प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक महत्वपूर्ण सुभाषित साझा किया। इस संस्कृत श्लोक के माध्यम से उन्होंने बताया कि वास्तविक श्रेष्ठता क्या है और मनुष्य में किन गुणों का होना आवश्यक है।
संस्कृत श्लोक और उसका भावार्थ
प्रधानमंत्री ने श्लोक पोस्ट करते हुए लिखा:
“ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः।
एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥”
इसका सरल अर्थ है—जो व्यक्ति ज्ञानवान हो, वाग्मी (अच्छा वक्ता) हो और कर्मों में निपुण व निष्ठावान हो, फिर भी अगर उसमें शील और सदाचार नहीं है, तो वह वास्तव में श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता।
महाराजा भोज के ग्रंथ से लिया गया श्लोक
यह श्लोक महाराजा भोज द्वारा रचित प्रसिद्ध वास्तुशास्त्र ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ के 44वें अध्याय का 16वां श्लोक है। इसमें उत्तम चरित्र और सदाचार के महत्व पर जोर दिया गया है।
ज्ञान, वाक्पटुता और निपुणता पर्याप्त नहीं
इस सुभाषित के जरिए यह संदेश दिया गया है कि समाज में ज्ञान को ऊंचा दर्जा जरूर दिया जाता है, लेकिन अच्छे चरित्र के बिना ज्ञान अधूरा है।
– कई लोग अपनी मीठी बातों से दूसरों को प्रभावित कर लेते हैं, लेकिन अगर मन में खोट हो और चरित्र साफ न हो, तो उनकी बातें केवल धोखा देने का माध्यम बन जाती हैं।
– काम में माहिर होना और लगन से कार्य करना अच्छी बात है, लेकिन नैतिक मूल्यों के बिना यह सफलता भी अधूरी रह जाती है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा साझा किए गए इस श्लोक ने एक बार फिर याद दिलाया कि ज्ञान, वाक्पटुता और कर्म-निपुणता तभी सार्थक हैं जब वे सदाचार और अच्छे चरित्र से जुड़े हों। यही गुण किसी व्यक्ति को समाज में वास्तव में श्रेष्ठ बनाते हैं। (इनपुट-एजेंसी)


