मातृ नवमी : मातृऋण, स्मृति, स्नेह और कृतज्ञता की अनुपम भारतीय परंपरा

“मातृदेवो भव” मां केवल जीवन देने वाली काया नहीं, बल्कि हर सांस में रचा-बसा वह असीम वात्सल्य है, जो देह से विदा होने के बाद भी स्मृति, संस्कार और आशीष बनकर संतान के जीवन-पथ को आलोकित करता रहता है। लोकमान्यता है कि ईश्वर हर जगह उपस्थित नहीं हो सकता, इसलिए उसने मां को सृजा; और जब मां इस भौतिक संसार से विदा लेती है, तो उसकी ममता स्मृतियों में जीवित रहकर संतान के लिए अदृश्य संबल बन जाती है। पितृपक्ष की ‘मातृ नवमी’ इसी अमर मातृ-वात्सल्य के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और भावपूर्ण नमन का अवसर है। भाद्रपद की विदाई के साथ जब आश्विन के पितृपक्ष का आगमन होता है, तब सनातन परंपरा मनुष्य को अपनी जड़ों की ओर लौटने, पूर्वजों को स्मरण करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है। इसी पावन पक्ष की नवमी तिथि ‘मातृ नवमी’ के रूप में मातृ पक्ष की दिवंगत स्त्रियों के श्रद्धापूर्ण स्मरण और श्राद्ध के लिए समर्पित मानी जाती है।

मातृ नवमी महज एक धार्मिक तिथि या कर्मकांड नहीं, बल्कि उस ममता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है, जिसने जीवन की पहली भाषा सिखाई, लड़खड़ाते कदमों को सहारा दिया और विपरीत परिस्थितियों में साहस का संचार किया। भारतीय जीवन-दृष्टि में मां केवल संतान को जन्म देने वाली नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, विचार और संस्कारों को गढ़ने वाली प्रथम गुरु है। उसकी गोद जीवन का पहला विद्यालय और उसका आंचल सुरक्षा का पहला संसार होता है। मातृ नवमी का भाव इसीलिए केवल स्मरण तक सीमित नहीं रहता। यह परिवार को अपनी जड़ों से जोड़ता है और उन जीवन-मूल्यों के प्रति नमन का अवसर देता है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संस्कारों की अमूल्य धरोहर बनकर प्रवाहित होते रहे हैं। मां की स्मृति में किया गया श्राद्ध वस्तुतः उस ऋण को स्वीकार करने का भाव है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं।

मां के अमिट ऋण के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव

आज जब संयुक्त परिवारों का स्वरूप बदल रहा है, जीवन की गति तेज हो रही है और पीढ़ियों के बीच संवाद का दायरा सिमटता जा रहा है, ऐसे समय में मातृ नवमी की प्रासंगिकता और गहरी हो जाती है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि पूर्वजों का सम्मान केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी सच्ची स्मृति तब जीवित रहती है, जब हम उनके संस्कारों को अपने आचरण में उतारें, परिवार में संवेदना को स्थान दें और जीवित मातृशक्ति के प्रति सम्मान, स्नेह और जिम्मेदारी का निर्वहन करें। इस अर्थ में मातृ नवमी अतीत को याद करने भर की परंपरा नहीं, बल्कि स्मृति से संस्कार और संस्कार से जीवन-मूल्य ग्रहण करने की भारतीय चेतना का उज्ज्वल पर्व है। यह मां के उस अमिट ऋण के सामने श्रद्धा से झुकने का अवसर है, जिसका प्रतिदान संभव नहीं, केवल अनुभव और सम्मान किया जा सकता है।

पितृ पक्ष में मातृ नवमी का स्थान

हिंदू परंपरा में पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष काल माना जाता है। इस अवधि में लोग अपने दिवंगत परिजनों का स्मरण करते हैं और उनकी आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण तथा अन्य परंपरागत कर्म करते हैं। सामान्य रूप से पितृपक्ष को पितरों के स्मरण से जोड़ा जाता है, लेकिन इसकी परंपरा में मातृ पक्ष का भी उतना ही महत्वपूर्ण स्थान है। मातृ नवमी इसी व्यापक परंपरा में मातृ-स्मरण का विशेष अवसर है। यह दिन उन माताओं और मातृपक्षीय स्त्रियों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर देता है, जो अब भौतिक रूप से परिवार के बीच उपस्थित नहीं हैं। परिवार की स्मृति में मां की भूमिका इतनी व्यापक होती है कि उनके जाने के बाद भी उनके संस्कार, कहानियां, सीख और स्नेह पीढ़ियों तक बने रहते हैं। इस दृष्टि से मातृ नवमी मृत्यु की स्मृति का दिन मात्र नहीं है। यह उस जीवनदायिनी शक्ति को याद करने का अवसर है, जिसके बिना परिवार, समाज और पीढ़ियों की निरंतरता की कल्पना करना कठिन है।

मातृ ऋण की भारतीय अवधारणा

भारतीय दर्शन में मनुष्य के जीवन को अनेक प्रकार के ऋणों से जुड़ा माना गया है। माता-पिता का ऋण इनमें अत्यंत महत्वपूर्ण है। मां का ऋण इसलिए विशेष है कि वह संतान के जीवन की शुरुआत से ही उसके साथ जुड़ी रहती है। गर्भधारण से लेकर जन्म, पालन-पोषण, शिक्षा और संस्कार तक उसकी भूमिका जीवन के हर चरण में दिखाई देती है। उपनिषदों की परंपरा में “मातृदेवो भव” का संदेश माता के प्रति सर्वोच्च सम्मान की भावना को अभिव्यक्त करता है। यह विचार भारतीय सामाजिक चेतना में इतना गहराई से समाया कि मां को परिवार की भावनात्मक धुरी के रूप में देखा गया। उसके त्याग को केवल घरेलू दायित्व नहीं, बल्कि परिवार और समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान माना गया। मातृ नवमी इसी भाव को स्मरण कराने वाली परंपरा है। इसका संदेश यह है कि मनुष्य अपने वर्तमान को केवल अपने व्यक्तिगत प्रयासों का परिणाम न माने, बल्कि उन लोगों को भी याद करे जिन्होंने उसके अस्तित्व और व्यक्तित्व को आकार देने में योगदान दिया।

श्राद्ध में श्रद्धा का महत्व

‘श्राद्ध’ शब्द का संबंध ‘श्रद्धा’ से माना जाता है। इसका मूल भाव ही विश्वास, सम्मान और कृतज्ञता से जुड़ा है। इसलिए श्राद्ध को केवल कर्मकांड के रूप में देखना इसकी व्यापक सांस्कृतिक भावना को सीमित कर देना होगा। मातृ नवमी पर किए जाने वाले कर्मों का उद्देश्य दिवंगत माता और मातृपक्षीय पूर्वजों का स्मरण करना है। विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में इसकी विधियों में अंतर दिखाई दे सकता है। कहीं तर्पण और पिंडदान को प्रमुखता दी जाती है तो कहीं ब्राह्मण भोजन, दान और पारिवारिक स्मरण की परंपरा अधिक प्रचलित है। इन विविधताओं के बावजूद मूल भावना एक ही रहती है पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता। धार्मिक अनुष्ठानों की सार्थकता भी तभी मानी जा सकती है, जब उनके पीछे का भाव जीवन में दिखाई दे। यदि पूर्वजों का स्मरण केवल एक दिन के कर्मकांड तक सीमित रह जाए और उनके द्वारा दिए गए संस्कार व्यवहार में दिखाई न दें, तो परंपरा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

शास्त्रीय परंपरा और मातृ स्मरण

भारतीय धर्म और साहित्य में पितृकर्म तथा पूर्वजों के स्मरण की परंपरा प्राचीन है। धर्मशास्त्रीय ग्रंथों और पुराणों में श्राद्ध, तर्पण और पितृ-स्मरण से संबंधित अनेक प्रसंग मिलते हैं। गरुड़ पुराण सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में जीवन, मृत्यु और पितृलोक से जुड़े विचारों का विस्तार मिलता है। महाभारत और अन्य भारतीय आख्यानों में भी पूर्वजों के प्रति कर्तव्य तथा परिवार की वंश परंपरा को महत्व दिया गया है। इन परंपराओं के मूल में यह विचार दिखाई देता है कि व्यक्ति अकेला नहीं है। वह अपने पूर्वजों से प्राप्त जीवन, ज्ञान और संस्कार की निरंतरता का हिस्सा है। हालांकि विभिन्न ग्रंथों और क्षेत्रों में श्राद्ध संबंधी विधियों और मान्यताओं में अंतर मिलता है, लेकिन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भाव भारतीय परंपरा में व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। मातृ नवमी इसी व्यापक सांस्कृतिक चेतना का मातृ-केंद्रित रूप है।

मां : परिवार की पहली संस्कार दाता

भारतीय परिवार व्यवस्था में मां की भूमिका बहुआयामी रही है। वह बच्चों की देखभाल करने के साथ-साथ भाषा, व्यवहार, परंपरा और संस्कारों की पहली शिक्षिका भी होती है। बच्चे के जीवन की शुरुआती स्मृतियों में मां का स्वर, स्पर्श, सीख और स्नेह गहराई से जुड़ा रहता है। लोकजीवन में मां से जुड़ी असंख्य कहानियां, लोरियां, लोकगीत और कहावतें इस भावनात्मक संबंध की गहराई को दर्शाती हैं। किसी परिवार के भोजन से लेकर त्योहारों की तैयारी, रिश्तों की समझ से लेकर सामाजिक व्यवहार तक, अनेक परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी महिलाओं के माध्यम से आगे बढ़ती रही हैं। मातृ नवमी इस मौन लेकिन महत्वपूर्ण योगदान को स्मरण करने का अवसर भी है। यह हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल बड़े राजनीतिक या सामाजिक घटनाक्रमों से नहीं बनता। परिवारों के भीतर जीवन को संभालने वाली असंख्य माताओं के योगदान से भी समाज की सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहती है।

गया और पितृ श्राद्ध की परंपरा

भारत में गया को पितृ श्राद्ध और पिंडदान के प्रमुख तीर्थों में गिना जाता है। बिहार के गया क्षेत्र में फल्गु नदी और विष्णुपद मंदिर से जुड़ी पितृकर्म की परंपरा लंबे समय से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती रही है। यहां देश -विदेश के विभिन्न हिस्सों से लोग अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने पहुंचते हैं। मातृपक्षीय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भी इस व्यापक पितृपरंपरा का हिस्सा है। गया की धार्मिक परंपरा इस बात का उदाहरण है कि भारतीय समाज में पूर्वजों की स्मृति केवल पारिवारिक विषय नहीं रही, बल्कि उसने तीर्थ, लोकाचार और धार्मिक संस्कृति का रूप भी ग्रहण किया। हालांकि किसी भी धार्मिक कर्म की विधि परिवार, परंपरा और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है, लेकिन उसका मूल उद्देश्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना ही है।

मिथिला की सांस्कृतिक चेतना में मातृकुल और पूर्वजों की स्मृति

मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा में परिवार केवल रक्त-संबंधों का विस्तार नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और पीढ़ियों से संचित स्मृतियों की जीवंत विरासत है। यहां रिश्तों की आत्मीयता सामाजिक जीवन को जोड़ने वाली उस अदृश्य डोर की तरह है, जो समय के परिवर्तन के बावजूद पीढ़ियों को एक-दूसरे से बांधे रखती है। विशेष रूप से मातृपक्ष से जुड़े संबंध मैथिल जीवन में स्नेह और अपनत्व की विशिष्ट पहचान रखते हैं। ननिहाल, नाना-नानी, मामा-मामी और मातृकुल से जुड़े रिश्ते केवल संबोधन नहीं, बल्कि बचपन की स्मृतियों और पारिवारिक आत्मीयता के भावलोक का हिस्सा हैं। मिथिला के लोकजीवन में मां, बेटी, बहन और अन्य स्त्री संबंधों की संवेदनशील अभिव्यक्ति लोकगीतों, लोककथाओं और मौखिक परंपराओं में सहज दिखाई देती है। विवाह, जन्म, पर्व-त्योहार और विभिन्न संस्कारों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने लोक संस्कृति की इस अमूल्य धरोहर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए रखा है। स्त्री यहां केवल परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और संस्कारों की प्रमुख संवाहिका भी रही है। मातृ नवमी को मिथिला के सांस्कृतिक संदर्भ में देखें तो यह केवल दिवंगत माताओं और मातृपक्षीय पूर्वजों के स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि मातृस्नेह, त्याग और संस्कारों की उस विरासत को नमन करने का भावपर्व है, जिसने परिवारों की भावभूमि को सींचा है। पूर्वजों का स्मरण यहां अतीत में लौटना नहीं, बल्कि वर्तमान को अपनी जड़ों से जोड़ना है। मातृ नवमी इसी सांस्कृतिक निरंतरता को सुदृढ़ करती है, जहां स्मृतियां संस्कार बनकर अगली पीढ़ी तक पहुंचती हैं और अतीत, वर्तमान तथा भविष्य को आत्मीयता के एक सूत्र में पिरो देती हैं।

मातृ नवमी और स्त्री सम्मान

मातृ नवमी का सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक पक्ष स्त्री-सम्मान से जुड़ा है। दिवंगत माताओं का स्मरण करते समय यह प्रश्न भी उठता है कि क्या हम जीवित माताओं को उसी सम्मान और गरिमा के साथ देख पा रहे हैं? मां को केवल त्याग, सहनशीलता और सेवा की प्रतिमा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। वह अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व, इच्छाओं, अधिकारों और आकांक्षाओं वाली व्यक्ति भी है। मातृ नवमी का अवसर हमें इस व्यापक दृष्टि को स्वीकार करने की प्रेरणा दे सकता है।यदि एक परिवार अपनी दिवंगत मां के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है, तो उस श्रद्धा का वास्तविक विस्तार परिवार की जीवित बुजुर्ग महिलाओं के सम्मान, उनकी देखभाल और उनके निर्णयों को महत्व देने में दिखाई देना चाहिए। इसी तरह बेटियों, बहनों और महिलाओं को समान अवसर और सम्मान देना भी मातृशक्ति के प्रति वास्तविक सम्मान का हिस्सा है।

परिवार और पीढ़ियों के बीच स्मृति की कड़ी

आधुनिक जीवन में परिवार भौगोलिक रूप से बिखर रहे हैं। रोजगार, शिक्षा और बेहतर अवसरों के कारण बच्चे अक्सर अपने माता-पिता और दादा-दादी से दूर रहने लगे हैं। ऐसे में परिवार की पुरानी स्मृतियां धीरे-धीरे कम होती जाती हैं। मातृ नवमी जैसे अवसर इन स्मृतियों को संरक्षित करने का माध्यम बन सकते हैं। परिवार के बुजुर्ग बच्चों को दिवंगत परिजनों के बारे में बता सकते हैं। वे कैसे रहते थे, उनके जीवन-मूल्य क्या थे, उन्होंने परिवार के लिए क्या किया और आने वाली पीढ़ियों को क्या संदेश दिया। इस तरह धार्मिक अवसर पारिवारिक इतिहास के संरक्षण का माध्यम भी बन सकता है। एक परिवार अपनी मौखिक परंपराओं, पुराने दस्तावेजों, तस्वीरों और संस्मरणों को सुरक्षित रखकर आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ सकता है।

कर्मकांड से आगे जीवन-मूल्यों की ओर

किसी भी परंपरा की शक्ति उसके बाहरी रूप से अधिक उसके आंतरिक संदेश में होती है। मातृ नवमी का कर्मकांड श्रद्धा की अभिव्यक्ति है, लेकिन इसकी आत्मा कृतज्ञता और स्मरण में निहित है।पूर्वजों को याद करने का अर्थ उनके जीवन-मूल्यों को भी याद करना है। यदि किसी माता ने शिक्षा को महत्व दिया, तो उसकी स्मृति में किसी जरूरतमंद बच्चे की शिक्षा में सहायता करना उस विरासत को आगे बढ़ाने का सार्थक माध्यम हो सकता है। यदि उसने सेवा और करुणा का जीवन जिया, तो जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना उसके प्रति वास्तविक सम्मान हो सकता है। इस दृष्टि से मातृ नवमी परंपरा और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच एक सुंदर सेतु बना सकती है।

आधुनिक समय में मातृ नवमी की प्रासंगिकता

तकनीक और आधुनिक जीवन शैली ने मनुष्य को सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन कई बार उसे अपने पारिवारिक और सांस्कृतिक परिवेश से दूर भी किया है। ऐसे समय में मातृ नवमी जैसी परंपराएं हमें ठहरकर अपने अतीत की ओर देखने का अवसर देती हैं। यह दिन हमें बताता है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। परंपरा को समय के अनुरूप समझते हुए उसके मूल मानवीय संदेश को आगे बढ़ाया जा सकता है। आज अनेक परिवार धार्मिक अनुष्ठानों को सरल तरीके से करते हैं। कुछ लोग अपने शहर या देश से दूर रहकर भी पूर्वजों का स्मरण करते हैं। ऐसे में भौगोलिक दूरी श्रद्धा के मार्ग में बाधा नहीं बनती। महत्वपूर्ण यह है कि स्मरण सच्चा हो और उसके पीछे कृतज्ञता का भाव हो।

मातृ स्मरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष

किसी प्रियजन की मृत्यु जीवन में गहरा खालीपन पैदा करती है। समय बीतने के साथ शोक की तीव्रता कम हो सकती है, लेकिन स्मृतियां बनी रहती हैं। धार्मिक और पारिवारिक अनुष्ठान व्यक्ति को उस स्मृति को स्वीकार करने और उसे सकारात्मक भाव में बदलने का अवसर देते हैं। मातृ नवमी इसी अर्थ में भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। परिवार के सदस्य एक साथ बैठकर दिवंगत मां को याद करते हैं, उनके जीवन की बातें साझा करते हैं और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इससे पारिवारिक संबंधों में भावनात्मक निकटता भी बढ़ सकती है। इस प्रकार यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम भी बनती है।

विविधता में एकता का संदेश

भारत में श्राद्ध और पितृ-स्मरण की विधियां एक जैसी नहीं हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाज, भोजन, लोकाचार और अनुष्ठान देखने को मिलते हैं। कहीं नदी या तीर्थ पर जाकर कर्म किए जाते हैं तो कहीं घर पर ही परंपरा निभाई जाती है। इन विविधताओं के बावजूद मूल भावना समान है अपने पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना। यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि वह एक मूल भाव को अनेक स्थानीय रूपों में अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता देती है। मातृ नवमी भी इसी सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा है। इसकी क्षेत्रीय परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन मां के प्रति सम्मान की भावना सार्वभौमिक है।

मातृ नवमी का सामाजिक संदेश

आज जब वृद्ध माता-पिता की देखभाल, अकेलापन, परिवारों में बढ़ती दूरी और बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण हो रहे हैं, तब मातृ नवमी का संदेश और व्यापक हो जाता है।दिवंगत मां के लिए श्राद्ध करना श्रद्धा है, लेकिन जीवित मां की आवश्यकताओं को समझना उससे भी बड़ा दायित्व है। वृद्ध महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान, सुरक्षा और भावनात्मक जरूरतों का ध्यान रखना मातृसम्मान की वास्तविक अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार समाज में ऐसी महिलाओं के प्रति संवेदनशील होना, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने परिवारों का पालन-पोषण किया है, मातृशक्ति के सम्मान को व्यापक सामाजिक अर्थ देता है।

मातृ ऋण से कृतज्ञता तक, संस्कारों को जीवंत करने का पर्व

मातृ नवमी भारतीय संस्कृति की उस संवेदनशील परंपरा का प्रतीक है, जिसमें जीवन को केवल वर्तमान से नहीं, बल्कि अतीत और आने वाली पीढ़ियों से जोड़कर देखा जाता है। यह दिन दिवंगत माताओं और मातृपक्षीय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ उस मातृऋण को स्वीकार करने का अवसर देता है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं। इसके धार्मिक पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और स्मरण हैं तो सांस्कृतिक पक्ष में परिवार, लोक परंपरा और पीढ़ियों की निरंतरता। इसके मानवीय पक्ष में कृतज्ञता और संवेदना है तो आधुनिक संदर्भ में स्त्री-सम्मान, वृद्धजनों की देखभाल और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश भी निहित है। मातृ नवमी हमें यह समझने की प्रेरणा देती है कि पूर्वजों का सम्मान केवल उनके लिए किए जाने वाले अनुष्ठान में नहीं, बल्कि उनके दिए संस्कारों को जीवन में उतारने में है। मां की स्मृति का सबसे सुंदर रूप यही हो सकता है कि हम उनके स्नेह, करुणा, त्याग और जीवन-मूल्यों को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएं। इस अर्थ में मातृ नवमी अतीत को याद करने की एक तिथि भर नहीं, बल्कि मातृऋण को स्वीकार करने, पारिवारिक स्मृतियों को संजोने, स्त्री की गरिमा को समझने और कृतज्ञता की संस्कृति को आगे बढ़ाने का अवसर है। बदलते समय में भी इसकी प्रासंगिकता इसलिए बनी रहेगी, क्योंकि मां के प्रति सम्मान किसी एक युग, समाज या परंपरा तक सीमित नहीं यह मनुष्य की सबसे सहज और सार्वभौमिक संवेदनाओं में से एक है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।