- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार बदलती वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व के लिए जरूरी।
- भारत की स्थायी सदस्यता से विकासशील देशों की आवाज और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी मजबूत होगी।
- वीटो अधिकार, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और कार्यप्रणाली में सुधार से सुरक्षा परिषद अधिक समावेशी और प्रभावी बनेगी।
21वीं सदी का यह दौर एक ऐसे वैश्विक बदलाव का गवाह है जहां महाशक्तियों के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, नई आर्थिक ताकतें उभर रही हैं और दुनिया की चुनौतियां भी अब सीमाओं में बंधे रहने के बजाय वैश्विक रूप ले चुकी हैं। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महामारियां और आर्थिक असमानता जैसी समस्याएं आज किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में, वैश्विक शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला सबसे बड़ा मंच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council – UNSC) आज भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौर की पुरानी व्यवस्था पर चल रहा है। इस व्यवस्था के केंद्र में भारत जैसे विशाल, लोकतांत्रिक और तेजी से उभरते राष्ट्र की स्थायी सदस्यता की मांग केवल एक कूटनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में न्याय, पारदर्शिता और समकालीन वास्तविकता का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की एक अनिवार्य आवश्यकता है।
सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना और उसकी सीमाएं
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने वाला प्रमुख निकाय है, जिसमें 5 स्थायी (अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन) और 2 वर्ष के कार्यकाल वाले 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। स्थायी सदस्यों के पास वीटो का विशेष अधिकार है। इसकी वर्तमान संरचना 1945 के शक्ति संतुलन को दर्शाती है, जब कई देश औपनिवेशिक शासन के अधीन थे। आज एशिया और अफ्रीका के देश वैश्विक मंच पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, फिर भी परिषद में उनका प्रतिनिधित्व सीमित है। यही विसंगति वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप इसमें व्यापक सुधार और स्थायी सदस्यता की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी

भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश और प्रमुख अर्थव्यवस्था है। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और सतत विकास जैसे वैश्विक मुद्दों पर उसकी सक्रिय भागीदारी है। संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारतीय सैनिकों का बलिदान और योगदान उसकी वैश्विक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भारत का तर्क है कि वैश्विक शांति और सुरक्षा के निर्णय लेने वाले मंच पर उसे भी उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। ‘ग्लोबल साउथ’ और विकासशील देशों की आवाज के रूप में, भारत की स्थायी सदस्यता से सुरक्षा परिषद में एशिया और विकासशील दुनिया का प्रतिनिधित्व मजबूत होगा, जिससे वैश्विक निर्णय प्रक्रिया अधिक न्यायसंगत और प्रभावी बनेगी।
वीटो अधिकार और व्यापक सुधार का सवाल
सुरक्षा परिषद में सुधार का अर्थ केवल सदस्यों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि वीटो अधिकार, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और कार्यप्रणाली में बदलाव भी शामिल है। भारत का रुख है कि नए स्थायी सदस्यों को भी समान अधिकार (वीटो) मिलने चाहिए, क्योंकि सीमित अधिकार देना न्यायसंगत नहीं है। हालांकि, वीटो पर सदस्य देशों में मतभेद हैं। भारत ने जोर दिया है कि चर्चा केवल वीटो तक सीमित न रहकर परिषद के आकार, सदस्यता श्रेणियों और काम करने के तरीकों पर एक साथ होनी चाहिए, जिससे सुधार प्रक्रिया व्यापक और परिणामोन्मुख बन सके।
जी-4 और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
भारत की मांग को कई प्रमुख देशों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन हितों के टकराव के कारण सुधार प्रक्रिया रुकी हुई है। अपनी दावेदारी को आगे बढ़ाने के लिए भारत ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर ‘जी-4’ समूह का हिस्सा है। यह समूह सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग करता है। जी-4 ने अफ्रीका जैसे प्रतिनिधित्वहीन क्षेत्रों को शामिल करने पर जोर दिया है, क्योंकि महाद्वीप से जुड़े अनेक मुद्दे एजेंडे में होने के बावजूद उनका कोई स्थायी सदस्य नहीं है। स्थायी सदस्यों की संख्या, नए सदस्यों के अधिकार और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दे इस प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं। अक्टूबर 2026 में जी-4 ने वास्तविक बातचीत और साझा प्रस्ताव की आवश्यकता पर जोर दिया है।
सुधार की राह में चुनौतियां
सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन आवश्यक है, जिसमें महासभा का व्यापक समर्थन और सभी पांच स्थायी सदस्यों सहित आवश्यक राष्ट्रों की पुष्टि जरूरी होती है। यह जटिल कानूनी प्रक्रिया और देशों के राष्ट्रीय हित व आपसी प्रतिस्पर्धा राह में बड़ी बाधा हैं। कुछ देश स्थायी सदस्यता बढ़ाने के पक्ष में हैं, तो कुछ केवल अस्थायी सीटें बढ़ाने को व्यावहारिक मानते हैं। चीन जैसे देशों का रुख भी चुनौती है। ऐसी स्थिति में सदस्य देशों को मात्र घोषणाओं तक सीमित न रहकर, समयबद्ध और लिखित प्रस्तावों के माध्यम से समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, ताकि परिषद को अधिक प्रतिनिधित्व पूर्ण और प्रभावी बनाया जा सके।
वैश्विक शांति और विकासशील देशों की आवाज
सुरक्षा परिषद में सुधार का महत्व भारत की स्थायी सदस्यता से कहीं व्यापक है। आज दुनिया क्षेत्रीय संघर्षों, आतंकवाद, मानवीय संकट, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इन समस्याओं का समाधान केवल कुछ शक्तिशाली देशों के प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सभी क्षेत्रों की भागीदारी जरूरी है। एक अधिक समावेशी सुरक्षा परिषद में विभिन्न देशों के अनुभव और प्राथमिकताएं निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन सकेंगी। इससे परिषद की विश्वसनीयता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय संकटों पर अधिक प्रभावी कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, सदस्यता बढ़ाने के साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार भी आवश्यक होगा।
समावेशी सुरक्षा परिषद से मजबूत होगा बहुपक्षीय सहयोग
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार आज की बदलती दुनिया की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। वर्ष 1945 में बनी व्यवस्था ने अपने समय की परिस्थितियों के अनुसार काम किया, लेकिन वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप इसमें बदलाव जरूरी हो गया है। भारत की स्थायी सदस्यता की मांग इसी व्यापक सुधार प्रक्रिया का हिस्सा है। यह मांग केवल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं है, बल्कि विकासशील देशों की भागीदारी, वैश्विक न्याय और बहुपक्षीय व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ी है। सुधार की राह में राजनीतिक मतभेद और कानूनी बाधाएं हैं, लेकिन संवाद, सहयोग और ठोस प्रयासों से आगे बढ़ा जा सकता है। एक ऐसी सुरक्षा परिषद, जिसमें दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों की आवाज को उचित स्थान मिले और जो अंतरराष्ट्रीय संकटों का समय पर समाधान कर सके, संयुक्त राष्ट्र के मूल उद्देश्यों को मजबूत करेगी। यही बदलती दुनिया के अनुरूप अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी वैश्विक व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।


