भारत को 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य पूरा करने के लिए 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की ज़रूरत होगी। इसके लिए सरकार ऐसे वित्तीय व्यवस्था बना रही है, जिसमें सरकार का पैसा लगाकर निजी निवेश को सुरक्षित और तेज़ किया जा सके। यह निवेश सौर और पवन ऊर्जा, ऊर्जा बचत तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, कचरे से ऊर्जा बनाने और प्रकृति-आधारित समाधानों में किया जाएगा। यह जानकारी केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने गुरुवार को दी।
वे FICCI LEADS 2025 सम्मेलन में ग्रीन फाइनेंसिंग विषय पर बोल रहे थे। यादव ने कहा कि 21वीं सदी में भारत जैसे देशों की दो बड़ी ज़िम्मेदारी है—पहली, युवाओं की विकास की उम्मीदों को पूरा करना और दूसरी, धरती को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय नुकसान से बचाना।
मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ऐसा रास्ता चुना है जो महत्वाकांक्षा, नवाचार और बदलाव से भरा है। उन्होंने उद्योग जगत की सराहना की कि वह आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन पर भी ध्यान दे रहा है।
यादव ने कहा कि पिछले दो सौ सालों में उद्योगों की तेज़ी से बढ़ोतरी ने पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाया है। बढ़ता वैश्विक तापमान (1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस) केवल विज्ञान का आंकड़ा नहीं है, बल्कि असंतुलित विकास का नतीजा है।
उन्होंने बताया कि ग्रीन फाइनेंस को अब छोटे प्रयास की तरह नहीं, बल्कि मज़बूत और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी की तरह देखा जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि पैसा इस तरह से लगाया जाए कि हर निवेश से न सिर्फ़ आर्थिक फायदा हो, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।
यादव ने कहा कि भारत में ग्रीन निवेश बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। ग्रीन बॉन्ड्स जारी किए गए हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।
इसके अलावा, आरबीआई और सेबी जैसे संस्थान यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ग्रीन प्रोजेक्ट्स में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।
उन्होंने सरकार के ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम का भी ज़िक्र किया, जिसे 2023 में शुरू किया गया था। इस योजना का मकसद लोगों और संस्थाओं को पर्यावरण के लिए अच्छे काम करने के लिए प्रोत्साहित करना है, जैसे पेड़ लगाना या खराब हो चुकी जमीन को फिर से उपयोगी बनाना।
मंत्री ने कहा कि ग्रीन फाइनेंसिंग ऐसी होनी चाहिए जिससे छोटे उद्योग, किसान और गरीब वर्ग भी फायदा उठा सकें।
––आईएएनएस


