आज की सुबह कुछ अलग है। बिहार की धरती पर एक भारी-सी चुप्पी है और देश के उन लाखों घरों में, जहां रात को रोशनी जलती थी, आज एक अजीब से खालीपन की अनुभूति है। 30 अक्टूबर 2026 को वह सूरज अस्त हो गया, जिसकी रोशनी से अनगिनत दीये जले और निंरतर प्रकाशित हैं। डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा (आरके सिन्हा) 75 वर्ष की आयु में पंचतत्व में विलीन हो गए। दिल्ली/नोएडा स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। पिछले लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे, किंतु उनका शरीर थक गया था… उनकी इच्छाशक्ति और सपने नहीं!
वे बिहार के वरिष्ठ भाजपा नेता, पूर्व राज्यसभा सदस्य और विश्व प्रसिद्ध सुरक्षा कंपनी सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (एसआईएस) के संस्थापक थे। उनका जाना यानी उस पूरे स्वर्णिम अध्याय का अंत है, जिसने संघर्ष को अपना धर्म बनाया और देश के सबसे निचले पायदान पर खड़े करोड़ों लोगों के हाथों में रोजगार की लाठी थमाई। आरके सिन्हा के जीवन को देखें तो ध्यान में आता है, उनका पूरा जीवन एक ऐसे दैदीप्यमान सूरज की तरह रहा, जो खुद तपकर और संघर्षों की भट्टी में गलकर, दूसरों की जिंदगी में उम्मीदों के अनगिनत दीये जलाता है। आज जब वे अस्ताचल की ओर चले गए हैं, तो लगता है जैसे कोई बड़ा दीया बुझ गया हो…।
पत्रकारिता का गौरव: हिन्दुस्थान समाचार का वह कुशल और संवेदनशील नेतृत्व
आरके सिन्हा के जीवन का सबसे मजबूत और प्रेरक स्तंभ पत्रकारिता रहा। सत्तर के दशक में एक आम रिपोर्टर के रूप में कलम उठाने वाले इस इनसान ने आगे चलकर देश की सबसे पुरानी बहुभाषी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार के अध्यक्ष (चेयरमैन) के रूप में इसकी कमान संभाली। उन्होंने इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार एजेंसी को सिर्फ व्यावसायिक ऊंचाई नहीं दी, बल्कि उसे देशहित और राष्ट्रीय चेतना के प्रति समर्पित रखने का संकल्प भी निभाया।
उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ खबरें लिखने के साथ ही यह देश की नब्ज को समझना और उसे सही दिशा देना था। जब वे हिन्दुस्थान समाचार के अध्यक्ष थे, तो उनकी आवाज में एक अलग ही वजन था। वे जानते थे कि शब्द कितने शक्तिशाली हो सकते हैं। उनकी कलम ने कभी समझौता नहीं किया और यही वजह थी कि देश के बौद्धिक और मीडिया जगत में उन्हें एक संरक्षक के रूप में देखा जाता रह। आज जब वे नहीं रहे, तो लगता है जैसे पत्रकारिता के उस स्वर्णिम दौर की एक आखिरी कड़ी भी टूट गई हो।
एक साधारण लड़के की असाधारण यात्रा
रविन्द्र किशोर सिन्हा का जन्म 22 सितंबर 1951 को बिहार के बक्सर (भोजपुर जिला) के बहियारा गांव के एक बेहद साधारण परिवार में हुआ। बचपन से ही उनकी आंखों में कुछ अलग करने की चाह थी। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने पटना के अनुग्रह नारायण कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक किया। शुरुआती दिन आसान नहीं थे।
परिवार की माली हालत और तत्कालीन बिहार की आर्थिक परिस्थितियां युवाओं को संघर्षों की गहरी खाई में धकेलने के लिए पर्याप्त थीं पर आरके सिन्हा की आंखों में जो सपने थे, उन्हें किसी भी रूप में सीमित नहीं किया जा सकता था। वे जानते थे कि यदि रास्ते खुद नहीं बनते, तो उन्हें अपनी इच्छाशक्ति के हथौड़े से तोड़कर बनाना पड़ता है।
शुरुआती दौर में उन्होंने एक प्रशिक्षु पत्रकार (ट्रेनी रिपोर्टर) के रूप में करियर की शुरुआत की, जहां उनका मासिक वेतन महज 230 रुपये था। एक खोजी पत्रकार के तौर पर उन्होंने बहुत ही कम समय में अपनी खास पहचान बना ली। सन 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने खुलना-कुष्टिया-ईशुरदी सेक्टर में एकमात्र युद्ध संवाददाता के रूप में जांबाज रिपोर्टिंग की।
मोर्चे पर जाकर गोलियों की गूंज और भारतीय सेना के पराक्रम को अपनी कलम से पन्नों पर उतारना उनके जीवन का एक ऐसा अनुभव था, जिसने उनकी नियति को पूरी तरह बदल दिया। उस समय उनके भीतर देशभक्ति और सैनिकों के प्रति गहरा सम्मान घर कर गया था। वे अकसर कहते थे कि युद्ध के मैदान से लौटे जवानों की आंखों में जो दर्द देखा, वह उन्हें रात भर सोने नहीं देता था।
एक ‘एक्सीडेंटल’ आइडिया जिसने बदल दी देश की सूरत
पत्रकारिता के दिनों में ही आरके सिन्हा ने उन पूर्व सैनिकों के दर्द को बहुत करीब से देखा, जो देश के लिए लड़कर आए थे, किंतु सेवानिवृत्ति या चोटिल होने के बाद समाज में आजीविका के लिए दर-दर भटकने को मजबूर दिखे। इसी दौरान बिहार की धरती पर संपूर्ण क्रांति के महानायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) का आंदोलन अंगड़ाई ले रहा था। आरके सिन्हा छात्र आंदोलन और जेपी के विचारों से गहराई से जुड़े थे, जिसके कारण अंततः उन्हें अपनी पत्रकारिता की नौकरी भी गंवानी पड़ी।
यह जेपी आंदोलन का ही दौर था जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने सिन्हा के भीतर छिपे सामाजिक सरोकारों को भांपते हुए उन्हें एक अमूल्य सुझाव दिया। जेपी ने कहा कि देश के लिए मर-मिटने वाले इन सेवानिवृत्त सैनिकों और अर्धसैनिक बलों के जवानों को समाज में पुनर्स्थापित करने और उनके हुनर का सही इस्तेमाल करने के लिए कुछ किया जाना चाहिए।
जेपी की यही बात आरके सिन्हा के दिल में उतर गई। उन्होंने इस सुझाव को एक मिशन की तरह लिया। शुरुआत में उन्होंने इसे कोई व्यापार या कॉर्पोरेट घराना बनाने के इरादे से नहीं, बल्कि पूरी तरह से सामाजिक सेवा के संकल्प के साथ शुरू किया था। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि जेपी की वह एक सलाह कितनी दूर तक गई।
मात्र 250 रुपये से 12,000 करोड़ के वैश्विक साम्राज्य की नींव
सन 1974 में, पटना के एक छोटे से किराए के कमरे में सिर्फ दो लोगों की टीम और महज 250 रुपये की मामूली पूंजी के साथ डॉ. आरके सिन्हा ने ‘सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज’ (एसआईएस) की स्थापना की। पटना के पाटलिपुत्र कॉलोनी स्थित 94 नंबर का उनका अपना घर ही कई सालों तक उनका दफ्तर भी रहा। नीचे के दो कमरों में दफ्तर चलता था और ऊपर वे अपने परिवार के साथ रहते थे। जब दफ्तर में लोगों की भीड़ बढ़ती, तो उनके घर का बरामदा ही मीटिंग रूम में तब्दील हो जाता था। सोचिए, कितनी सादगी थी और कितना बड़ा सपना।
उस दौर में भारत में ‘निजी सुरक्षा’ जैसी कोई संगठित इंडस्ट्री नहीं थी। लोग अपनी सुरक्षा के लिए सिर्फ सरकारी पुलिस या लाठीधारी वॉचमैन पर निर्भर थे। आरके सिन्हा ने इस बिखरे हुए बाजार को एक संगठित और प्रोफेशनल स्वरूप देने का बीड़ा उठाया। उन्होंने 1984 में देश का पहला निजी सुरक्षा गार्ड प्रशिक्षण संस्थान खोला, ताकि युवाओं को अनुशासित और तकनीकी रूप से सक्षम बनाया जा सके।
जिस कंपनी की शुरुआत एक छोटे से कमरे से हुई थी, उसने आने वाले दशकों में इतिहास रच दिया। सन 2008 में एसआईएस ने ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा दिग्गज ‘चब सिक्योरिटी’ का ऐतिहासिक अधिग्रहण किया। यह किसी भी भारतीय सुरक्षा कंपनी द्वारा किया गया पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय अधिग्रहण था, जिसने एसआईएस को एक बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट इकाई बना दिया। आज एसआईएस का सालाना टर्नओवर 12,000 करोड़ रुपये से अधिक है। भारत, सिंगापुर, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में फैली शाखाओं के साथ यह कंपनी आज एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में निजी सुरक्षा प्रबंधन की शीर्ष लीडर है। इनके पीछे लाखों परिवारों की रसोई जलती है।
लाखों परिवारों की रसोई का आधार: रोजगार के मसीहा
आरके सिन्हा की सबसे बड़ी उपलब्धि उनके बैंक खाते की रकम या उनकी कंपनी का टर्नओवर न होकर वह रोजगार है, जो उन्होंने उस प्रदेश में पैदा किया जहां उद्योगों का नामोनिशान नहीं था। बिहार जैसे राज्य में, जहां से हर साल लाखों युवा रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं, आरके सिन्हा ने अपनी नीतियों से युवाओं को उनके ही राज्य और देश के विभिन्न हिस्सों में सम्मानजनक आजीविका दी।
आज एसआईएस ग्रुप में लगभग 2 लाख 80 हजार से अधिक स्थायी कर्मचारी कार्यरत हैं। अगर एक कर्मचारी के पीछे चार सदस्यों का परिवार भी मान लिया जाए, तो आरके सिन्हा ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 10 लाख से अधिक लोगों के जीवन में खुशहाली की रोशनी फैलाई है। यही कारण भी है जो उन्हें बिहार में “रोजगार का मसीहा” कहा जाने लगा। वे अकसर अपने साक्षात्कारों में कहते थे, “जब मैं किसी युवा के हाथ में एसआईएस की वर्दी और उसके चेहरे पर आत्मसम्मान देखता हूं तो मुझे लगता है कि मेरा जीवन सफल हो गया।” आज जब वे नहीं रहे, तो लगता है जैसे उन लाखों परिवारों के लिए कोई अपना चला गया हो।
राजनीति के चाणक्य और भाजपा के आधार स्तंभ
व्यावसायिक ऊंचाइयों को छूने के साथ-साथ डॉ. आरके सिन्हा का राजनीतिक सफर भी बेहद प्रेरणादायक रहा। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विचारों से ओतप्रोत थे और जनसंघ के जमाने से ही सक्रिय रहे। सन 1966 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने उन्हें स्वयं जनसंघ की सदस्यता दिलाई थी। इसके बाद वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए।
बिहार में भाजपा को मजबूत करने और उसे सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने वाले वैचारिक रणनीतिकारों में सिन्हा का नाम सबसे ऊपर आता है। आपातकाल (1975-77) के दौरान उन्होंने तानाशाही के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और जेपी आंदोलन के अनुभवों पर ‘जनआंदोलन’ नामक एक प्रामाणिक पुस्तक भी लिखी। उनकी संगठन क्षमता और देश के प्रति समर्पण को देखते हुए भाजपा ने उन्हें सन 2014 से 2020 तक राज्यसभा का सदस्य बनाया।
संसद में रहते हुए उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा, रक्षा मामलों और युवाओं के कौशल विकास पर कई महत्वपूर्ण नीतिगत सुझाव दिए। वे प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री के सलाहकार के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके थे। राजनीति में रहकर भी उन्होंने कभी शुचिता और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। यही वजह थी कि विरोधी दलों के नेता भी उनका उतना ही सम्मान करते थे। वे राजनीति को सिर्फ सत्ता से अधिक सेवा का माध्यम मानते रहे।
शिक्षा, परोपकार और संस्कृति के संरक्षक
आरके सिन्हा जी के मूल व्यक्तित्व को लेकर कहना यही होगा कि वे एक गहरी सामाजिक चेतना वाले संवेदनशील इंसान थे। उनका मानना था कि समाज ने उन्हें जो कुछ भी दिया है, उसे वापस लौटाना उनका परम कर्तव्य है। इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने सन 2001 में देहरादून में ‘द इंडियन पब्लिक स्कूल’ (टीआईपीएस) की स्थापना की, जोकि आज देश के बेहतरीन आवासीय विद्यालयों में गिना जाता है।
इसके अलावा, उन्होंने ‘अवसर ट्रस्ट’ के माध्यम से गरीब और वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले मेधावी छात्रों को मुफ्त शिक्षा और कोचिंग की सुविधाएं उपलब्ध कराईं, ताकि वे सिविल सर्विसेज और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो सकें। स्वास्थ्य के क्षेत्र में उन्होंने ग्रामीण इलाकों में कई अस्पताल और डिस्पेंसरियां खुलवाईं। जै
जैविक खेती और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने ‘आद्या ऑर्गेनिक्स’ की शुरुआत की, जिसने किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी इन्हीं सामाजिक, शैक्षणिक और पत्रकारीय सेवाओं के लिए सन 2023 में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा गया था। वे मानते थे कि शिक्षा और अवसर ही असली बदलाव ला सकते हैं।
एक युग का अंत: रोशनी कभी धुंधली नहीं होगी
आज 30 अक्टूबर 2026 की वह सुबह बिहार और देश के औद्योगिक-राजनीतिक इतिहास में एक उदास तारीख के रूप में दर्ज हो गई है, जब यह कर्मयोगी पंचतत्व में विलीन हो गया। उनके निधन पर देश के शीर्ष राजनेताओं, उद्योगपतियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया है, किंतु असली शोक उन लाखों परिवारों का है, जिनकी जिंदगी आज भी उनकी दी हुई रोशनी से चल रही है।
आरके सिन्हा जी का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि आपके इरादे फौलादी हों तो 250 रुपये की मामूली रकम से भी एक वैश्विक साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है। उन्होंने निजी सुरक्षा उद्योग को जो गरिमा, पहचान और रोजगारपरक ढांचा दिया, वह हमेशा जीवित रहेगा। वे सचमुच एक ऐसे सूरज थे, जो खुद तो अब अस्ताचल की ओर चले गए हैं, पर उनके द्वारा प्रज्वलित किए गए लाखों दीये (एसआईएस के सुरक्षाकर्मी, देश के शिक्षित युवा और परोपकार से लाभान्वित परिवार) इस समाज को युगों-युगों तक अपनी रोशनी से आलोकित करते रहेंगे।
आज जब हम उन्हें याद कर रहे हैं, तो आंखें भर आई हैं, किंतु साथ ही गर्व भी होता है कि इस धरती पर वे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में आए जिन्होंने अपने संघर्ष से लाखों लोगों की किस्मत बदल दी। श्रद्धेय डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा जी को उनकी इस महान और गौरवमयी जीवन यात्रा के लिए देश हमेशा नमन करता रहेगा। आपकी रोशनी कभी धुंधली नहीं होगी। सादर नमन…।
लेखक- डॉ. मयंक चतुर्वेदी


