केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने शुक्रवार को जोर देते हुए कहा कि वन प्रबंधन को असल में असरदार बनाने के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान काफी नहीं है। क्षेत्र की जरूरतों, स्थानीय परिस्थितियों और जमीनी हकीकत के मुताबिक क्षमता निर्माण करना होगा। उन्होंने साफ कहा कि प्रशिक्षण में स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नई तकनीकों के साथ जोड़ना बेहद जरूरी है।
जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) के सहयोग से आयोजित ‘कैपेसिटी एन्हांसमेंट फॉर इफेक्टिव फॉरेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट’ की कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने वन क्षेत्र की अहमियत पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि वन न सिर्फ जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मददगार हैं, बल्कि जैव विविधता बचाने और वन पर निर्भर समुदायों की आजीविका के लिए भी आधार स्तंभ हैं। इसलिए अग्रिम पंक्ति के वनकर्मियों की परिचालन और प्रशासनिक क्षमताओं को मजबूत करना समय की मांग है।
वनाग्नि प्रबंधन वैश्विक चुनौती, क्षमता निर्माण क्लासरूम तक सीमित न रहे
भूपेंद्र यादव ने चेतावनी दी कि वनाग्नि प्रबंधन अब वैश्विक स्तर की समस्या बन चुका है। इस परियोजना के जरिए वनाग्नि नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु कार्रवाई में तकनीकी व जमीनी दोनों क्षमताओं को बढ़ाया जा सकेगा। उन्होंने जोर दिया कि क्षमता निर्माण सिर्फ कक्षाओं तक न सिमटे। आधुनिक तकनीकें और जमीनी स्तर की सफल कार्यप्रणालियां भी प्रशिक्षण का हिस्सा बनें। मंत्री ने क्षेत्र-विशेष के लिए अलग-अलग क्षमता निर्माण मॉड्यूल तैयार करने की बात कही। इन मॉड्यूल में स्थानीय ज्ञान और क्षेत्रीय चुनौतियों को जगह दी जाएगी। परियोजना के तहत अनुसंधान एवं विकास, पायलट प्रोजेक्ट्स और प्रशिक्षण संस्थानों को मजबूत करने जैसे कदम उठाए जाएंगे। साथ ही सार्क देशों और अन्य विकासशील राष्ट्रों के साथ बेहतर तरीकों को साझा करने पर भी फोकस रहेगा।
JICA का तीन दशक पुराना सहयोग, सात लाख से ज्यादा लोगों को मिला फायदा
JICA इंडिया के वरिष्ठ प्रतिनिधि ईजी वाकामात्सु ने कहा कि यह परियोजना भारतीय और जापानी शोध संस्थानों को एक मंच पर लाएगी। इससे वन प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और क्षमता निर्माण जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान निकलेंगे। उन्होंने याद दिलाया कि वन क्षेत्र में JICA की भारत के साथ साझेदारी करीब तीन दशक पुरानी है, जिससे सात लाख से अधिक लोगों को लाभ पहुंचा है। परियोजना के दूसरे चरण में लकड़ी के बेहतर उपयोग, आजीविका सृजन, डिजिटल तकनीक से वन प्रबंधन सुधार और संयुक्त अकादमिक अनुसंधान पर खास ध्यान दिया जाएगा।
सात साल की परियोजना, 537 करोड़ का बजट
यह सात साल की परियोजना 2025-26 से 2031-32 तक चलेगी। कुल बजट 537.10 करोड़ रुपये है, जिसमें JICA का हिस्सा 440.42 करोड़ और भारत सरकार का 96.68 करोड़ रुपये है। देश के सभी राज्यों को इसमें शामिल किया जाएगा। नए राज्यों को प्राथमिकता देते हुए पहले चरण वाले राज्यों को भी सहयोग जारी रहेगा। कार्यशाला के दौरान परियोजना की रूपरेखा वाली पुस्तिका भी जारी की गई। तकनीकी सत्र में मंत्रालय, JICA प्रतिनिधियों, राज्यों, शोध संस्थानों और केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों के बीच विस्तृत संवाद हुआ। (इनपुट-एचएस)


