भारत ने रवांडा और पूर्व यूगोस्लाविया के अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनलों के अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए स्थापित संयुक्त राष्ट्र तंत्र का समर्थन किया है। भारत का मानना है कि इससे इन क्षेत्रों में हुए युद्ध अपराधों और नरसंहार के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित होती रहेगी।
पीड़ितों की सुरक्षा और अभिलेखों का संरक्षण जरूरी
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने बुधवार (स्थानीय समय) को महासभा के एक सत्र में ‘इंटरनेशनल रेसिडुअल मैकेनिज्म फॉर क्रिमिनल ट्रिब्यूनल्स’ (IRMCT) पर कहा, “भारत इस बात पर जोर देता है कि यह तंत्र अपने बचे हुए कार्यों को जारी रखे। इनमें पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा, राष्ट्रीय न्यायिक प्रणालियों की मदद तथा ट्रिब्यूनल के अभिलेखों को सुरक्षित रखना और उनका प्रबंधन शामिल है।”
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इन विशेष ट्रिब्यूनलों की विरासत को बचाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ये कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
IRMCT की पृष्ठभूमि और उपलब्धियां
यह तंत्र 2010 में सुरक्षा परिषद द्वारा स्थापित किया गया था, ताकि रवांडा और पूर्व यूगोस्लाविया के लिए बने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनलों के अधूरे काम को पूरा किया जा सके। रवांडा ट्रिब्यूनल ने 1994 के गृहयुद्ध के दौरान तुत्सी समुदाय के नरसंहार के जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलाया था। हुतु चरमपंथियों द्वारा किए गए इस नरसंहार में करीब 8 लाख तुत्सी और कुछ उदारवादी हुतु मारे गए थे। ट्रिब्यूनल ने 86 लोगों को आरोपी बनाया था। यूगोस्लाव ट्रिब्यूनल ने युद्ध अपराधों के मामलों में 111 मुकदमे चलाए और 90 लोगों को दोषी ठहराया। इनमें से एक व्यक्ति की अपील अभी भी IRMCT के पास लंबित है। IRMCT ने ट्रिब्यूनल से कुछ मामले अपने हाथ में लेने के बाद 61 लोगों को दोषी ठहराया है।
न्याय और कुशल बदलाव पर जोर
तिवारी ने कहा, “हम मानते हैं कि यह तंत्र दोषियों को सजा दिलाने और उन्हें बिना सजा के बच निकलने से रोकने की लड़ाई में अहम योगदान देता है। हम इसके जनादेश को न्याय, निष्पक्षता, समानता और उचित कानूनी प्रक्रिया के सिद्धांतों के अनुसार पूरा करने के महत्व को दोहराते हैं। न्याय के हितों को बनाए रखना और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करना बहुत जरूरी है।” उन्होंने आगे कहा कि जैसे-जैसे IRMCT अपने जनादेश को पूरा करने की ओर बढ़ रहा है, एक कुशल, व्यवस्थित और समयबद्ध बदलाव की आवश्यकता है। यह बदलाव ऐसा होना चाहिए जिससे न्यायिक स्वतंत्रता या बची हुई जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभाने में कोई समझौता न हो। भारत का यह रुख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही और न्याय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दोहराता है। (इनपुट-एजेंसी)


