेट और ई-कॉमर्स के विस्तार ने पारंपरिक डाक व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां जरूर पैदा कीं, लेकिन इसी बदलाव ने उसके लिए नए अवसर भी पैदा किए। आज लोगों को केवल पत्र नहीं, बल्कि किताबें, कपड़े, दस्तावेज, दवाइयां और अन्य सामान भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजना होता है। इस कारण पार्सल और लॉजिस्टिक्स डाक व्यवस्था की नई पहचान बन रहे हैं। छोटे व्यापारियों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए डाक नेटवर्क उन्हें बड़े बाजारों से जोड़ने में सहायक हो सकता है। इस तरह डाक व्यवस्था डिजिटल अर्थव्यवस्था के भौतिक आधारभूत ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है।

डिजिटल क्रांति के बीच डाक की प्रासंगिकता

आज ई-मेल और मोबाइल संदेश ने व्यक्तिगत पत्रों की संख्या कम कर दी है। कुछ सेकंड में संदेश भेजना संभव है। फिर भी डाक की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। कानूनी दस्तावेज, प्रमाणपत्र, आधिकारिक पत्र, पार्सल और अनेक भौतिक वस्तुएं अभी भी विश्वसनीय वितरण नेटवर्क की मांग करती हैं। इंटरनेट संदेश को पहुंचा सकता है, लेकिन हर वस्तु को नहीं। यही वह क्षेत्र है जहां डाक व्यवस्था की भौतिक क्षमता आज भी महत्वपूर्ण है। इसलिए डिजिटल क्रांति ने डाक को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके स्वरूप को बदल दिया है। पत्रों की जगह पार्सल और डिजिटल सेवाओं ने उसकी भूमिका का विस्तार किया है।

आपदा और संकट के समय डाक नेटवर्क

प्राकृतिक आपदा, महामारी या अन्य संकट की स्थिति में संचार और वितरण नेटवर्क की विश्वसनीयता का महत्व बढ़ जाता है। बाढ़, भूकंप, चक्रवात या दूरदराज के क्षेत्रों में सामान्य परिवहन व्यवस्था प्रभावित होने पर मजबूत अंतिम-मील नेटवर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत जैसे विशाल और भौगोलिक विविधता वाले देश में डाक नेटवर्क की व्यापक पहुंच इस दृष्टि से विशेष महत्व रखती है। भविष्य में आपदा प्रबंधन और आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति में डाक तंत्र की भूमिका को और व्यवस्थित किया जा सकता है।

पर्यावरण के संदर्भ में बदलती डाक व्यवस्था

डिजिटल संदेशों के विस्तार से कागज की खपत में कमी आई है, लेकिन ई-कॉमर्स ने पैकेजिंग और परिवहन से जुड़ी नई पर्यावरणीय चुनौतियां पैदा की हैं। इसलिए भविष्य की डाक व्यवस्था को केवल तेज और सस्ती ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी बनाना होगा। हरित परिवहन, ऊर्जा दक्षता, इलेक्ट्रिक वाहनों, टिकाऊ पैकेजिंग और कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसी पहल डाक क्षेत्र को अधिक टिकाऊ बना सकती हैं। आधुनिक डाक व्यवस्था के लिए पर्यावरण संरक्षण अब केवल अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डाक का भविष्य

तकनीक अब डाक व्यवस्था के लगभग हर स्तर को प्रभावित कर रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालित सॉर्टिंग, डिजिटल ट्रैकिंग, डेटा विश्लेषण और मार्ग अनुकूलन जैसी तकनीकें डाक वितरण को अधिक तेज और कुशल बना सकती हैं। भविष्य में ड्रोन, स्मार्ट लॉजिस्टिक्स और स्वचालित प्रणालियां भी विशेष परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती हैं। हालांकि तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद डाक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका मानवीय और सामाजिक नेटवर्क ही रहेगा।

चिट्ठी की आत्मीयता कभी पुरानी नहीं होगी

डिजिटल संदेशों की दुनिया में हस्तलिखित पत्र का महत्व एक अलग रूप में बढ़ा है। मोबाइल संदेश तत्काल पढ़े और भुलाए जा सकते हैं, लेकिन हाथ से लिखा पत्र अपने भीतर व्यक्ति की लिखावट, भावनाओं और समय की स्मृति को सुरक्षित रखता है। किसी पुराने संदूक में मिली वर्षों पुरानी चिट्ठी अचानक बीते समय को वर्तमान में ले आती है। उसमें शब्दों के साथ व्यक्ति की आवाज, उसका स्नेह और उसकी उपस्थिति महसूस होती है। यही कारण है कि डिजिटल क्रांति के बावजूद चिट्ठी का भावनात्मक आकर्षण समाप्त नहीं हुआ।

विश्व डाक दिवस का व्यापक संदेश

विश्व डाक दिवस हमें केवल डाक सेवा की उपलब्धियों को याद करने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह समझने का अवसर भी देता है कि मानव समाज ने दूरी और समय की बाधाओं को पार करने के लिए कितने प्रयास किए हैं। दूत से डाकिया, डाकिया से तार, तार से टेलीफोन, टेलीफोन से इंटरनेट और इंटरनेट से कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित संचार तक की यात्रा वास्तव में मानव बुद्धि और उसकी संवाद की अनवरत इच्छा की यात्रा है। आज दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, लेकिन हर डिजिटल संदेश के पीछे भी किसी न किसी रूप में भौतिक नेटवर्क, ऊर्जा, उपकरण और मानव श्रम मौजूद है। डाक व्यवस्था इसी भौतिक संसार को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है।

दूरियों को पाटती डाक की अनवरत यात्रा

विश्व डाक दिवस मानव सभ्यता की उस लंबी यात्रा का उत्सव है, जिसमें दूरियों को कम करने और मनुष्यों को जोड़ने की निरंतर कोशिश दिखाई देती है। कभी संदेश घोड़े पर सवार दूत लेकर जाता था, फिर संदेशवाहकों और डाकियों ने इस जिम्मेदारी को संभाला। डाक टिकट और डाकघरों ने इसे संस्थागत स्वरूप दिया। तार ने संचार की गति बढ़ाई और आधुनिक डिजिटल तकनीक ने संदेश को लगभग तात्कालिक बना दिया। लेकिन माध्यम चाहे कितना भी बदल जाए, संचार की मूल आवश्यकता वही रहती है एक मनुष्य की बात दूसरे मनुष्य तक पहुंचाना। आज भारतीय डाक चिट्ठियों से आगे बढ़कर वित्तीय सेवाओं, बीमा, पार्सल, ई-कॉमर्स और डिजिटल सेवाओं का व्यापक नेटवर्क बन रही है।

डाक की बदलती दुनिया

दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंच, नागरिक सेवाओं की उपलब्धता और अंतिम छोर तक वितरण इसकी सबसे बड़ी शक्तियों में हैं। भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, हरित तकनीक और डिजिटल लॉजिस्टिक्स इसके स्वरूप को और बदलेंगे। फिर भी डाक की सबसे बड़ी विरासत उसकी तकनीक नहीं, बल्कि विश्वास है। एक छोटा-सा लिफाफा कभी किसी परिवार की उम्मीद लेकर चलता था; आज वही नेटवर्क किसी जरूरी दस्तावेज, पार्सल, वित्तीय सेवा या सरकारी सुविधा को नागरिक के दरवाजे तक पहुंचा रहा है। यही उसकी निरंतरता है। इस अर्थ में विश्व डाक दिवस केवल डाक विभाग का दिवस नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, सामाजिक विश्वास, संचार की स्वतंत्रता और सभ्यता को जोड़ने वाली उस अदृश्य डोर का उत्सव है, जिसने सदियों से दुनिया को एक-दूसरे के करीब लाने का काम किया है। चिट्ठियों की आत्मीयता भले ही कम हुई हो, लेकिन मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली डाक की भावना आज भी जीवित है, बस उसका रूप बदल गया है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।