साल 2025 भारत के इतिहास में सचमुच स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो चुका है। इसकी शुरुआत आस्था के महाकुंभ में उमड़े अद्भुत श्रद्धा-सैलाब से हुई, और समापन होते-होते हम सब रामनगरी अयोध्या में धर्मध्वजा के गौरवशाली आरोहण के साक्षी बन गए। महाकुंभ से लौटते समय मेरे भीतर जीवन के कई अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर थे तो एक सवाल भी लेकर लौटा। अध्यात्मिक चेतना की इस अभूतपूर्व जागृति और आस्था के इस महासमागम के बाद ‘गंगापुत्र’ का अगला लक्ष्य क्या होगा?
आज, समय ने इस प्रश्न का जवाब भी दे दिया। यह स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि देश को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अग्रसर करने और हर नागरिक के भीतर सांस्कृतिक-आध्यात्मिक चेतना को पुनर्जीवित करने का जो विराट संकल्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिया है, उसे किसी सीमित राजनीतिक कसौटी से परखा ही नहीं जा सकता। यह अभियान इतना व्यापक, बहुआयामी और दूरगामी नजर आता है कि इसे किसी एक मापदंड में समेटना राष्ट्र के प्रति अन्याय होगा। पीएम मोदी के इस महाअभियान के परिणामस्वरूप एक बड़ा परिवर्तन राष्ट्र की आत्मा में धीरे-धीरे हो रहे उस जागरण में महसूस किया जा सकता है, एक ऐसा जागरण जिसे सिर्फ देखा नहीं बल्कि गहराई से अनुभूत किया जाना चाहिए। अयोध्या में धर्मध्वजारोहण के क्षणों में इस अनुभूति के प्रत्यक्ष साक्षी वे असंख्य श्रद्धालु थे, जिनकी आंखों में आस्था, गर्व और परिवर्तन की चमक एक साथ दिखाई दे रही थी।
रामराज्य की अनुभूति का आधुनिक पुनर्जागरण
अवध के सिंहासन पर राज्याभिषेक के बाद प्रभु श्री राम के शासन को महर्षि वाल्मीकि ने एक ऐसा आदर्श राज्य बताया जहां हर ओर धर्ममय और सुख-समृद्धि का वातारवण है। इसे ही उन्होंने रामराज्य की संज्ञा दी आज उसके सूक्ष्म दर्शन आधुनिक भारत की अयोध्या में हो रहे हैं। त्रेता में अवध के सिंहासन पर राजा राम के राज्याभिषेक के बाद ‘यथा राजा तथा प्रजा’ का जो भाव जागृत हुआ वही विश्वास आज अयोध्या में देखने को मिला। देश के मौजूदा नेतृत्व और जनता के बीच एक अदृश्य लेकिन दृढ़ सेतु दिखता है। देश के प्रधानमंत्री धर्म ध्वजा फहराते हुए भावुक होते हैं तो असंख्य लोग सदियों पुराने वैभव के लौटने के क्षण के साक्षी होने पर खुद को धन्य महसूस करते हैं। उनकी आखों में राजा राम के आदर्शों पर चलने वाले देश का नागरिक होने का गर्व और ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ पूरी करने वाले मोदी के प्रति अटूट विश्वास साफ नजर आता है।
गुप्तार घाट से लेकर जानकी घाट तक जो देखा
गुप्तार घाट से लेकर जानकी घाट तक श्रद्धालुओं के चेहरे पर संतुष्टि का जो भाव नजर आता है उसे शब्दो में बयां करना मुश्किल है। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ता गया राजा राम की नगरी में देश भर से आए तमाम लोगों के मन में देश के प्रधानमंत्री के प्रति एक गजब का विश्वास और सम्मान देखने को मिल रहा था। मैंने कई लोगों से बात की उनमें से कोई आंध्र प्रदेश से आया था तो कोई कश्मीर से। कोई मध्य प्रदेश से था तो कोई राजस्थान, बिहार और बंगाल से। इन सभी लोगों से एक कॉमन सवाल मेरा यह था कि आप लोग इससे पहले कब यहां आए और नहीं आए तो कबसे आने का इंतजार कर रहे थे? जवाबों में जो एक समान स्वर उभरकर आया वह सदियों की प्रतीक्षा के बाद पूर्ण हुई आकांक्षा की वह गहरी, शांत संतुष्टि थी जिसे शब्दों में पिरो पाना कठिन है।
ये है पीएम मोदी के प्रयासों का असल असर
देश में आध्यात्मिक चेतना की जागृति के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों का असर अगर जानना है तो अयोध्या की गलियों में दो दिन घूम लीजिए और यहां आए हुए श्रद्धालुओं से बात कर लीजिए। राजस्थान के जयपुर से आईं 70 वर्षीय पुष्पा देवी ने जो कहा वाकई किसी भी इंसान की सबसे बड़ी कमाई है। पुष्पा देवी यहां अपने दो बेटों के साथ बीते 4 दिनों से आई हुई हैं। जैसे ही पुष्पा देवी को रामनगरी में धर्म ध्वजारोहण कार्यक्रम की जानकारी हुई उन्होंने विदेश में रहने वाले दोनों बेटों से इस पल का साक्षी बनने की मनोकामना बताई। बिना देर किए दोनों बेटे सात संदर पार से यहां आ गए और अपनी मां को मर्यादा पुरुषोत्तम के धाम के दर्शन करा रहे हैं।
इस अहसास के बारे में बात करते हुए पुष्पा देवी की आंखें भर आईं। सियाराम के अलावा उनकी जुबान पर अगर कोई नाम था तो सिर्फ ‘मोदी’। वे इस क्षण का साक्षी बनने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को आशीर्वाद देते नहीं थक रही थीं। प्रधानमंत्री मोदी को कलियुग का श्रवण कुमार बताते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि भारत को अब ‘विश्वगुरु’ बनने से कोई नहीं रोक सकता।
प्रधानमंत्री मोदी के प्रति अटूट विश्वास
इसके बाद सरयू नदी के किनारे जब राम घाट पर विश्वास की ऐसी डोर दिखी जिसे तोड़ पाना इस दौर में किसी के वश में नहीं। उत्तर प्रदेश के आगरा से पहुंचे नानकराम जी और सुमित्रा देवी जी यहां धार्मिक अनुष्ठान कर रहे थे। अनुष्ठान के दौरान उन्होंने अपने साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर रख रखी थी। मैंने उनकी पूजा खत्म होने तक इंतजार किया उसके बाद पूछा कि ये तस्वीर क्यों। उनका जवाब इस देश के असंख्य लोगों के विश्वास की डोर कितनी मजबूत है इस बात की तस्दीक कर गया। सुमित्रा जी कहती हैं कि इनके बिना आज यहां हमारी पूजा संपन्न कैसे हो सकती है। धर्म ध्वजा फहराने वाले मोदी ने हमें हमारे राम से मिला दिया।
स्वर्गद्वार से लेकर भूत वाली गली तक अयोध्या आज उस आध्यात्मिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुकी है जिसकी तैयारी वर्षों से चली आ रही है। पीएम मोदी के नेतृत्व में सांस्कृतिक स्वाभिमान पुनर्जीवित करने की यह यात्रा अभी थमी नहीं है। दिल्ली में बैठ कर आलोचना और राजनीतिक टिप्पणी करने वालों को ‘गंगापुत्र’ की भीष्म प्रतिज्ञा पूर्ण होने का प्रतिफल जानना है तो एक बार राजनीतिक विद्वेश को खूंटी पर टांग कर अयोध्या की गलियों में घूमना चाहिए। घाटों पर विचरण करना चाहिए, इसके बाद उन्हें तमाम सवालों का जवाब मिल जाएगा।
राम मंदिर के साथ-साथ निर्णायक फैसलों ने बदली तस्वीर
अयोध्या के विषय में जब बात हो तो यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी सरकार ने केवल मंदिर निर्माण तक खुद को सीमित नहीं रखा। बीते दशक में ऐसे कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए, जिन्होंने भारत की राष्ट्रीय अस्मिता को नई धार दी है। अनुच्छेद 370 हटाना, एक झटके में देश की अखंडता को मजबूत करने का वह कदम था जिसका इंतजार तीन पीढ़ियों ने किया था। तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने से करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को वह स्वतंत्रता मिली जिसे दशकों तक सामाजिक-राजनीतिक जाल में जकड़ दिया गया था। सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के माध्यम से पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत ने सुरक्षित आश्रय दिया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ते हुए मैकाले मॉडल के प्रति सोच-समझकर खड़ी की गई निर्भरता को तोड़ा।
अयोध्या का पुनर्जीवन भी इसी व्यापक राष्ट्र-निर्माण दृष्टि का एक हिस्सा है। मंदिर निर्माण के साथ-साथ जिस प्रकार पूरी रामनगरी में इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हुआ। अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा, चौड़ी फोर-लेन सड़कें, नदी तट का सौंदर्यीकरण, दर्शनीय स्थलों का संरक्षण यह दिखाता है कि यह सरकार भूत, वर्तमान और भविष्य को एक धुरी से जोड़कर देख रही है। परिणामस्वरुप विकास मॉडल की जो पुनर्स्थापना हो रही है उसकी गूंज आने वाले दशकों तक सुनाई देगी।
रामनगरी में पर्यटन व्यवसाय को मिले पंख और बढ़ते रोज़गार
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद पर्यटन की तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था स्थानीय लोगों का जीवन बदल रही है। एक शहर जो कभी पौराणिक स्मृतियों के आधार पर पहचाना जाता था, आज वैश्विक धार्मिक पर्यटन का केंद्र बन चुका है। राम मंदिर निर्माण ने अयोध्या को प्रगति के वही पंख दिए हैं जो काशी कॉरिडोर ने वाराणसी को दिए। हजारों होटल, होम-स्टे, धर्मशालाएं, रेस्टोरेंट, परिवहन सेवाएं और टूर गाइडिंग का नेटवर्क दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। पहले जहां केवल स्थानीय यात्रियों का प्रवाह था, वहीं अब भारत के हर कोने से और विदेशों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। इससे स्थानीय नौकरियों और सूक्ष्म-व्यवसायों में बढ़ोतरी हुई है।
रिक्शा चालक से लेकर टैक्सी ऑपरेटर तक, फूल बेचने वाली महिला से लेकर हस्तशिल्पियों तक, सभी की आय बढ़ी है। राम कथा, श्रीरामचरितमानस और अवध संस्कृति पर आधारित नई गाइडिंग इंडस्ट्री ने पढ़े-लिखे युवाओं के लिए भी नए अवसर खोले हैं। उद्योग जगत का अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में अयोध्या भारत के शीर्ष धार्मिक-पर्यटन शहरों में शामिल हो जाएगा जो हर महीने लाखों आगंतुकों को आकर्षित करेगा। इससे न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे भारत की अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा योगदान होगा। अयोध्या अब केवल तीर्थ नहीं बल्कि रोजगार-सृजन और संस्कृति आधारित अर्थव्यवस्था का मॉडल बन चुका है।
आध्यात्मिक चेतना की जागृति और आत्मनिर्भर भारत का संकल्प
एक राष्ट्र केवल नीतियों से आत्मनिर्भर नहीं बनता, आत्मनिर्भरता की असली शुरुआत मन की स्वतंत्रता से होती है। राम मंदिर निर्माण ने भारतीय समाज में यह गहरी अनुभूति जगाई है कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास ही आर्थिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की आधारशिला है। भारत की सभ्यता सदियों से आध्यात्मिकता पर टिकी रही हैं। स्वयं के भीतर झांकने, अपनी ऊर्जा को पहचानने और उसके आधार पर राष्ट्र-निर्माण का मार्ग चुनने की परंपरा है हमारी। यह चेतना लंबे समय तक औपनिवेशिक सोच, नकली आधुनिकता और सांस्कृतिक भ्रम के बीच कमजोर होती गई लेकिन आज राम मंदिर पर फहराती धर्म ध्वजा राष्ट्र के आत्मविश्वास के पुनर्जागरण की गवाही दे रही है।
यही चेतना ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को सामाजिक स्वीकृति और नैतिक ऊर्जा देती है। आध्यात्मिक जागरण ने युवा पीढ़ी को यह विश्वास दिया है कि भारत केवल आयातित विचारों पर निर्भर रहने वाला देश नहीं है बल्कि यह अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिकता की नई परिभाषा गढ़ सकता है। यही दृष्टि विज्ञान, तकनीक, स्टार्टअप और रक्षा क्षेत्र में भी दिखाई दे रही है, जहां हर उपलब्धि के पीछे आत्मसम्मान की ऊर्जा साफ झलकती है।
-(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है। वर्तमान में वे प्रसार भारती न्यूज सर्विस के साथ जुड़े हैं।)


